नई दिल्ली,31 जुलाई 2026 (यूटीएन)। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा ने गुरुवार को आयोजित 'फर्स्ट ग्लोबल ड्रग रेगुलेटरी कॉन्क्लेव 2026' के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि विज्ञान-आधारित, पारदर्शी और भरोसेमंद रेगुलेटरी सिस्टम किसी भी देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ होता है। उन्होंने कहा कि दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक स्तर पर नियामक संस्थाओं के बीच सहयोग को और मजबूत करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से आयोजित दो दिवसीय इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विभिन्न देशों के दवा नियामक प्राधिकरणों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, उद्योग प्रतिनिधियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अधिकारियों ने भाग लिया। सम्मेलन का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर दवा सुरक्षा, गुणवत्ता मानकों, नियामकीय सुधारों और चिकित्सा नवाचार को बढ़ावा देने के लिए साझा रणनीति तैयार करना है।
जेपी नड्डा ने कहा कि भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी दवा निर्माण क्षमता वाले देशों में शामिल है और 'फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड' के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। भारतीय दवा उद्योग दुनिया के अनेक देशों को किफायती, सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण दवाओं की आपूर्ति कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत की यह जिम्मेदारी केवल दवाओं के उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत करने में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य ऐसा आधुनिक और भविष्य के लिए तैयार रेगुलेटरी इकोसिस्टम विकसित करना है, जो बदलती वैज्ञानिक तकनीकों, नई स्वास्थ्य चुनौतियों और वैश्विक मानकों के अनुरूप कार्य कर सके। इसके लिए डिजिटल तकनीकों, डेटा आधारित निगरानी प्रणाली, जोखिम मूल्यांकन, आधुनिक परीक्षण सुविधाओं और गुणवत्ता नियंत्रण तंत्र को लगातार मजबूत किया जा रहा है।
स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि दवाओं और मेडिकल उपकरणों की गुणवत्ता पर किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। प्रत्येक मरीज तक सुरक्षित, प्रभावी और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप दवाएं पहुंचाना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। उन्होंने कहा कि एक मजबूत रेगुलेटरी व्यवस्था लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा करने के साथ-साथ दवा उद्योग में निवेश, अनुसंधान और नवाचार को भी बढ़ावा देती है।
उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों का समाधान किसी एक देश के प्रयासों से संभव नहीं है। महामारी के दौरान विभिन्न देशों के बीच वैज्ञानिक सहयोग, वैक्सीन विकास, दवा आपूर्ति और नियामकीय समन्वय ने लाखों लोगों की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी अनुभव को आगे बढ़ाते हुए अब स्थायी वैश्विक सहयोग को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
जेपी नड्डा ने कहा कि उभरती बीमारियों, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस, नई जैव-प्रौद्योगिकियों, जीन थेरेपी, व्यक्तिगत चिकित्सा (पर्सनलाइज्ड मेडिसिन) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित स्वास्थ्य सेवाओं जैसे क्षेत्रों में नियामक संस्थाओं की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। इन नई तकनीकों के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग के लिए आधुनिक नियमों और वैश्विक समन्वय की आवश्यकता है।
उन्होंने जानकारी साझा करने, वैज्ञानिक अनुसंधान में साझेदारी, क्षमता निर्माण, नियामकीय प्रक्रियाओं के सामंजस्य (रेगुलेटरी हार्मोनाइजेशन) तथा प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि यदि विभिन्न देशों की नियामक एजेंसियां एक-दूसरे के अनुभवों और सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करेंगी तो पूरी दुनिया में दवा सुरक्षा और गुणवत्ता के मानकों को और अधिक मजबूत बनाया जा सकेगा।
स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) सहित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ मिलकर दवा गुणवत्ता, वैक्सीन सुरक्षा और चिकित्सा उपकरणों के मानकों को बेहतर बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह कॉन्क्लेव वैश्विक स्वास्थ्य क्षेत्र में नई साझेदारियों को बढ़ावा देगा और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए एक साझा रोडमैप तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
उन्होंने कहा कि भारत नवाचार, अनुसंधान और वैज्ञानिक उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के साथ-साथ ऐसी नियामक प्रणाली विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है जो तेज, पारदर्शी, उत्तरदायी और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो। इससे नई दवाओं और चिकित्सा तकनीकों को सुरक्षित तरीके से मरीजों तक पहुंचाने में तेजी आएगी और वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली को नई मजबूती मिलेगी।
जेपी नड्डा ने अपने संबोधन के अंत में कहा कि "स्वस्थ विश्व के निर्माण के लिए भरोसेमंद नियामक व्यवस्था, वैज्ञानिक सहयोग और साझा जिम्मेदारी अत्यंत आवश्यक है। भारत इस दिशा में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। हमें ऐसा वैश्विक स्वास्थ्य तंत्र विकसित करना होगा, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और किफायती स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हो सकें।"
उन्होंने सभी सहभागी देशों, वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का आह्वान किया कि वे स्वास्थ्य सुरक्षा को वैश्विक प्राथमिकता बनाते हुए अनुसंधान, नवाचार और नियामकीय सहयोग के माध्यम से भविष्य की स्वास्थ्य चुनौतियों का सामूहिक समाधान तैयार करें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह कॉन्क्लेव दवा नियमन के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को नई दिशा देगा और आने वाले वर्षों में विश्व स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक सुरक्षित, प्रभावी और भरोसेमंद बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

