नई दिल्ली, 18 सितम्बर 2026 (यूटीएन)। आसफ अली रोड स्थित मंदिर श्री राम हनुमान वाटिका में बैकुंठवासी महंत श्री राम कृष्ण दास महात्यागी महाराज ‘मचान वाले बाबा’ की प्रथम पुण्यतिथि श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में मनाई गई। पुण्यतिथि समारोह के दौरान वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधान के साथ बाबा की मूर्ति की स्थापना की गई। प्रतिमा स्थापना के अवसर पर मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे और भक्तिमय वातावरण के बीच संत को श्रद्धासुमन अर्पित किए।
सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। प्रतिमा स्थापना से पहले धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई और इसके बाद बाबा की प्रतिमा को मंदिर परिसर में स्थापित किया गया। प्रतिमा स्थापना के समय मौजूद श्रद्धालुओं ने जयकारे लगाए और पुष्प अर्पित कर अपनी श्रद्धा व्यक्त की।
मंदिर के महंत श्रीरामगोपाल दास महात्यागी और महंत नवल किशोर दास सहित अनेक संत-महात्मा कार्यक्रम में उपस्थित रहे। संतों की मौजूदगी में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने बाबा के जीवन और उनकी साधना से जुड़ी स्मृतियों को याद किया।
पूर्व पार्षद अशोक जैन, समाजसेवी कैलाश खंडेलवाल, मनोज गुप्ता, पवन झलानी और सुरेंद्र कुमार समेत बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने बाबा की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। कार्यक्रम में पहुंचे लोगों ने कहा कि बाबा से जुड़ी उनकी स्मृतियां आज भी भक्तों के मन में जीवंत हैं।
साधना, सेवा और त्याग की परंपरा को किया याद
पुण्यतिथि समारोह में संत-महात्माओं ने कहा कि भारतीय संत परंपरा में साधना के साथ समाज सेवा और लोककल्याण की भावना को विशेष स्थान प्राप्त है। संतों का जीवन लोगों को धर्म, सेवा, त्याग, संयम और संस्कार की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि ‘मचान वाले बाबा’ की साधना और सेवा से जुड़ी स्मृतियां श्रद्धालुओं के बीच आज भी मौजूद हैं। उनकी प्रतिमा की स्थापना केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं है, बल्कि उनकी आध्यात्मिक विरासत और सेवा परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का माध्यम भी है।
संतों ने श्रद्धालुओं से धर्म और आध्यात्मिकता के साथ समाज के जरूरतमंद लोगों की सेवा करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि संतों की शिक्षाओं को जीवन में उतारना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
श्रीमद्भागवत कथा का हुआ समापन
प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर मंदिर परिसर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का भी विधिवत समापन हुआ। कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, भक्ति, धर्म और आध्यात्मिक जीवन के विभिन्न प्रसंगों का वर्णन किया गया।
कथावाचन के दौरान श्रद्धालु धार्मिक प्रसंगों में भाव-विभोर दिखाई दिए। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन होने पर मंदिर परिसर में भक्ति का वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने कथा का श्रवण कर धार्मिक संदेशों को आत्मसात करने का संकल्प लिया।
कथा के समापन अवसर पर विधि-विधान के साथ सामूहिक आरती हुई। आरती में संतों और श्रद्धालुओं ने एक साथ भाग लिया। इसके बाद भजन-कीर्तन का आयोजन हुआ। भक्तिमय भजनों के बीच श्रद्धालु देर तक मंदिर परिसर में जुड़े रहे।
भजन-कीर्तन से गूंजा मंदिर परिसर
कथा समापन के बाद हुए भजन-कीर्तन में श्रद्धालुओं ने उत्साह के साथ भाग लिया। भक्ति गीतों और धार्मिक जयकारों से मंदिर परिसर का वातावरण आध्यात्मिक हो गया। कई श्रद्धालु भजनों पर भाव-विभोर होकर झूमते दिखाई दिए।
आयोजन में पहुंचे लोगों का कहना था कि पुण्यतिथि जैसे अवसर केवल स्मरण का माध्यम नहीं होते, बल्कि समाज को धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ने का भी अवसर प्रदान करते हैं।
प्रतिमा स्थापना बनी श्रद्धा का स्थायी केंद्र
