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सड़क दुर्घटनाओं की बड़ी वजह है अतिक्रमण : क्या प्रशासन कभी जगेगा?

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नई दिल्ली, 12 अप्रैल 2026 (यूटीएन)। भारत आज जिस तेजी से विकास और शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है, उसी अनुपात में उसकी सड़कें, यातायात व्यवस्था और सार्वजनिक स्थानों पर दबाव भी बढ़ता जा रहा है। यह दबाव केवल भीड़ का परिणाम नहीं है, बल्कि अव्यवस्थित शहरी प्रबंधन और लगातार बढ़ते अतिक्रमण का भी प्रत्यक्ष परिणाम है। सड़कें, जो किसी भी देश की जीवनरेखा मानी जाती हैं, आज स्वयं ही असुरक्षा का कारण बनती जा रही हैं। भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 में देश में 461312 सड़क दुर्घटनाएँ हुईं, जिनमें 168491 लोगों की मृत्यु हुई और 443366 लोग घायल हुए, और यह आँकड़े स्वयं मंत्रालय द्वारा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से प्राप्त पुलिस डाटा पर आधारित हैं। यह केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हर दिन औसतन लगभग 461 मौतों की भयावह सच्चाई हैं, जो यह बताती हैं कि सड़क सुरक्षा भारत के लिए एक आपातकालीन विषय बन चुका है।

इन दुर्घटनाओं के पीछे अनेक कारण बताए जाते हैं, जैसे तेज गति, लापरवाही, शराब पीकर वाहन चलाना आदि, लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा कारण है जो हर शहर, कस्बे और गांव में दिखाई देता है, फिर भी नीति और विमर्श में अपेक्षाकृत कम चर्चा का विषय बनता है, और वह है सड़कों और फुटपाथों पर अतिक्रमण। अतिक्रमण केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन चुका है। जब सड़कें अपने निर्धारित आकार और उपयोग से हटकर संकरी, अवरुद्ध और अव्यवस्थित हो जाती हैं, तब दुर्घटनाएँ अनिवार्य हो जाती हैं।

भारत के अधिकांश शहरों में सड़कों की वास्तविक चौड़ाई और उपयोगी चौड़ाई में भारी अंतर देखने को मिलता है। कागजों पर 12 मीटर चौड़ी सड़क व्यवहार में कई बार 6 या 7 मीटर ही रह जाती है, क्योंकि दोनों ओर दुकानें, ठेले, निर्माण सामग्री, अवैध पार्किंग और अन्य प्रकार के अतिक्रमण सड़क के बड़े हिस्से को घेर लेते हैं। इससे न केवल वाहन चालकों के लिए मार्ग संकरा हो जाता है, बल्कि अचानक सामने आने वाली बाधाओं के कारण टक्कर की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। यह समस्या छोटे शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि महानगरों में भी उतनी ही गंभीर है, जहाँ आर्थिक गतिविधियाँ अधिक होने के कारण अतिक्रमण और भी व्यापक रूप ले लेता है।

फुटपाथों का अतिक्रमण इस समस्या का सबसे गंभीर पहलू है। फुटपाथ पैदल चलने वालों की सुरक्षा के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि देश के कई शहरों में या तो फुटपाथ हैं ही नहीं, और जहाँ हैं भी, वहाँ वे पूरी तरह अतिक्रमण की चपेट में हैं। एक अध्ययन के अनुसार आंध्र प्रदेश के प्रमुख शहरों में लगभग 70 प्रतिशत सड़कों पर फुटपाथ उपलब्ध ही नहीं हैं या मानकों के अनुरूप नहीं हैं, और यह तथ्य परिवहन अनुसंधान संस्थानों के अध्ययन में सामने आया है। इसका सीधा परिणाम यह होता है कि पैदल यात्री सड़क पर चलने को मजबूर होते हैं, जिससे दुर्घटनाओं का जोखिम अत्यधिक बढ़ जाता है।

कई राज्यों में तो पैदल यात्रियों की मृत्यु दर अत्यंत चिंताजनक है। उदाहरण के तौर पर एक आधिकारिक रिपोर्ट के हवाले से यह तथ्य सामने आया कि एक राज्य में प्रतिदिन औसतन 4 पैदल यात्रियों की मृत्यु सड़क दुर्घटनाओं में हो रही है, और इनमें से लगभग 20 प्रतिशत मौतें पैदल यात्रियों की होती हैं, जिसका प्रमुख कारण सुरक्षित फुटपाथों की अनुपस्थिति और उनका अतिक्रमण है। यह स्थिति केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में लगभग यही स्थिति है।

अतिक्रमण का एक अन्य गंभीर रूप है अवैध पार्किंग। जब सड़कों के किनारे वाहन अनियंत्रित रूप से खड़े कर दिए जाते हैं, तो सड़क की उपयोगी चौड़ाई कम हो जाती है और यातायात का प्रवाह बाधित होता है। कई बार अचानक खड़ी गाड़ी के पीछे से आ रहे वाहन टकरा जाते हैं, जिससे गंभीर दुर्घटनाएँ होती हैं। शहरी क्षेत्रों में यह समस्या इतनी व्यापक है कि कई जगह सड़क का आधा हिस्सा स्थायी पार्किंग में बदल चुका है।

