नई दिल्ली,07 अगस्त 2026 (यूटीएन)। रामायण रिसर्च काउंसिल की ओर से शुक्रवार को नई दिल्ली स्थित नेशनल स्पोर्ट्स क्लब ऑफ इंडिया में एक महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में रामायण की प्रामाणिकता, भारतीय संस्कृति में उसके महत्व, फिल्मों और धारावाहिकों में रामायण के पात्रों के चित्रण तथा आगामी “रामायणी सम्मान 2026” को लेकर विस्तार से जानकारी दी गई।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए काउंसिल के पदाधिकारियों ने हाल ही में रिलीज हुए “रामायण” फिल्म के ट्रेलर को लेकर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। काउंसिल की ओर से कहा गया कि ट्रेलर देखने के बाद कई सवाल खड़े होते हैं और उन्हें यह स्पष्ट करने में कठिनाई हुई कि प्रस्तुत दृश्य और पात्र वास्तव में रामायण की मूल भावना को प्रदर्शित कर रहे हैं या नहीं।
ट्रेलर को लेकर उठाए सवाल
रामायण रिसर्च काउंसिल ने कहा कि भगवान श्रीराम का चरित्र भारतीय जनमानस में केवल एक धार्मिक पात्र के रूप में नहीं, बल्कि मर्यादा, संयम, त्याग, करुणा, सत्य और आदर्श जीवन के प्रतीक के रूप में स्थापित है। ऐसे में जब रामायण पर फिल्म बनाई जाती है तो निर्माता और निर्देशक की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि पात्रों का स्वरूप और उनका चरित्र भारतीय परंपरा तथा उपलब्ध प्रामाणिक ग्रंथों के अनुरूप हो।
काउंसिल के पदाधिकारियों ने कहा कि ट्रेलर देखने के बाद उन्हें यह सवाल परेशान करता है कि “यह रामायण है या महाभारत?” उनका कहना था कि भगवान श्रीराम का स्वरूप जिस मर्यादा, सौम्यता और गरिमा के साथ भारतीय परंपरा में वर्णित है, उसी भाव को पर्दे पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक, बड़े बजट और भव्य दृश्य फिल्म को आकर्षक बना सकते हैं, लेकिन केवल दृश्य भव्यता से रामायण की आत्मा को प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। रामायण के प्रत्येक पात्र के पीछे एक गहरी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और नैतिक परंपरा जुड़ी हुई है।
सेंसर बोर्ड से फिल्म प्रमाणित करने से पहले विशेषज्ञों को दिखाने की मांग
रामायण रिसर्च काउंसिल ने सेंसर बोर्ड से आग्रह किया कि किसी भी ऐसी फिल्म को प्रमाणित करने से पहले, जिसमें रामायण के प्रमुख पात्रों और घटनाओं को प्रस्तुत किया गया हो, रामायण के विषय पर काम कर रहे विद्वानों और शोधकर्ताओं से भी राय ली जानी चाहिए।
काउंसिल का कहना है कि यदि फिल्म में किसी पात्र, घटना, संवाद या प्रसंग को लेकर कोई ऐतिहासिक, धार्मिक अथवा सांस्कृतिक त्रुटि है तो उसे रिलीज से पहले ही सुधारा जा सकता है। इससे निर्माता और दर्शक दोनों के हितों की रक्षा होगी तथा बाद में विवाद की स्थिति भी पैदा नहीं होगी।
काउंसिल ने कहा कि उसका उद्देश्य किसी फिल्म या कलाकार का विरोध करना नहीं है, बल्कि रामायण जैसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक ग्रंथ को सही संदर्भ और सम्मान के साथ नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।
“आदिपुरुष” का उदाहरण देते हुए जताई चिंता
प्रेस कॉन्फ्रेंस में काउंसिल के पदाधिकारियों ने पूर्व में रिलीज हुई “आदिपुरुष” फिल्म का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि रामायण से जुड़े पात्रों और प्रसंगों को लेकर जब फिल्म निर्माण में आवश्यक सावधानी नहीं बरती जाती तो उसका असर केवल फिल्म तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज और विशेषकर युवा पीढ़ी की समझ पर भी पड़ सकता है।
