नई दिल्ली, 18 सितम्बर 2026 (यूटीएन)। किसी मरीज के लिए बीमारी से राहत पाने के लिए अस्पताल और चिकित्सक के पास जाना उपचार की पहली सीढ़ी है, लेकिन सुरक्षित और सही उपचार मिलना उतना ही महत्वपूर्ण है। गलत निदान, गलत दवा, दवा की गलत मात्रा, उपचार में लापरवाही अथवा स्वास्थ्यकर्मियों और मरीज के बीच पर्याप्त संवाद का अभाव कई बार बीमारी की जटिलता बढ़ा सकता है। इससे उपचार की अवधि और खर्च बढ़ने के साथ मरीज तथा उसके परिवार पर मानसिक और आर्थिक दबाव भी बढ़ सकता है। ऐसे में स्वास्थ्य व्यवस्था में रोगी सुरक्षा को उपचार का अभिन्न हिस्सा बनाए जाने की आवश्यकता है।
विश्व रोगी सुरक्षा दिवस 2026 के अवसर पर यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज (यूसीएमएस) में आयोजित कार्यशाला में विशेषज्ञों ने इसी विषय पर विस्तार से चर्चा की। कार्यशाला में इस बात पर जोर दिया गया कि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि मरीज को उपचार मिला या नहीं, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि उपचार के दौरान उसे रोकथाम योग्य किसी प्रकार की क्षति तो नहीं हुई।
कार्यशाला में नेशनल हेल्थ सिस्टम रिसोर्स सेंटर (एनएचएसआरसी) के सलाहकार (गुणवत्ता एवं रोगी सुरक्षा) डॉ. आर.के. पथनी ने कहा कि इलाज का पहला सिद्धांत मरीज को नुकसान से बचाना होना चाहिए। उन्होंने रोगी सुरक्षा को स्वास्थ्य व्यवस्था की सामूहिक जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि सुरक्षित स्वास्थ्य सेवा के लिए चिकित्सकों के साथ नर्सिंग स्टाफ, सहयोगी कर्मचारी, मरीज और देखभालकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।
इस कार्यशाला का आयोजन नेशनल थैलेसीमिया वेलफेयर सोसाइटी ने यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज, गुरु तेग बहादुर अस्पताल, पीएफपीएस इंडिया, विश्व रोगी गठबंधन और आईडिया के सहयोग से किया। इस वर्ष विश्व रोगी सुरक्षा दिवस का विषय “गैर-संचारी रोगों के लिए सुरक्षित देखभाल” रखा गया है।
सुरक्षित उपचार केवल डॉक्टर की जिम्मेदारी नहीं
डॉ. आर.के. पथनी ने कहा कि रोगी सुरक्षा को किसी एक डॉक्टर, नर्स अथवा अस्पताल की जिम्मेदारी मानना उचित नहीं है। अस्पताल में मरीज के आने से लेकर जांच, निदान, दवा, उपचार, निगरानी और छुट्टी के बाद की देखभाल तक अनेक स्तरों पर अलग-अलग स्वास्थ्यकर्मी जुड़े होते हैं।
ऐसे में उपचार की पूरी प्रक्रिया में समन्वय और स्पष्ट संवाद महत्वपूर्ण हो जाता है। मरीज की बीमारी, दवाओं, पहले से चल रहे उपचार और किसी दवा से होने वाली संभावित प्रतिक्रिया की जानकारी स्वास्थ्यकर्मियों तक सही तरीके से पहुंचना भी सुरक्षित उपचार का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि मरीज और उसके परिवार को भी अपनी बीमारी तथा उपचार को समझने के लिए चिकित्सकों से सवाल पूछने चाहिए। किसी दवा के संबंध में संदेह होने पर जानकारी लेना, निर्धारित उपचार का सही तरीके से पालन करना और असामान्य लक्षण सामने आने पर समय पर स्वास्थ्यकर्मी को जानकारी देना रोगी सुरक्षा को मजबूत करता है।
एसओपी का असर कागजों पर नहीं, अस्पतालों में भी दिखे
यूसीएमएस के प्रिंसिपल डॉ. धीरज शाह ने रोगी सुरक्षा के मूल सिद्धांत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “पहले कोई नुकसान नहीं होता” की भावना स्वास्थ्य सेवाओं के केंद्र में होनी चाहिए। स्वास्थ्य सेवा के दौरान मरीज को होने वाली ऐसी क्षति को रोकना आवश्यक है, जिसे उचित व्यवस्था और सावधानी से टाला जा सकता है।