इस पूरी समस्या का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह सब कुछ खुलेआम हो रहा है और प्रशासन अक्सर मूकदर्शक बना रहता है। समय-समय पर अतिक्रमण हटाने के अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन वे अल्पकालिक और औपचारिक होते हैं। कुछ दिनों के लिए सड़कें साफ दिखाई देती हैं, लेकिन उसके बाद स्थिति फिर से पहले जैसी हो जाती है। इसका कारण केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं है, बल्कि राजनीतिक हस्तक्षेप और सामाजिक स्वीकृति भी है। कई बार अतिक्रमण करने वाले लोग वोट बैंक के रूप में देखे जाते हैं, जिसके कारण उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं की जाती।

यह भी सत्य है कि अतिक्रमण करने वाले सभी लोग अपराधी मानसिकता के नहीं होते। उनमें से अधिकांश लोग आजीविका के लिए ऐसा करते हैं। ठेले वाले, छोटे दुकानदार और फुटपाथ विक्रेता अपने परिवार का पालन-पोषण इसी माध्यम से करते हैं। इसलिए इस समस्या का समाधान केवल दंडात्मक कार्रवाई नहीं हो सकता। प्रशासन को इनके पुनर्वास और वैकल्पिक व्यवस्था पर भी गंभीरता से विचार करना होगा। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि किसी की आजीविका दूसरे की जान के जोखिम पर नहीं चल सकती।

सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़े यह भी बताते हैं कि भारत में 18 से 45 वर्ष आयु वर्ग के लोग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, और वर्ष 2022 में कुल दुर्घटना पीड़ितों में लगभग 66.5 प्रतिशत इसी आयु वर्ग के थे, जैसा कि सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट में उल्लेखित है। इसका अर्थ यह है कि देश का सबसे उत्पादक और युवा वर्ग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवा रहा है। यह केवल व्यक्तिगत क्षति नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक और सामाजिक क्षति भी है।

अतिक्रमण और दुर्घटनाओं के बीच संबंध को समझने के लिए हमें शहरी नियोजन की विफलता को भी समझना होगा। भारत के अधिकांश शहर बिना दीर्घकालिक योजना के विकसित हुए हैं, जहाँ सड़कों की चौड़ाई, पार्किंग व्यवस्था, फुटपाथ और सार्वजनिक स्थानों का समुचित प्रबंधन नहीं किया गया। परिणामस्वरूप जब जनसंख्या और वाहन बढ़े, तो सड़कों पर दबाव बढ़ गया और अतिक्रमण ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया।

आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन इस समस्या को केवल “कानून व्यवस्था” के मुद्दे के रूप में न देखे, बल्कि इसे “जन सुरक्षा” और “राष्ट्रीय प्राथमिकता” के रूप में स्वीकार करे। अतिक्रमण हटाने के लिए नियमित, निरंतर और पारदर्शी अभियान चलाए जाएँ, न कि केवल औपचारिक कार्रवाई। इसके साथ ही तकनीक का उपयोग करते हुए निगरानी प्रणाली विकसित की जाए, जिससे अतिक्रमण को दोबारा पनपने से रोका जा सके।

साथ ही, नागरिकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब तक समाज स्वयं अतिक्रमण को गलत नहीं मानेगा और उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाएगा, तब तक यह समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकती। लोगों को यह समझना होगा कि सड़कें केवल वाहनों के लिए नहीं हैं, बल्कि यह सभी नागरिकों की साझा संपत्ति हैं। यदि हम स्वयं नियमों का पालन नहीं करेंगे और अतिक्रमण को बढ़ावा देंगे, तो हम भी इस समस्या के भागीदार हैं।

अंततः यह स्पष्ट है कि सड़क दुर्घटनाओं की समस्या का समाधान केवल ट्रैफिक नियमों को सख्त करने से नहीं होगा, बल्कि हमें सड़कों को उनके मूल स्वरूप में वापस लाना होगा। अतिक्रमण हटाना इस दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है। यदि प्रशासन और समाज दोनों मिलकर इस समस्या के खिलाफ गंभीर प्रयास करें, तो हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है।

अब प्रश्न यह नहीं है कि समस्या क्या है, बल्कि यह है कि क्या हम इसे स्वीकार करके समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं। यदि नहीं, तो यह आंकड़े हर वर्ष बढ़ते रहेंगे और हम केवल संवेदनाएँ व्यक्त करते रह जाएंगे। लेकिन यदि हाँ, तो यह समय है—जागने का, जागरूक होने का और सड़कों को सुरक्षित बनाने का।

डॉ. शैलेश शुक्ला. 







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