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सुखी रहना है तो हिंसा का त्याग करो : आचार्य श्री आर्जव सागर

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बड़ौत,26 अगस्त  2026  (यूटीएन)।  नगर में चातुर्मास कर रहे जैनाचार्य श्री आर्जव सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए श्रद्धालुओं को अहिंसा, सदाचार, संयम और अच्छे कर्मों का संदेश दिया। मंगल प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य यदि वास्तव में सुखी जीवन जीना चाहता है तो उसे सबसे पहले हिंसा का त्याग करना होगा। उन्होंने कहा कि हिंसा केवल किसी प्राणी के जीवन को समाप्त करना नहीं है, बल्कि किसी भी जीव को मन, वचन या कर्म से कष्ट पहुंचाना भी हिंसा के दायरे में आता है।

आचार्य श्री ने कहा कि गृहस्थ जीवन में मनुष्य जाने-अनजाने निरंतर अनेक प्रकार की पाप क्रियाएं करता रहता है। इन पाप कर्मों के कारण आत्मा पर कर्मों का बोझ लगातार बढ़ता जाता है। जब व्यक्ति अपने कर्मों पर विचार नहीं करता और गलत कार्यों से दूर रहने का प्रयास नहीं करता तो उसकी आत्मा पतन की ओर अग्रसर होती जाती है।

उन्होंने कहा कि आज समाज में चारों ओर हिंसा का वातावरण दिखाई देता है। मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए दूसरे जीवों को कष्ट पहुंचाने से भी पीछे नहीं हटता। यही कारण है कि समाज में अशांति, तनाव और भय का वातावरण बढ़ता जा रहा है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जीवन में सुख और शांति चाहते हैं तो अहिंसा को अपने आचरण का हिस्सा बनाना होगा।

किसी जीव को कष्ट देना भी हिंसा

आचार्य श्री आर्जव सागर जी महाराज ने कहा कि जब किसी प्राणी को मारा जाता है या उसे कष्ट दिया जाता है तो उसके भीतर से निकलने वाली पीड़ा की आह को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव को अपने जीवन से प्रेम होता है और कोई भी प्राणी स्वेच्छा से मृत्यु या पीड़ा नहीं चाहता।

उन्होंने श्रद्धालुओं को सरल शब्दों में समझाते हुए कहा कि यदि मनुष्य अपने जीवन में सुख चाहता है तो उसे दूसरों के जीवन में भी सुख और शांति का कारण बनना चाहिए। किसी को दुख देकर स्वयं सुखी रहने की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए जीवन में एक सूत्र को अपना लेना चाहिए—हिंसा का त्याग करो और अहिंसा को अपनाओ।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने व्यवहार पर भी ध्यान देना चाहिए। क्रोध, कटु वाणी, ईर्ष्या, द्वेष और दूसरों को अपमानित करने की प्रवृत्ति भी व्यक्ति के भीतर अशांति पैदा करती है। यदि मनुष्य अपने विचारों और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाता है तो उसके जीवन में शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।

सांसारिक नहीं, सच्चे सुख की तलाश करें

आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य जीवन में सांसारिक सुखों को ही वास्तविक सुख समझने की भूल करता है। धन, संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा और भौतिक सुविधाएं कुछ समय के लिए आनंद दे सकती हैं, लेकिन इन्हें स्थायी सुख नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि सांसारिक सुख का आनंद क्षणिक होता है, जबकि आत्मिक सुख व्यक्ति को भीतर से शांति प्रदान करता है।

उन्होंने कहा कि सच्चा सुख आत्मा को कर्मों के बंधन से मुक्त करने में है। जब तक आत्मा कर्मों से बंधी हुई है, तब तक मनुष्य पूर्ण और स्थायी सुख प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए मनुष्य को बाहरी सुख की बजाय अपने भीतर झांकने का प्रयास करना चाहिए।

आचार्य श्री ने कहा कि ध्यान आत्मिक शांति प्राप्त करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। महापुरुषों, तपस्वियों और ज्ञानियों ने ध्यान एवं साधना के माध्यम से अपने भीतर की अशांति को दूर किया और कर्म बंधनों से मुक्ति का मार्ग अपनाया। उन्होंने श्रद्धालुओं को नियमित रूप से आत्मचिंतन और ध्यान करने के लिए प्रेरित किया।