काउंसिल ने कहा कि आज बड़ी संख्या में युवा रामायण के प्रसंगों को फिल्मों, वेब सीरीज और सोशल मीडिया के माध्यम से समझते हैं। ऐसे में यदि किसी फिल्म में काल्पनिक या गलत जानकारी को मूल रामायण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो आने वाली पीढ़ी के बीच भ्रम पैदा हो सकता है।
उन्होंने फिल्म निर्माताओं से अपील की कि रचनात्मक स्वतंत्रता के साथ-साथ सांस्कृतिक जिम्मेदारी को भी ध्यान में रखा जाए।
“रामायणी सम्मान 2026” की तैयारियों की जानकारी
प्रेस कॉन्फ्रेंस में “रामायणी सम्मान 2026” को लेकर भी महत्वपूर्ण घोषणाएं की गईं। काउंसिल ने बताया कि इस वर्ष रामायणी सम्मान का आयोजन 19 अगस्त 2026 को काशी स्थित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती के अवसर पर किया जाएगा।
इस अवसर पर देश के विभिन्न क्षेत्रों में रामायण, भारतीय संस्कृति, साहित्य, संगीत, अध्यात्म और सामाजिक क्षेत्र में योगदान देने वाले 28 विशिष्ट व्यक्तियों को सम्मानित किया जाएगा।
काउंसिल के अनुसार सम्मान का उद्देश्य उन लोगों को पहचान देना है जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में भारतीय संस्कृति और रामायण की परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
अनूप जलोटा, अनुराधा पौडवाल सहित 28 नामों की घोषणा
सांसद नैनीताल एवं पूर्व रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने रामायणी सम्मान 2026 के लिए चयनित प्रमुख नामों की जानकारी साझा की। इनमें प्रसिद्ध भजन गायक अनूप जलोटा, सुप्रसिद्ध गायिका अनुराधा पौडवाल, पूर्व केंद्रीय मंत्री आरके सिंह तथा दिवंगत किशोर कुणाल का नाम प्रमुख रूप से बताया गया।
काउंसिल की ओर से कहा गया कि सम्मान के लिए चयन केवल लोकप्रियता के आधार पर नहीं, बल्कि संबंधित क्षेत्र में योगदान और भारतीय संस्कृति तथा रामायण परंपरा से जुड़े कार्यों को ध्यान में रखते हुए किया गया है।
किशोर कुणाल को याद करते हुए यह भी कहा गया कि रामायण और भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत से जुड़े विषयों को लेकर उनका योगदान लंबे समय तक स्मरण किया जाएगा।
अजय भट्ट बोले—सही जानकारी समाज तक पहुंचाना जरूरी
प्रेस कॉन्फ्रेंस में अजय भट्ट ने कहा कि रामायण रिसर्च काउंसिल की स्थापना का मूल उद्देश्य ही रामायण से जुड़ी सही और प्रमाणिक जानकारी को समाज तक पहुंचाना है।
उन्होंने कहा कि रामायण केवल एक धार्मिक कथा नहीं है, बल्कि भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण आधार है। देश में अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रों में रामायण की अनेक परंपराएं मौजूद हैं, इसलिए इस विषय पर काम करने वाले फिल्मकारों और रचनाकारों को पर्याप्त शोध के बाद ही अपनी प्रस्तुति तैयार करनी चाहिए।
अजय भट्ट ने कहा कि यदि किसी फिल्म या रचनात्मक प्रस्तुति में रामायण के मूल चरित्र और घटनाओं को बदलकर प्रस्तुत किया जाता है तो दर्शकों तक गलत जानकारी पहुंचने की संभावना रहती है।
उन्होंने फिल्म निर्माताओं से अपील करते हुए कहा कि फिल्म बनाने से पहले रामायण के विशेषज्ञों, विद्वानों और शोधकर्ताओं से संवाद किया जाना चाहिए।
साध्वी प्रज्ञा भारती ने सीता के चरित्र को लेकर रखी बात
प्रेस कॉन्फ्रेंस में साध्वी प्रज्ञा भारती ने विशेष रूप से माता सीता के चरित्र को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि फिल्मों और अन्य दृश्य माध्यमों में कई बार माता सीता को केवल एक कमजोर अथवा अबला महिला के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है, जबकि रामायण में उनका व्यक्तित्व इससे कहीं अधिक व्यापक और शक्तिशाली है।
