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जयगुरुदेव आश्रम में चल रहे चौदहवें वार्षिक भंडारा सत्संग मेला

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बाबा जयगुरुदेव जी महाराज ने भूमि जो तक खेतिहर काश्तकार संगठन बनाकर यह संकेत दिया था कि आने वाली  प्राकृतिक आपदाओं व बीमारियों में शहर की अपेक्षाकृत गांव सुरक्षित रहेंगे।

मथुरा,18 मई 2026  (यूटीएन)। जयगुरुदेव आश्रम में चल रहे चौदहवें वार्षिक भंडारा सत्संग मेला के दूसरे दिन राष्ट्रीय उपदेशक बाबूराम व सतीश चन्द्र जी ने सृष्टि की रचना के बारे में बताया कि रचना के विस्तार के दो भाग हैं। पहला सतलोक की रचना और दूसरा काल दोष की रचना। काल प्रभु ने चौथे पद सत्पुरुष का भेद गुप्त कर पाप-पुण्य का विधान बनाकर विविध प्रकार के पूजा पाठ में भरवा दिया। मनुष्य सुरत-शब्द के भेद को भूल गया और काल प्रभु की रचना में फंस गया।  संतों ने सुरत शब्द के भेद को पांचवा वेद बताया है। चार वेदों में सतलोक का उल्लेख नहीं है। इसमें केवल ब्रह्म तक का उल्लेख मिलता है। उन्होंने आगे कहा कि मानव जन्म आत्मा की रक्षा के लिये मिला है।

लेकिन मनुष्य भौतिक विकास, शरीर को सजाने और उसको बचाने के उपायों में सारा समय निकाल देता है। बौद्धिक विकास होने के कारण मनुष्य को चिंता करना चाहिये कि चींटी में भी इतनी बुद्धि होती है कि वह अपने भोजन की तलाश कर लेती है। हम लोग जितना ही अधिक प्रकृति के करीब रहेंगे उतना ही सुखी रहेंगे। बाबा जयगुरुदेव जी महाराज ने भूमि जो तक खेतिहर काश्तकार संगठन बनाकर यह संकेत दिया था कि आने वाली  प्राकृतिक आपदाओं व बीमारियों में शहर की अपेक्षाकृत गांव सुरक्षित रहेंगे। जहां आबादी अधिक होगी वहां प्रदूषण भी अधिक होगा। हवा, पानी, मिट्टी को प्रदूषित हो जाता है। जहां तापमान अधिक होता है वहां आक्सीजन कम हो जाता है।

षहरों में बड़े-बड़े मकानों एवं ए.सी. का उपयोग तापमान को बढ़ाते हैं। भौतिक विकास के दौर में वनस्पतियों का क्षेत्रफल घटता जा रहा है। जो मानव के लिये गम्भीर खतरा पैदा  करेंगी । प्रकृति पार प्रभु सब उर वासी’’ पंक्ति को उद्धृत करते हुये बाबूराम जी ने कहा कि परमात्मा प्रकृति के पार रहता है लेकिन सबके हृदय में बसता है। यह उसी प्रकार है जिस प्रकार एक सूर्य की छाया पानी से भरे करोड़ो घड़ों में दिखाई देता है। बाबा जयगुरुदेव जी महाराज बताया करते थे कि जीवात्मा की बैठक षरीर के अन्दर दोनों आंखों के मध्य भाग में पीछे की तरफ दो दल कमल पर है। इसके नीचे कण्ठ, हृदय, नाभि, लिंग और गुदा चक्रों पर उसका प्रकाश फैला है।

मौत के समय गुदा चक्र से प्रकाश का सिमटाव होता है। चक्रों के टूटने से असहनीय वेदना होती है। सतयुग में जीव कल्याण के लिये योग और प्राणायाम की क्रियायें थी। त्रेता में यज्ञ का विधान, द्वापर में मूर्ति की पूजा और कलयुग में नाम योग साधना है। नाम योग साधना के अभ्यास से प्रकाष का सिमटाव होता है और मौत की पीड़ा से बचाव होता है। 19 मई को प्रातः 5 बचे पूज्य पंकज जी महाराज अपने सत्संग में नाम योग साधना का भेद बतायेंगे। श्रद्धालुओं के आने का क्रम जारी है।







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