नई दिल्ली,18 सितम्बर 2026 (यूटीएन)। भारत का फार्मास्युटिकल क्षेत्र अब केवल दुनिया के लिए किफायती दवाओं का निर्माण करने वाले देश की पहचान तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि अनुसंधान, नई तकनीक, जैव-प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व स्थापित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। राजधानी में आयोजित 8वें सीआईआई फार्मा और लाइफसाइंसेज शिखर सम्मेलन में उद्योग, सरकार और विशेषज्ञों के बीच हुई चर्चा में भारत के फार्मा क्षेत्र के अगले चरण की प्राथमिकताओं पर विस्तार से विचार किया गया। सम्मेलन का केंद्रीय विषय ‘फार्मा का भविष्य: मरीज़-केंद्रित, इक्विटी-ड्रिवन और इनोवेशन-लेड’ रहा।
सम्मेलन में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि भारत ने दवाओं के बड़े पैमाने पर उत्पादन, जेनेरिक मेडिसिन, वैक्सीन निर्माण और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी मजबूत स्थिति स्थापित कर ली है। अब आवश्यकता ऐसी व्यवस्था विकसित करने की है, जिसमें देश के विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, सरकारी प्रयोगशालाओं और निजी उद्योग के बीच बेहतर समन्वय हो तथा प्रयोगशालाओं में विकसित होने वाली खोजों को बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया तेज हो सके।

नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. एम. श्रीनिवास ने कहा कि भारत के पास प्रतिभाशाली मानव संसाधन, वैज्ञानिक संस्थान, उत्पादन क्षमता और आवश्यक बुनियादी ढांचा मौजूद है। इन क्षमताओं को अलग-अलग क्षेत्रों में सीमित रखने के बजाय लक्षित साझेदारियों के माध्यम से एक साथ जोड़ने की आवश्यकता है। उन्होंने अनुसंधान एवं विकास में निवेश बढ़ाने के साथ-साथ अकादमिक संस्थानों और उद्योग के बीच मजबूत सहयोग को समय की आवश्यकता बताया।
उन्होंने इस बात की ओर भी संकेत किया कि भारत को वैश्विक स्तर के संस्थानों और शोध नेटवर्क के साथ अपनी भागीदारी बढ़ानी होगी। इससे देश में होने वाले अनुसंधान की गुणवत्ता और उसकी वैश्विक उपयोगिता दोनों को बढ़ाया जा सकेगा। फार्मा क्षेत्र में केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि नई दवाओं, उपचार पद्धतियों और तकनीकी समाधानों के विकास के लिए दीर्घकालिक निवेश जरूरी होगा।
नियामकीय व्यवस्था में तेजी लाने पर जोर
फार्मास्युटिकल्स विभाग के सचिव मनोज जोशी ने नियामकीय प्रक्रियाओं को अधिक सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आने वाले एक-दो महीनों में नियामकीय व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए जाने की उम्मीद है। आरसीजीएम अनुमोदन, राज्य स्तर की नियामकीय मंजूरियों, सवालों के जवाब तथा विभिन्न संस्थानों में परीक्षण जैसी प्रक्रियाओं को तेज करने की दिशा में काम किया जा रहा है।
उन्होंने समानांतर मंजूरी की व्यवस्था की आवश्यकता पर भी जोर दिया, ताकि अलग-अलग चरणों में लगने वाला समय कम किया जा सके। उनका कहना था कि यदि किसी नए शोध या उत्पाद को कई संस्थानों से अनुमति की आवश्यकता है तो प्रक्रियाओं को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाना चाहिए कि अनावश्यक प्रतीक्षा से अनुसंधान और निवेश प्रभावित न हो।