उन्होंने कहा कि माता सीता साहस, आत्मसम्मान, धैर्य, त्याग और दृढ़ संकल्प की प्रतीक हैं। इसलिए उनके चरित्र को केवल परिस्थितियों से पीड़ित महिला के रूप में दिखाना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के सामने माता सीता के व्यक्तित्व का ऐसा चित्रण होना चाहिए, जिससे समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान और आत्मविश्वास की भावना मजबूत हो।
सीता शक्ति स्थल मंदिर को लेकर भी जानकारी
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बिहार के सीतामढ़ी में निर्माणाधीन मां सीता (शक्ति स्थल) मंदिर परियोजना की भी जानकारी दी गई। काउंसिल ने बताया कि बिहार सरकार की ओर से सीतामढ़ी में लगभग 12 एकड़ भूमि आवंटित की गई है।
बताया गया कि इस भव्य परियोजना का भूमि पूजन अप्रैल 2026 में बिहार के मुख्यमंत्री द्वारा किया जा चुका है। काउंसिल ने इसे मां सीता से जुड़े धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
सीतामढ़ी को माता सीता की जन्मस्थली से जुड़ी आस्था के प्रमुख केंद्र के रूप में देखते हुए काउंसिल ने कहा कि इस क्षेत्र का विकास देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी महत्वपूर्ण होगा।
रामायण को लेकर शोध और प्रमाणिकता पर जोर
काउंसिल ने कहा कि रामायण पर आधारित किसी भी रचनात्मक कार्य के लिए केवल एक-दो पुस्तकों या लोकप्रिय कथाओं को आधार बनाना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए विभिन्न रामायण परंपराओं, उपलब्ध ग्रंथों, भाषाई स्रोतों और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संदर्भों का अध्ययन किया जाना चाहिए।
भारत में वाल्मीकि रामायण के अलावा अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रों में रामकथा की अपनी-अपनी परंपराएं रही हैं। तुलसीदास की रामचरितमानस ने उत्तर भारत के जनजीवन पर गहरा प्रभाव डाला है। इसी तरह दक्षिण भारत और अन्य क्षेत्रों में भी रामकथा की समृद्ध परंपराएं रही हैं।
काउंसिल का कहना है कि इन विविधताओं को समझे बिना रामायण के पात्रों को आधुनिक मनोरंजन के अनुरूप ढालने की कोशिश कई बार मूल भावना से दूर ले जा सकती है।
युवाओं तक सही रामकथा पहुंचाना लक्ष्य
रामायण रिसर्च काउंसिल के पदाधिकारियों ने कहा कि आज के दौर में डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया युवाओं तक जानकारी पहुंचाने का सबसे बड़ा माध्यम बन चुके हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि रामायण से जुड़ी सामग्री तथ्यात्मक और प्रमाणिक हो।
उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी को रामायण केवल एक कथा के रूप में नहीं, बल्कि कर्तव्य, सत्य, न्याय, परिवार, समाज, नेतृत्व और नैतिकता के मूल्यों के रूप में समझने की जरूरत है।
काउंसिल ने कहा कि आधुनिक माध्यमों का उपयोग करते हुए रामायण को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है, लेकिन इसके लिए मूल चरित्रों और संदेश के साथ समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
फिल्मकारों से संवाद की पहल पर जोर
प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी कहा गया कि रामायण रिसर्च काउंसिल फिल्मकारों और रचनाकारों के साथ टकराव नहीं चाहती। इसके बजाय काउंसिल विशेषज्ञों और फिल्म इंडस्ट्री के बीच संवाद स्थापित करने की पक्षधर है।
काउंसिल के अनुसार यदि फिल्म निर्माता शुरुआती चरण में ही विशेषज्ञों से परामर्श लें तो कई विवादों से बचा जा सकता है। इससे फिल्म की रचनात्मकता भी बनी रहेगी और धार्मिक तथा सांस्कृतिक संदर्भों की प्रमाणिकता भी सुनिश्चित की जा सकेगी।
“रामायणी सम्मान” का उद्देश्य क्या है?