अच्छे कर्मों का फल भी मिलता है

धर्मसभा में आचार्य श्री ने कर्म सिद्धांत पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसे उसी के अनुरूप फल भोगना पड़ता है। इसलिए जीवन में हमेशा अच्छे कर्म करने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि पाप कर्म व्यक्ति को दुख, दरिद्रता और अशांति की ओर ले जाते हैं। वहीं अच्छे कर्म जीवन में संतोष, शांति और सकारात्मकता लेकर आते हैं। इसलिए व्यक्ति को यह सोचकर कर्म करना चाहिए कि उसके कार्यों का प्रभाव केवल उस पर ही नहीं, बल्कि उसके परिवार और समाज पर भी पड़ता है।

उन्होंने कहा कि किसी भी गलत कार्य को छोटा समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। छोटी-छोटी गलतियां धीरे-धीरे बड़ी समस्या का कारण बन सकती हैं। इसी प्रकार छोटे-छोटे अच्छे कार्य भी व्यक्ति के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।

आत्मचिंतन से दूर होंगे कर्म बंधन

आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि मनुष्य को प्रतिदिन कुछ समय अपने भीतर झांकने के लिए निकालना चाहिए। दिनभर में किए गए कार्यों पर विचार करना चाहिए कि किससे किसी को दुख पहुंचा, कहां क्रोध किया, कहां गलत शब्दों का इस्तेमाल किया और कहां किसी की मदद की।

उन्होंने कहा कि आत्मचिंतन व्यक्ति को अपनी गलतियों को पहचानने का अवसर देता है। जब मनुष्य अपनी कमियों को स्वीकार करता है और उन्हें सुधारने का प्रयास करता है, तभी उसके जीवन में वास्तविक परिवर्तन शुरू होता है।

उन्होंने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। धर्म का वास्तविक अर्थ अपने आचरण में परिवर्तन लाना है। यदि व्यक्ति मंदिर जाए, पूजा करे, प्रवचन सुने लेकिन उसके व्यवहार में क्रोध, हिंसा, छल और अहंकार बना रहे तो उसका आध्यात्मिक विकास अधूरा है।

संयम और करुणा को जीवन का हिस्सा बनाएं

आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में संयम और करुणा का भाव विकसित करना चाहिए। दूसरों के प्रति दया और प्रेम रखने से मन में सकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है। उन्होंने कहा कि समाज में शांति तभी स्थापित हो सकती है जब प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर पर हिंसा और वैमनस्य को कम करने का प्रयास करे।

उन्होंने श्रद्धालुओं से अपील की कि वह अपने परिवार और बच्चों को भी अहिंसा, सदाचार और संस्कारों की शिक्षा दें। आने वाली पीढ़ी को यदि अच्छे संस्कार मिलेंगे तो समाज में आपसी प्रेम और भाईचारा मजबूत होगा।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने सुख के लिए दूसरे के अधिकारों का हनन नहीं करना चाहिए। किसी को दुख देकर प्राप्त की गई खुशी कभी स्थायी नहीं होती। वास्तविक खुशी दूसरों के जीवन में खुशी बांटने से प्राप्त होती है।

धर्मसभा में उमड़ा श्रद्धालुओं का उत्साह

आचार्य श्री के मंगल प्रवचन को सुनने के लिए धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं ने शांत भाव से आचार्य श्री के विचारों को सुना। उन्होंने अहिंसा, ध्यान, आत्मचिंतन और सद्कर्मों से जुड़े संदेश को जीवन में उतारने का संकल्प लेने की प्रेरणा दी।

सभा में मौजूद श्रद्धालुओं ने कहा कि आचार्य श्री के प्रवचन से उन्हें अपने जीवन और कर्मों पर विचार करने की प्रेरणा मिलती है। धर्मसभा के दौरान वातावरण भक्तिमय और आध्यात्मिक बना रहा।

आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन की दिशा स्वयं तय करनी होती है। यदि वह पाप कर्मों और हिंसा के मार्ग पर चलता है तो उसका परिणाम दुख के रूप में सामने आता है। वहीं यदि वह अहिंसा, संयम, सत्य और अच्छे कर्मों को अपनाता है तो जीवन में शांति और संतोष का अनुभव कर सकता है।

उन्होंने अंत में श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे हिंसा से दूर रहें, जीव मात्र के प्रति करुणा रखें, अच्छे कर्म करें और नियमित आत्मचिंतन एवं ध्यान का अभ्यास करें। यही व्यक्ति को बाहरी सुख से आगे बढ़ाकर वास्तविक और स्थायी सुख की ओर ले जाने वाला मार्ग है।

धर्मसभा में मुकेश जैन, प्रदीप जैन, वरदान जैन, नवीन जैन, अंकुर जैन, अनिल जैन, ऋषभ जैन, वकील चंद जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं समाज के लोग उपस्थित रहे। सभी ने आचार्य श्री के मंगल प्रवचनों का लाभ लिया और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।







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