मनोज जोशी ने कहा कि उद्योग में जोखिम लेने की क्षमता पहले की तुलना में बढ़ रही है। कंपनियां विनिर्माण संयंत्रों के अलावा सीआरडीएमओ, अनुसंधान एवं विकास और नई तकनीकों में निवेश कर रही हैं। ऐसे में सरकार, अकादमिक संस्थानों और उद्योग के बीच बेहतर समन्वय से भारत की शोध क्षमता को नई गति दी जा सकती है।
डिजिटल रेगुलेशन और एआई से बदलेगी प्रक्रिया
ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया डॉ. राजीव सिंह रघुवंशी ने कहा कि नियामकीय सुधारों का उद्देश्य अनुसंधान को आसान बनाने के साथ-साथ पूरी प्रक्रिया को अधिक पूर्वानुमेय बनाना है। उन्होंने अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में कई नियामकीय अनुमतियों को कम करने तथा प्रोटोकॉल तैयार करने की अनुमति संबंधी प्रक्रिया को सरल बनाने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख किया।
उन्होंने बताया कि देश की अधिकांश नियामकीय प्रणालियां अब डिजिटल हो चुकी हैं। इसके साथ ही नए डिजिटल ड्रग रेगुलेटरी सिस्टम, सरल प्रक्रियाओं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित हस्तक्षेप पर भी काम किया जा रहा है। डिजिटल व्यवस्था से आवेदन, अनुमोदन, दस्तावेजीकरण और निगरानी जैसी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है।
उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर क्लिनिकल ट्रायल की गतिविधियां बढ़ रही हैं। ऐसे में भारत को अपनी नियामकीय व्यवस्था को इस प्रकार तैयार करना होगा कि वह अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होने के साथ-साथ देश में शोध और नवाचार के लिए अनुकूल वातावरण भी उपलब्ध कराए।
केवल बड़ा बाजार नहीं, तकनीक का निर्माता बने भारत
नीति आयोग की प्रतिष्ठित फेलो डेबजानी घोष ने स्वास्थ्य क्षेत्र में तकनीकी बदलावों के बीच जिम्मेदार तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल हेल्थ, डेटा आधारित समाधान और अन्य उभरती तकनीकों ने स्वास्थ्य सेवाओं में बड़े बदलाव की संभावनाएं पैदा की हैं। हालांकि तकनीक के उपयोग के साथ उसके नियंत्रण, जिम्मेदारी और प्रभाव से जुड़े सवालों पर भी समान रूप से ध्यान देना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि भारत के सामने केवल दुनिया का एक बड़ा स्वास्थ्य और फार्मा बाजार बनने का अवसर नहीं है। देश के पास ऐसी तकनीक और मानक विकसित करने की क्षमता भी है, जो आने वाले वर्षों में वैश्विक स्वास्थ्य क्षेत्र को प्रभावित कर सकती है। इसके लिए नवाचार के साथ-साथ नीति, नियमन और तकनीकी शासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी।
निजी निवेश और शोध को बढ़ावा देने की जरूरत
सीआईआई की नामित अध्यक्ष डॉ. (श्रीमती) सुचित्रा के. एल्ला ने बायोफार्मा शक्ति के तहत पांच वर्षों में प्रस्तावित 10,000 करोड़ रुपये के निवेश, बायोई3 और एक लाख करोड़ रुपये के अनुसंधान, विकास एवं नवाचार ढांचे को निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।
उन्होंने कहा कि नीतिगत समर्थन किसी भी क्षेत्र के विकास की शुरुआत कर सकता है, लेकिन वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वैज्ञानिक खोजों को तकनीक, उत्पाद और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले व्यावसायिक समाधान में कितनी तेजी से बदला जा सकता है।