उन्होंने अस्पतालों में तैयार की जाने वाली नीतियों और एसओपी यानी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया। उनका कहना था कि अस्पतालों में नियम और प्रक्रियाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। इनका वास्तविक पालन भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
अस्पतालों में विभिन्न प्रक्रियाओं के लिए एसओपी तैयार करने का उद्देश्य स्वास्थ्यकर्मियों के लिए स्पष्ट कार्यप्रणाली उपलब्ध कराना है। यदि किसी प्रक्रिया के प्रत्येक चरण के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश हों और कर्मचारी उनका नियमित रूप से पालन करें, तो उपचार संबंधी गलतियों की संभावना कम करने में मदद मिल सकती है।
डॉ. शाह ने कहा कि किसी भी नीति की सार्थकता तभी है जब उसका लाभ सीधे मरीज तक पहुंचे। अस्पताल की व्यवस्था, कर्मचारियों की कार्यप्रणाली और मरीज की देखभाल में यदि निर्धारित मानकों का वास्तविक रूप से पालन हो रहा है, तभी रोगी सुरक्षा के उद्देश्य को पूरा किया जा सकता है।
गैर-संचारी रोगों में लंबे उपचार के साथ सुरक्षा चुनौती
कार्यशाला में गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) से जुड़े रोगी सुरक्षा पहलुओं पर विशेष चर्चा हुई। मधुमेह, हृदय संबंधी बीमारियां, मोटापा और अन्य लंबे समय तक चलने वाली स्वास्थ्य समस्याओं में मरीज को अक्सर लंबे समय तक उपचार और नियमित निगरानी की आवश्यकता होती है।
ऐसे मामलों में मरीज की सुरक्षा केवल अस्पताल में उपचार तक सीमित नहीं रहती। दवाओं का नियमित सेवन, जांच, खान-पान, शारीरिक गतिविधि, चिकित्सकीय सलाह का पालन और समय-समय पर स्वास्थ्य स्थिति की समीक्षा भी उपचार प्रक्रिया का हिस्सा बन जाती है।
विशेषज्ञों ने इस बात पर बल दिया कि लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों में मरीज और देखभालकर्ता को उपचार की पूरी प्रक्रिया के बारे में पर्याप्त जानकारी होना जरूरी है। इससे मरीज अपने स्वास्थ्य से संबंधित निर्णयों में अधिक सक्रिय रूप से भाग ले सकता है।
थैलेसीमिया मरीजों में आयरन ओवरलोड पर नजर जरूरी
कार्यशाला में थैलेसीमिया से जुड़े रोगी सुरक्षा पहलुओं पर भी विस्तार से चर्चा हुई। विश्व स्वास्थ्य संगठन सलाहकार समूह और मरीज़ों के लिए मरीज़ सुरक्षा कार्यक्रम के सदस्य डॉ. जे.एस. अरोड़ा ने कहा कि विश्व रोगी सुरक्षा दिवस 2026 का उद्देश्य गैर-संचारी रोगों से जुड़ी रोगी सुरक्षा चुनौतियों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
उन्होंने मोटापा और मधुमेह के बीच संबंध का उल्लेख करते हुए स्वस्थ खान-पान और जीवनशैली अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि गैर-संचारी रोगों से बचाव और नियंत्रण में जीवनशैली की भूमिका महत्वपूर्ण है।
थैलेसीमिया मरीजों के संदर्भ में उन्होंने बताया कि बार-बार रक्त चढ़ाए जाने के कारण शरीर में आयरन जमा होने की समस्या उत्पन्न हो सकती है। अतिरिक्त आयरन का प्रभाव शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर पड़ सकता है। इसलिए ऐसे मरीजों की नियमित निगरानी और आयरन ओवरलोड की समय पर पहचान उपचार सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने मरीजों और देखभालकर्ताओं को उपचार के प्रति जागरूक और सक्रिय रहने का संदेश दिया। डॉ. अरोड़ा ने “जीवन खाली नहीं है—सुरक्षित देखभाल का पालन करें” का संदेश देते हुए कहा कि सुरक्षित उपचार में मरीज की सक्रिय भागीदारी भी महत्वपूर्ण है।
नियमित निगरानी से बढ़ती है उपचार की सुरक्षा
थैलेसीमिया जैसे लंबे समय तक उपचार की आवश्यकता वाले मामलों में मरीज की स्वास्थ्य स्थिति पर लगातार नजर रखना जरूरी होता है। नियमित जांच और चिकित्सकीय निगरानी से उपचार से जुड़े संभावित जोखिमों को समय रहते पहचानने में मदद मिल सकती है।