‘मचान वाले बाबा’ की प्रतिमा की स्थापना को मंदिर से जुड़े श्रद्धालुओं ने विशेष अवसर बताया। उनका कहना था कि अब मंदिर परिसर में बाबा की स्मृति का एक स्थायी स्वरूप मौजूद रहेगा।
प्रतिमा के सामने श्रद्धालु पूजा-अर्चना और पुष्प अर्पित कर बाबा को याद कर सकेंगे। इससे बाबा से जुड़े धार्मिक प्रसंगों और उनकी सेवा परंपरा की स्मृतियां भी मंदिर परिसर में निरंतर बनी रहेंगी।
संत-महात्माओं ने दिया सेवा का संदेश
कार्यक्रम में मौजूद संत-महात्माओं ने कहा कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य मानवता और सेवा की भावना को मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि संतों की शिक्षाएं व्यक्ति को आत्मसंयम के साथ समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का बोध कराती हैं।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आपसी प्रेम, सद्भाव और सहयोग की भावना को मजबूत करने का आह्वान किया। संतों ने कहा कि आध्यात्मिक आयोजन तभी सार्थक होते हैं जब उनका संदेश समाज के जीवन में भी दिखाई दे।
श्रद्धालुओं के लिए हुआ भंडारा
धार्मिक कार्यक्रमों के समापन के बाद मंदिर परिसर में भंडारे का आयोजन किया गया। संतों, श्रद्धालुओं और क्षेत्रवासियों ने पंगत में बैठकर प्रसाद ग्रहण किया। आयोजन में सेवा भाव से जुड़े लोगों ने श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया।
भंडारे के दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया। आयोजन स्थल पर श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्थाएं की गई थीं। धार्मिक कार्यक्रम के साथ भंडारे ने आयोजन को सामाजिक सहभागिता का स्वरूप भी प्रदान किया।
क्षेत्रवासियों ने भी लिया हिस्सा
पुण्यतिथि समारोह में मंदिर से जुड़े श्रद्धालुओं के अलावा आसपास के क्षेत्र के लोगों ने भी भाग लिया। सुबह से शाम तक मंदिर परिसर में धार्मिक गतिविधियां चलती रहीं।
क्षेत्रवासियों ने कहा कि मंदिर लंबे समय से धार्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। ऐसे आयोजनों से स्थानीय लोगों को भी एक साथ धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों में शामिल होने का अवसर मिलता है।
यादों में जीवित रहेंगे ‘मचान वाले बाबा’
पुण्यतिथि समारोह में बाबा से जुड़े श्रद्धालुओं ने उनकी स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि संतों का भौतिक रूप से हमारे बीच न रहना उनकी शिक्षाओं और सेवा की परंपरा का अंत नहीं होता। उनके द्वारा दिए गए संस्कार और आध्यात्मिक संदेश समाज में लंबे समय तक बने रहते हैं।
‘मचान वाले बाबा’ की प्रतिमा स्थापना इसी स्मृति को स्थायी रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी गई। प्रतिमा के माध्यम से मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं को बाबा के जीवन और साधना से जुड़ी स्मृतियों को याद करने का अवसर मिलता रहेगा।
धार्मिक आयोजन ने दिया एकजुटता का संदेश
पूरे आयोजन के दौरान धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सहभागिता भी दिखाई दी। संत-महात्माओं, श्रद्धालुओं, समाजसेवियों और क्षेत्रवासियों ने एक साथ कार्यक्रम में हिस्सा लिया।
आयोजन समिति से जुड़े लोगों ने कहा कि धार्मिक कार्यक्रमों का उद्देश्य केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं होना चाहिए। ऐसे अवसरों पर समाज में सेवा, सहयोग, सद्भाव और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने का प्रयास भी होना चाहिए।
प्रथम पुण्यतिथि पर आयोजित मूर्ति स्थापना, श्रीमद्भागवत कथा के समापन, सामूहिक आरती, भजन-कीर्तन और भंडारे ने मंदिर परिसर को पूरे दिन भक्तिमय बनाए रखा। श्रद्धालुओं ने बाबा की प्रतिमा के समक्ष शीश नवाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी और उनकी स्मृतियों को नमन किया।
प्रतिमा स्थापना के साथ ‘मचान वाले बाबा’ की स्मृति अब मंदिर परिसर में स्थायी रूप से संजो दी गई है। पुण्यतिथि समारोह ने एक ओर श्रद्धालुओं को उनके जीवन और साधना को याद करने का अवसर दिया, वहीं दूसरी ओर धर्म, सेवा, त्याग और सामाजिक सहभागिता की परंपरा को आगे बढ़ाने का संदेश भी दिया।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।

