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ध्यान की सबसे बड़ी उत्कृष्टता सामायिक है : आचार्य श्री आर्जवसागर

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बड़ौत,09 अगस्त 2026 (यूटीएन)। पावन वर्षायोग के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा में पूज्य आचार्य श्री आर्जवसागर मुनिराज ने श्रद्धालुओं को सामायिक के आध्यात्मिक महत्व से अवगत कराया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि ध्यान की सबसे बड़ी उत्कृष्टता सामायिक है। सामायिक व्यक्ति को आत्मचिंतन, समता और आध्यात्मिक शुद्धि की दिशा में आगे बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण साधना है।

आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य का जीवन सांसारिक गतिविधियों और राग-द्वेष में उलझा रहता है। ऐसे में सामायिक उसे कुछ समय के लिए बाहरी संसार से विरक्त होकर अपने भीतर झांकने और आत्मस्वरूप को समझने का अवसर प्रदान करती है। सामायिक के माध्यम से व्यक्ति अपने मन को स्थिर करने तथा आत्मिक शांति की ओर बढ़ने का प्रयास करता है।

सामायिक केवल धार्मिक क्रिया नहीं

आचार्य श्री आर्जवसागर ने कहा कि सामायिक को केवल एक धार्मिक क्रिया के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह आत्मनिरीक्षण, समता और संयम की साधना है। सामायिक के दौरान व्यक्ति सांसारिक राग-द्वेष से ऊपर उठकर आत्मा के स्वरूप का चिंतन करता है।

उन्होंने कहा कि नियमित रूप से सामायिक करने से व्यक्ति के जीवन में शांति, संयम, धैर्य और आत्मिक जागृति का विकास होता है। जब मनुष्य कुछ समय के लिए बाहरी विषयों से अपना ध्यान हटाकर आत्मचिंतन करता है तो उसके भीतर सकारात्मक परिवर्तन आने लगते हैं।

श्रद्धालुओं को बताई सामायिक की विधि

धर्मसभा में आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं को सामायिक करने की विधि के साथ-साथ इसके नियम, समय और आवश्यक सावधानियों के विषय में विस्तार से मार्गदर्शन दिया।

उन्होंने बताया कि सामायिक के लिए मन की एकाग्रता के साथ-साथ शरीर की शुद्धता और अनुशासन का भी विशेष महत्व है। सामायिक प्रारंभ करने से पहले शरीर की आवश्यक शुद्धि कर लेनी चाहिए तथा हाथ-पैर आदि को स्वच्छ रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सामायिक के दौरान मन को इधर-उधर भटकने से रोकने का प्रयास करना चाहिए और आत्मचिंतन में मन को लगाना चाहिए।

विघ्न आने पर भी संयम बनाए रखें

आचार्य श्री ने सामायिक के दौरान आने वाले विघ्नों और असुविधाओं के संबंध में भी श्रद्धालुओं को महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने कहा कि विघ्न आने पर भी अनावश्यक रूप से आसन और उपयोग को नहीं बदलना चाहिए।

सामायिक के दौरान आलस्य, निद्रा और प्रमाद से बचने की आवश्यकता बताते हुए उन्होंने कहा कि साधना के समय मन और शरीर दोनों को जागरूक रखना चाहिए। उठते-बैठते समय भी सावधानी और संयम का पालन करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सामायिक का वास्तविक लाभ तभी प्राप्त होता है, जब व्यक्ति इसे पूरी श्रद्धा, जागरूकता और आत्मिक भावना के साथ करे।

राग-द्वेष से विरक्ति का माध्यम

आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य के जीवन में राग और द्वेष अनेक प्रकार की अशांति का कारण बनते हैं। सामायिक के माध्यम से व्यक्ति कुछ समय के लिए इन सांसारिक भावों से स्वयं को अलग करने का अभ्यास करता है।

उन्होंने कहा कि आत्मा की ओर उन्मुख होने का यह अभ्यास धीरे-धीरे व्यक्ति के व्यवहार में भी परिवर्तन लाता है। संयमित जीवन, शांत मन और समताभाव की दिशा में सामायिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

श्रद्धालुओं ने लिया संकल्प

आचार्य श्री के प्रवचन के दौरान धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। श्रद्धालुओं ने सामायिक की विधि और उसके नियमों को ध्यानपूर्वक सुना तथा इसे अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।

धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के आध्यात्मिक संदेश को आत्मसात करते हुए नियमित साधना और आत्मचिंतन की भावना को जीवन में उतारने का संकल्प लिया।

भक्ति भाव से हुआ गुरु पूजन

धर्मसभा के दौरान ऋषिका दीदी द्वारा भक्ति भाव से गुरु पूजन कराया गया। श्रद्धालुओं ने श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ गुरु पूजन में सहभागिता की। पूरे वातावरण में आध्यात्मिक एवं भक्तिमय माहौल बना रहा।

इस अवसर पर मुकेश जैन, प्रदीप जैन, नवीन जैन, महेंद्र जैन, वरदान जैन, ऋषभ जैन, अनुज जैन, अंकुर जैन, विकास जैन, सुरेश जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। धर्मसभा का वातावरण आचार्य श्री के आध्यात्मिक संदेश और गुरु भक्ति से ओत-प्रोत रहा।

श्रद्धालुओं ने कहा कि आचार्य श्री के प्रवचनों से उन्हें सामायिक के वास्तविक स्वरूप और आत्मिक महत्व को समझने का अवसर मिला।

वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।







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