विशेषज्ञों ने यह भी रेखांकित किया कि मरीजों और उनके परिवारों को उपचार के दौरान सामने आने वाली किसी भी असामान्य समस्या को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। चिकित्सक द्वारा दी गई सलाह, जांच और फॉलोअप को समय पर पूरा करना सुरक्षित देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
‘हर दिन रोगी सुरक्षा दिवस’
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र के पूर्व कार्यकारी निदेशक डॉ. संजीव कुमार ने कहा कि रोगी सुरक्षा केवल विश्व रोगी सुरक्षा दिवस तक सीमित रहने वाला विषय नहीं है। उन्होंने इसे स्वास्थ्य सेवा की दैनिक कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि डॉक्टर, नर्स, सहयोगी स्वास्थ्यकर्मी, मरीज और देखभालकर्ता—सभी रोगी सुरक्षा के लिए जिम्मेदार हैं। अस्पताल में उपचार की प्रक्रिया जितनी सामूहिक होती है, उतनी ही सामूहिक जिम्मेदारी मरीज की सुरक्षा की भी है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी स्वास्थ्य संस्थान में रोगी सुरक्षा की संस्कृति विकसित करना केवल नियम बनाने से संभव नहीं है। इसके लिए नियमित प्रशिक्षण, प्रक्रियाओं की समीक्षा, कर्मचारियों के बीच बेहतर संवाद और मरीजों की भागीदारी आवश्यक है।
अस्पतालों की जरूरत के अनुसार बनें एसओपी
कार्यशाला में श्रीमती विनिता श्रीवास्तव ने अस्पतालों में एसओपी समितियों के माध्यम से तैयार किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि अस्पतालों की जरूरतें और कार्यप्रणाली अलग-अलग हो सकती हैं, इसलिए संस्थानों को अपनी आवश्यकताओं और योजनाओं को सरकार के समक्ष रखना चाहिए।
उनके अनुसार अस्पतालों से मिलने वाला व्यावहारिक अनुभव नीतियां बनाने और उनमें सुधार करने में उपयोगी हो सकता है। स्वास्थ्य संस्थानों में सामने आने वाली वास्तविक समस्याओं को नीति निर्माण के स्तर तक पहुंचाने से व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है।
इस चर्चा में यह भी संदेश सामने आया कि रोगी सुरक्षा की व्यवस्था ऊपर से नीचे तक लागू होने वाली प्रक्रिया के साथ-साथ अस्पतालों के अनुभव और स्थानीय आवश्यकताओं से भी जुड़ी होनी चाहिए।
डिजिटल हेल्थ में आभा की भूमिका
कार्यशाला में आभा नंबर को लेकर भी चर्चा हुई। आभा यानी आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था में व्यक्ति की विशिष्ट पहचान से जुड़ी व्यवस्था है। इसका उद्देश्य व्यक्ति के स्वास्थ्य रिकॉर्ड को डिजिटल स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र से जोड़ने में सुविधा प्रदान करना है।
डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था में मरीज की जानकारी तक अधिक व्यवस्थित पहुंच उपचार प्रक्रिया में उपयोगी हो सकती है। अलग-अलग स्वास्थ्य सेवाओं के दौरान मरीज के स्वास्थ्य संबंधी रिकॉर्ड उपलब्ध होने से चिकित्सकों को उपचार संबंधी जानकारी समझने में सहायता मिल सकती है।
हालांकि डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ मरीज की निजी स्वास्थ्य जानकारी की सुरक्षा और उचित उपयोग भी महत्वपूर्ण विषय हैं। स्वास्थ्य रिकॉर्ड से जुड़ी किसी भी डिजिटल व्यवस्था में डेटा की सुरक्षा, गोपनीयता और अधिकृत उपयोग को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
मरीज को भी पूछना चाहिए सवाल
कार्यशाला में सामने आए विचारों का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि रोगी सुरक्षा केवल स्वास्थ्यकर्मियों की जिम्मेदारी नहीं है। मरीज और उसके परिवार की जागरूकता भी उपचार को सुरक्षित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