उन्होंने कहा कि भारत को केवल विदेशी तकनीक अपनाने या बड़े पैमाने पर उसका निर्माण करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। देश को अपनी तकनीक विकसित करने, बौद्धिक संपदा तैयार करने और वैश्विक बाजार में तकनीकी स्वामित्व स्थापित करने की दिशा में भी आगे बढ़ना होगा।
उन्होंने रोटावैक, जेनवैक और जेनवैक मलेरिया वैक्सीन का उदाहरण देते हुए कहा कि सार्वजनिक संस्थानों और निजी उद्योग के बीच सहयोग से भारत-केंद्रित तथा किफायती स्वास्थ्य समाधान विकसित किए जा सकते हैं। इस प्रकार के उदाहरण यह दर्शाते हैं कि वैज्ञानिक शोध, सरकारी समर्थन और औद्योगिक क्षमता को एक मंच पर लाकर बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य समाधान तैयार किए जा सकते हैं।
जेनेरिक दवाओं से आगे बढ़ने का समय
सीआईआई नेशनल कमेटी ऑन फार्मास्युटिकल्स के चेयरमैन हास तांबे ने कहा कि भारत ने पिछले कई दशकों में फार्मास्युटिकल विनिर्माण, किफायती दवाओं और वैश्विक बाजार में अपनी उपस्थिति की मजबूत नींव तैयार की है। भारतीय कंपनियों ने बड़ी मात्रा में दवाओं का उत्पादन करने के साथ दुनिया के अनेक देशों की स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने में भूमिका निभाई है।
अब फार्मा क्षेत्र के सामने अगली चुनौती वैश्विक नवाचार नेतृत्व की है। फार्मा के साथ बायोटेक्नोलॉजी और बायोफार्मा जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान क्षमता बढ़ाकर भारत नई पीढ़ी के उपचार, वैक्सीन और स्वास्थ्य तकनीकों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उनके अनुसार आने वाले समय में प्रतिस्पर्धा केवल उत्पादन की लागत और मात्रा के आधार पर नहीं होगी। वैज्ञानिक क्षमता, नई खोज, पेटेंट, तकनीकी स्वामित्व और उच्च मूल्य वाले उत्पाद भी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
वॉल्यूम से वैल्यू की ओर बढ़ने की तैयारी
सीआईआई नेशनल कमेटी ऑन फार्मास्युटिकल्स के को-चेयरमैन अमिताभ दुबे ने कहा कि भारत फार्मास्युटिकल क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। सरकार की विभिन्न पहलों से उद्योग को वॉल्यूम आधारित मॉडल से वैल्यू आधारित फार्मास्युटिकल क्षेत्र की ओर ले जाने की मंशा दिखाई देती है।
वॉल्यूम आधारित मॉडल में बड़े पैमाने पर उत्पादन और लागत प्रतिस्पर्धा महत्वपूर्ण होती है, जबकि वैल्यू आधारित मॉडल में नई खोज, उन्नत उपचार, उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद, पेटेंट और तकनीकी क्षमता की भूमिका बढ़ जाती है। भारत के लिए यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे देश की फार्मास्युटिकल अर्थव्यवस्था में उच्च मूल्य वाले अनुसंधान और उत्पादों की हिस्सेदारी बढ़ सकती है।
अकादमिक संस्थानों की भूमिका होगी अहम
सम्मेलन में बार-बार अकादमिक संस्थानों और उद्योग के बीच सहयोग को प्रमुख मुद्दे के रूप में उठाया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि देश के विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में बड़ी संख्या में वैज्ञानिक शोध होते हैं, लेकिन उनमें से हर शोध को व्यावसायिक उत्पाद में बदलने की प्रक्रिया अभी भी लंबी हो सकती है।
