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साइबर सुरक्षा के लिए लगातार सतर्कता और 'सिक्योरिटी-बाय-डिज़ाइन' ज़रूरी

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सीआईआई द्वारा आयोजित 'साइबरसिक्योरिटी 360 समिट' में डिजिटल इकोसिस्टम में मज़बूती  लाने की अहम ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया, खासकर तब जब अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में टेक्नोलॉजी का एकीकरण बढ़ रहा है।

नई दिल्ली, 03 जुलाई 2026 (यूटीएन)। कॉन्फेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्री  द्वारा आयोजित 'साइबरसिक्योरिटी 360 समिट' में बोलते हुए, भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने कहा कि साइबर सुरक्षा के लिए लगातार सतर्कता की ज़रूरत है और संगठन इसे हल्के में नहीं ले सकते। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि इंडस्ट्री को साइबर सुरक्षा पर सही मात्रा में संसाधन खर्च करने चाहिए, 'सिक्योरिटी-बाय-डिज़ाइन' सुनिश्चित करना चाहिए, घरेलू साइबर सुरक्षा उत्पादों का समर्थन करना चाहिए और सामूहिक सुरक्षा व जानकारी साझा करने को मज़बूत करने के लिए साइबर घटनाओं की रिपोर्ट इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम को देनी चाहिए।
 
सीआईआई द्वारा आयोजित 'साइबरसिक्योरिटी 360 समिट' में डिजिटल इकोसिस्टम में मज़बूती  लाने की अहम ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया, खासकर तब जब अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में टेक्नोलॉजी का एकीकरण बढ़ रहा है। यह समिट इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की साझेदारी में आयोजित की गई थी और इसमें ग्लोबल साइबर खतरों की बदलती जटिलताओं से निपटने के लिए एक्सपर्ट्स, पॉलिसी बनाने वालों और इंडस्ट्री लीडर्स को एक साथ लाया गया। चर्चाओं का मकसद तेज़ी से आपस में जुड़ती दुनिया में राष्ट्रीय और आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए एक व्यापक रोडमैप तैयार करना था।
एस. कृष्णन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि साइबर सुरक्षा को हल्के में नहीं लिया जा सकता और सभी स्टेकहोल्डर्स को साइबर सुरक्षा के लिए सही मात्रा में संसाधन आवंटित करने की ज़रूरत है। उन्होंने आगे कहा कि जब सरकार आईटी पर या किसी आईटी बजट पर खर्च करती है, तो कम से कम 15% हिस्सा साइबर सुरक्षा के लिए जाना चाहिए। उन्होंने इंडस्ट्री स्टेकहोल्डर्स से यह भी आग्रह किया कि वे सामूहिक सुरक्षा और जानकारी साझा करने में मदद के लिए सभी साइबर घटनाओं की रिपोर्ट इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम को दें। समिट का एक मुख्य विषय आधुनिक साइबर खतरों के लिए 360-डिग्री प्रतिक्रिया की ज़रूरत थी। 
यह फ्रेमवर्क चार बुनियादी स्तंभों की पहचान करता है: टेक्नोलॉजी, गवर्नेंस, अपराध और जियोपॉलिटिक्स। भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के रक्षा विभाग में अतिरिक्त महानिदेशक और सलाहकार डॉ. अमित शर्मा ने अपने संबोधन में इस बात पर ज़ोर दिया कि 'आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस' की दौड़ एक महत्वपूर्ण जियोपॉलिटिकल बदलाव को दर्शाती है, जिसके लिए फ्रंटियर मॉडल डेवलपमेंट के लिए एक सक्रिय राष्ट्रीय रोडमैप की ज़रूरत है। उन्होंने बताया कि डीआरडीओ ने अपने टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत, पूरी तरह से रिसर्च के क्षेत्र में बुनियादी मॉडल बनाने के लिए पहले ही एक RFI जारी कर दिया है।
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि क्वांटम कंप्यूटिंग के आने से पारंपरिक क्रिप्टोग्राफिक सिस्टम बेकार हो जाएंगे, जिससे 'पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी' में बदलाव एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बन जाएगा। संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व स्थायी प्रतिनिधि, राजदूत अशोक कुमार मुखर्जी ने अंतरराष्ट्रीय साइबर नियमों के विकास और डिजिटल विकास पर भू-राजनीतिक हेजिंग के असर पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि दिसंबर 2024 में साइबर अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन को अपनाने से कानून लागू करने वाली एजेंसियों के बीच सहयोग के लिए एक ढांचा तैयार हुआ है, हालांकि अंतरराष्ट्रीय डिजिटल गवर्नेंस में भरोसा अभी भी एक बड़ी बाधा बना हुआ है। उन्होंने एक सक्रिय राष्ट्रीय रुख अपनाने की वकालत की, जो 2047 तक 'विकसित भारत' का लक्ष्य हासिल करने के लिए तकनीक का लाभ उठाए।
सीआईआई साइबर सुरक्षा टास्क फोर्स के चेयरमैन और पूर्व राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा समन्वयक डॉ. गुलशन राय ने 360-डिग्री साइबर प्रतिक्रिया के चार स्तंभों की रूपरेखा बताई: तकनीक, गवर्नेंस, अपराध और भू-राजनीति। उन्होंने बताया कि 5जी और 6 जी जैसे कम्युनिकेशन प्रोटोकॉल की बढ़ती जटिलता ने बड़ी कंपनियों और छोटे व मध्यम उद्यमों, दोनों के लिए हमले के दायरे को बढ़ा दिया है। उन्होंने आगे कहा कि यह समिट सीआईआई के 360-डिग्री सुरक्षा कार्यक्रम के लिए एक लॉन्चपैड का काम करता है, जिसका मकसद क्षमता निर्माण को बढ़ाना और छोटी कंपनियों को रणनीतिक मार्गदर्शन देना है।
सीआईआई साइबर सुरक्षा टास्क फोर्स के सह-चेयरमैन निहार पठारे ने एक एकीकृत 'ज़ीरो-ट्रस्ट मॉडल' की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि ज़मीन और अंतरिक्ष-आधारित महत्वपूर्ण संपत्तियों की सुरक्षा के लिए पैसिव डिफेंस (निष्क्रिय बचाव) से हटकर सक्रिय और समझदारी भरे साइबर-रेज़िलिएंस (साइबर-लचीलेपन) की ओर बढ़ना ज़रूरी है। समिट में हुई चर्चाओं से इस बात पर सहमति बनी कि बदलती वैश्विक खतरों की स्थिति की जटिलताओं से निपटने के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप ज़रूरी है। प्रतिभागियों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत के डिजिटल भविष्य को सुरक्षित करने के लिए तकनीक, नीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के प्रति एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाना ज़रूरी है।
 
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।






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