मरीज को अपनी बीमारी, निर्धारित दवाओं, उनकी खुराक और उपचार की अवधि के बारे में आवश्यक जानकारी हासिल करनी चाहिए। यदि किसी दवा को लेकर भ्रम हो अथवा पहले से कोई दवा चल रही हो, तो इसकी जानकारी चिकित्सक को देना जरूरी है।
इसी प्रकार अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी चिकित्सकीय सलाह और फॉलोअप का पालन करना उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। देखभालकर्ता की भूमिका ऐसे मरीजों में और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, जो स्वयं अपनी दवाओं या नियमित जांच का प्रबंधन करने में सक्षम नहीं होते।
दवा संबंधी गलतियों को रोकना भी रोगी सुरक्षा
रोगी सुरक्षा की चर्चा में दवाओं का सही इस्तेमाल महत्वपूर्ण विषय है। किसी मरीज को सही दवा, सही मात्रा और सही समय पर मिलना उपचार प्रक्रिया का बुनियादी हिस्सा है।
दवा लिखने, उपलब्ध कराने और मरीज को देने की प्रक्रिया में स्पष्टता जरूरी होती है। मरीज को भी दवा का नाम, उपयोग और चिकित्सकीय निर्देश समझना चाहिए। किसी दवा से असामान्य प्रतिक्रिया होने पर तुरंत स्वास्थ्यकर्मी को जानकारी देना उपचार सुरक्षा का हिस्सा है।
अस्पतालों में ऐसी प्रक्रियाओं का पालन करने पर जोर दिया जाता है जिससे उपचार के विभिन्न चरणों में होने वाली संभावित गलतियों को कम किया जा सके।
प्रशिक्षण और संवाद पर जोर
विशेषज्ञों ने कहा कि रोगी सुरक्षा को मजबूत करने के लिए स्वास्थ्यकर्मियों का नियमित प्रशिक्षण भी आवश्यक है। चिकित्सा क्षेत्र में उपचार पद्धतियां, तकनीक और प्रक्रियाएं लगातार विकसित होती रहती हैं। ऐसे में कर्मचारियों को नई व्यवस्थाओं और सुरक्षा मानकों से परिचित कराते रहना जरूरी है।
इसके साथ ही अस्पताल में विभिन्न विभागों के बीच संवाद भी महत्वपूर्ण है। मरीज की जानकारी एक विभाग से दूसरे विभाग तक सही तरीके से पहुंचने पर उपचार में निरंतरता बनाए रखने में सहायता मिलती है।
युवाओं ने पोस्टर के जरिए दिया सुरक्षा का संदेश
कार्यशाला में युवा डॉक्टरों और चिकित्सा विद्यार्थियों के लिए पोस्टर प्रतियोगिता भी आयोजित की गई। प्रतियोगिता में प्रतिभागियों ने रोगी सुरक्षा और गैर-संचारी रोगों से जुड़े विषयों पर अपने विचार रचनात्मक तरीके से प्रस्तुत किए।
“आज ही रोकें – कल सुरक्षित रखें” और “स्व-देखभाल – एनसीडी में सुरक्षित देखभाल” जैसे विषयों पर प्रतिभागियों ने पोस्टर तैयार किए। पोस्टरों के माध्यम से बीमारी की रोकथाम, सुरक्षित उपचार, स्वस्थ जीवनशैली और मरीज की सक्रिय भूमिका जैसे विषयों को सामने रखा गया।
दोनों वर्गों में सर्वश्रेष्ठ दो-दो पोस्टरों को प्रमाणपत्र और नकद पुरस्कार दिए गए। प्रतियोगिता में शामिल अन्य प्रतिभागियों को भी प्रशंसा प्रमाणपत्र प्रदान किए गए।
120 से अधिक प्रतिभागियों की भागीदारी
कार्यशाला में 120 से अधिक रेजिडेंट डॉक्टरों, स्नातक एवं स्नातकोत्तर विद्यार्थियों, नर्सों, नर्सिंग विद्यार्थियों, मरीजों और देखभालकर्ताओं ने भाग लिया। विभिन्न वर्गों की भागीदारी ने कार्यशाला को केवल चिकित्सकीय विशेषज्ञों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसमें मरीज और उनके साथ रहने वाले देखभालकर्ताओं को भी शामिल किया।
कार्यक्रम में हुई चर्चा से यह संदेश सामने आया कि सुरक्षित स्वास्थ्य सेवा के लिए चिकित्सा संस्थान और मरीज के बीच साझेदारी आवश्यक है। चिकित्सक उपचार की दिशा तय करते हैं, स्वास्थ्यकर्मी उपचार को लागू करते हैं और मरीज व देखभालकर्ता उपचार को समझकर उसके पालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