ऐसे में उद्योग और शोध संस्थानों के बीच शुरुआती स्तर से सहयोग, साझा प्रयोगशालाएं, संयुक्त परियोजनाएं, तकनीक हस्तांतरण और शोध के लिए निजी निवेश की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो सकती है। इससे प्रयोगशाला में विकसित तकनीक को उत्पाद और बाजार तक पहुंचाने का रास्ता आसान बनाया जा सकता है।
क्लिनिकल रिसर्च में बढ़ सकती है भारत की भूमिका
नियामकीय प्रक्रियाओं में सुधार और डिजिटल सिस्टम के विस्तार से भारत में वैश्विक क्लिनिकल रिसर्च के अवसर भी बढ़ सकते हैं। बड़ी आबादी, विविध रोग-प्रोफाइल, वैज्ञानिक मानव संसाधन और चिकित्सा संस्थानों का नेटवर्क भारत को क्लिनिकल रिसर्च के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।
हालांकि इसके साथ मरीजों की सुरक्षा, नैतिक मानकों, डेटा सुरक्षा और पारदर्शिता को प्राथमिकता देना भी जरूरी होगा। नियामकीय व्यवस्था को तेज बनाने के साथ यह सुनिश्चित करना होगा कि शोध की गुणवत्ता और प्रतिभागियों के अधिकारों से कोई समझौता न हो।
बायोफार्मा क्षेत्र में नई संभावनाएं
भारत के लिए बायोफार्मास्युटिकल क्षेत्र आने वाले वर्षों में नए अवसरों का क्षेत्र बन सकता है। वैक्सीन, बायोलॉजिक्स, सेल एवं जीन आधारित उपचार, उन्नत डायग्नोस्टिक्स और अन्य जैव-आधारित तकनीकों में दुनिया भर में तेजी से अनुसंधान हो रहा है।
इस क्षेत्र में सफलता के लिए केवल वैज्ञानिक प्रतिभा ही पर्याप्त नहीं होगी। उच्च स्तरीय प्रयोगशालाएं, दीर्घकालिक पूंजी, नियामकीय विशेषज्ञता, कुशल मानव संसाधन और उद्योग-अकादमिक साझेदारी की आवश्यकता होगी। सम्मेलन में हुई चर्चा से संकेत मिला कि भारत इन सभी क्षेत्रों को एक साथ मजबूत करने की दिशा में प्रयास कर रहा है।
मरीज-केंद्रित फार्मा मॉडल पर जोर
शिखर सम्मेलन के केंद्रीय विषय में मरीज-केंद्रित दृष्टिकोण को प्रमुख स्थान दिया गया। इसका अर्थ केवल नई दवा विकसित करना नहीं, बल्कि ऐसी स्वास्थ्य तकनीक और उपचार व्यवस्था तैयार करना है जो मरीजों की वास्तविक जरूरतों, पहुंच और सामर्थ्य को ध्यान में रखे।
भारत जैसे बड़े और विविध देश में स्वास्थ्य नवाचार की सफलता इस बात से भी जुड़ी होगी कि नई तकनीक और उपचार कितने लोगों तक पहुंच पाते हैं। इसलिए नवाचार के साथ किफायतीपन, उपलब्धता और समान पहुंच को भी महत्व देना होगा।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत स्थिति
भारत पहले ही वैश्विक फार्मास्युटिकल आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आने वाले समय में देश की चुनौती इस स्थिति को बनाए रखने के साथ उच्च तकनीक वाले उत्पादों और शोध-आधारित फार्मास्युटिकल समाधान में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की होगी।
वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी प्रकार का व्यवधान देशों को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश के लिए प्रेरित करता है। ऐसे वातावरण में भारत के लिए विनिर्माण क्षमता के साथ शोध और तकनीकी स्वामित्व को मजबूत करना दीर्घकालिक रणनीतिक महत्व रखता है।
बौद्धिक संपदा पर भी बढ़ाना होगा ध्यान
फार्मा क्षेत्र में वैश्विक नवाचार नेतृत्व के लिए पेटेंट और बौद्धिक संपदा की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। यदि भारत में विकसित नई तकनीकों और उपचारों का बौद्धिक स्वामित्व देश की कंपनियों और शोध संस्थानों के पास रहता है, तो इससे वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ सकती है।