काउंसिल ने स्पष्ट किया कि “रामायणी सम्मान” केवल पुरस्कार वितरण का कार्यक्रम नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य उन व्यक्तियों और संस्थाओं को सम्मानित करना है जो भारतीय संस्कृति, रामायण परंपरा, साहित्य, संगीत, अध्यात्म और सामाजिक मूल्यों को आगे बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं।
काउंसिल ने कहा कि रामायण के मूल संदेश को समाज में मजबूत करना और आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
संस्कृति और आधुनिक सिनेमा के बीच संतुलन जरूरी
प्रेस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने कहा कि आधुनिक सिनेमा को तकनीकी और रचनात्मक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, लेकिन जब विषय करोड़ों लोगों की आस्था और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा हो तो जिम्मेदारी भी उसी अनुपात में बढ़ जाती है।
रामायण रिसर्च काउंसिल ने कहा कि फिल्मकार अपनी कल्पना और तकनीक का इस्तेमाल जरूर करें, लेकिन दर्शकों के सामने यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन-सा हिस्सा मूल रामकथा पर आधारित है और कौन-सा रचनात्मक रूपांतरण है।
काउंसिल का मानना है कि ऐसा संतुलन बनाए रखने से विवादों को कम किया जा सकता है और रामायण की गरिमा को भी बनाए रखा जा सकता है।
रामायण की गरिमा बनाए रखने की अपील
कार्यक्रम के अंत में काउंसिल के पदाधिकारियों ने कहा कि भगवान श्रीराम और माता सीता भारतीय समाज के लिए केवल धार्मिक पात्र नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय जीवन-मूल्यों और आदर्शों के प्रतीक हैं। इसलिए उनके चरित्रों को प्रस्तुत करते समय विशेष सावधानी आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि रामायण को मनोरंजन के साथ-साथ जिम्मेदारी के विषय के रूप में भी देखा जाना चाहिए। आने वाली पीढ़ियों को रामायण के बारे में जो जानकारी मिलेगी, वह उनके सांस्कृतिक दृष्टिकोण को प्रभावित करेगी।
काउंसिल ने एक बार फिर फिल्म निर्माताओं, लेखकों, निर्देशकों और कलाकारों से अपील की कि रामायण आधारित परियोजनाओं पर काम करने से पहले विशेषज्ञों और विद्वानों से गहन परामर्श किया जाए।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह संदेश प्रमुखता से सामने आया कि रामायण की कथा जितनी पुरानी है, उसके मूल्य आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। जरूरत इस बात की है कि आधुनिक माध्यमों के जरिए इन मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए, लेकिन ऐसा करते समय तथ्य, परंपरा, संस्कृति और आस्था का सम्मान भी पूरी तरह बरकरार रखा जाए। इसी उद्देश्य के साथ रामायण रिसर्च काउंसिल द्वारा “रामायणी सम्मान 2026” को भारतीय संस्कृति और रामायण परंपरा से जुड़े विशिष्ट योगदानों को सम्मान देने के महत्वपूर्ण मंच के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।