रोकथाम योग्य नुकसान पर हो विशेष ध्यान
स्वास्थ्य सेवा में रोगी सुरक्षा का मूल उद्देश्य ऐसी क्षति को कम करना है जिसे उचित सावधानी, स्पष्ट प्रक्रिया और बेहतर व्यवस्था के माध्यम से रोका जा सकता है। इसके लिए अस्पतालों को अपनी प्रक्रियाओं की नियमित समीक्षा करनी होती है।
किसी घटना के बाद केवल गलती करने वाले व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने के बजाय यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि ऐसी स्थिति पैदा क्यों हुई और भविष्य में उसे रोकने के लिए व्यवस्था में क्या सुधार किया जा सकता है। इससे अस्पतालों में सुरक्षा की संस्कृति विकसित करने में मदद मिल सकती है।
एनसीडी के दौर में सुरक्षित देखभाल की बढ़ती जरूरत
गैर-संचारी रोग लंबे समय तक चलने वाली स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं और कई मामलों में मरीज को वर्षों तक उपचार तथा निगरानी की जरूरत होती है। इसलिए इन रोगों के मामले में रोगी सुरक्षा का दायरा भी व्यापक हो जाता है।
मरीज को केवल बीमारी का उपचार नहीं चाहिए, बल्कि उसे ऐसा उपचार चाहिए जिसे वह सुरक्षित रूप से लंबे समय तक जारी रख सके। इसके लिए दवा, जांच, खान-पान, जीवनशैली, फॉलोअप और चिकित्सकीय परामर्श के बीच तालमेल जरूरी है।
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने इसी व्यापक दृष्टिकोण पर चर्चा करते हुए सुरक्षित देखभाल को स्वास्थ्य व्यवस्था की नियमित कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाने की आवश्यकता बताई।
कार्यशाला से मिला व्यापक संदेश
विश्व रोगी सुरक्षा दिवस 2026 के अवसर पर आयोजित इस कार्यशाला में अलग-अलग वक्ताओं ने रोगी सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं को सामने रखा। डॉ. आर.के. पथनी ने सामूहिक जिम्मेदारी पर जोर दिया, डॉ. धीरज शाह ने एसओपी के वास्तविक क्रियान्वयन को जरूरी बताया, डॉ. जे.एस. अरोड़ा ने गैर-संचारी रोगों और थैलेसीमिया से जुड़े सुरक्षा पहलुओं पर प्रकाश डाला, जबकि डॉ. संजीव कुमार ने रोगी सुरक्षा को हर दिन की स्वास्थ्य सेवा का हिस्सा बनाने की बात कही।
कार्यक्रम में आभा नंबर और डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था पर चर्चा के साथ युवाओं को पोस्टर प्रतियोगिता के माध्यम से रोगी सुरक्षा का संदेश देने का अवसर मिला। 120 से अधिक प्रतिभागियों की मौजूदगी ने यह स्पष्ट किया कि रोगी सुरक्षा का विषय चिकित्सकों तक सीमित नहीं है।
सुरक्षित इलाज ही गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा की पहचान
कार्यशाला का व्यापक संदेश यही रहा कि बीमारी का इलाज करना चिकित्सा व्यवस्था का एक पक्ष है, जबकि उपचार के दौरान मरीज को संभावित नुकसान से बचाना उसका उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। सही निदान, सुरक्षित दवा, स्पष्ट उपचार प्रक्रिया, एसओपी का पालन, नियमित निगरानी, डिजिटल स्वास्थ्य साधनों का उचित उपयोग और मरीज की सक्रिय भागीदारी—इन सभी के समन्वय से रोगी सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि “रोगी सुरक्षा दिवस” केवल जागरूकता का एक वार्षिक अवसर न होकर अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में हर दिन लागू होने वाली कार्यसंस्कृति बने। जब डॉक्टर, नर्स, अन्य स्वास्थ्यकर्मी, मरीज और देखभालकर्ता एक-दूसरे के साथ बेहतर समन्वय से काम करेंगे, तभी सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा का लक्ष्य मजबूत होगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।