इसके लिए वैज्ञानिक शोध को पेटेंट योग्य तकनीक में बदलने, शोधकर्ताओं को बौद्धिक संपदा के प्रति जागरूक करने तथा विश्वविद्यालयों और उद्योग के बीच तकनीक हस्तांतरण की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत होगी।
एआई और डिजिटल हेल्थ बनेंगे परिवर्तन के आधार
स्वास्थ्य क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल आने वाले वर्षों में और बढ़ने की संभावना है। दवा खोज, क्लिनिकल रिसर्च, रोग की पहचान, मरीजों की निगरानी, डेटा विश्लेषण और स्वास्थ्य सेवाओं के प्रबंधन में डिजिटल तकनीक नई संभावनाएं खोल रही है।
हालांकि विशेषज्ञों ने तकनीक के जिम्मेदार इस्तेमाल पर भी जोर दिया। स्वास्थ्य क्षेत्र में तकनीक का उपयोग करते समय डेटा की गुणवत्ता, गोपनीयता, पारदर्शिता और मानव निगरानी जैसे पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह नवाचार को प्रोत्साहित करते हुए इसके लिए भरोसेमंद नियामकीय ढांचा भी तैयार करे।
रोजगार और कौशल विकास के नए अवसर
फार्मा और लाइफसाइंसेज क्षेत्र में अनुसंधान और तकनीकी निवेश बढ़ने से उच्च कौशल वाले रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं। बायोटेक्नोलॉजी, डेटा साइंस, एआई, क्लिनिकल रिसर्च, रेगुलेटरी अफेयर्स, पेटेंट कानून और उन्नत विनिर्माण जैसी विशेषज्ञताओं की मांग बढ़ सकती है।
इसलिए उच्च शिक्षा संस्थानों और उद्योग के बीच कौशल विकास कार्यक्रमों को बढ़ावा देना भी जरूरी होगा। यदि देश में शोध के साथ आवश्यक विशेषज्ञ मानव संसाधन उपलब्ध होता है, तो इससे भारत की नवाचार क्षमता को लंबे समय तक मजबूती मिल सकती है।
भारत के सामने अवसर के साथ चुनौतियां भी
भारत के फार्मा क्षेत्र के सामने संभावनाएं व्यापक हैं, लेकिन वैश्विक नवाचार नेतृत्व हासिल करने की राह में कई चुनौतियां भी हैं। अनुसंधान में लंबे समय तक पूंजी निवेश, उच्च जोखिम वाली परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहयोग, प्रयोगशाला से बाजार तक तकनीक पहुंचाने की प्रक्रिया, कुशल वैज्ञानिक मानव संसाधन और वैश्विक नियामकीय मानकों के अनुरूप उत्पाद तैयार करना प्रमुख मुद्दे होंगे।
इसके अलावा नवाचार का लाभ केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित न रहे, इसके लिए स्टार्टअप और छोटे एवं मध्यम उद्यमों को भी शोध और निवेश की सुविधाएं उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण होगा।
सम्मेलन में सामने आए विचारों से स्पष्ट है कि भारत के फार्मास्युटिकल क्षेत्र की दिशा अब धीरे-धीरे बदल रही है। देश ने सस्ती दवाओं और बड़े पैमाने पर विनिर्माण के क्षेत्र में मजबूत पहचान बनाई है। अगला लक्ष्य शोध, तकनीक, बौद्धिक संपदा और उच्च मूल्य वाले उत्पादों के माध्यम से वैश्विक स्तर पर अपनी भूमिका का विस्तार करना है।
यदि सरकार, उद्योग, अकादमिक संस्थान और वैज्ञानिक समुदाय मिलकर अनुसंधान एवं नवाचार के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करते हैं, तो भारत फार्मा क्षेत्र में केवल वैश्विक उत्पादन केंद्र के रूप में ही नहीं, बल्कि नई स्वास्थ्य तकनीकों और उपचारों के विकास के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में भी अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।

