बड़ौत,24 अगस्त 2026 (यूटीएन)। नगर के अजितनाथ सभागार में जैन संत आचार्य श्री आर्जवसागर महाराज के सान्निध्य में ध्यान विषय पर चल रही विशेष प्रवचन श्रृंखला में श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक जीवन और मन की एकाग्रता का महत्व बताया गया। प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने कहा कि केवल हाथ पर हाथ रखकर और आसन जमाकर बैठ जाने मात्र से ध्यान नहीं होता। ध्यान एक ऐसी अवस्था है, जो चलते-फिरते, उठते-बैठते और दैनिक जीवन के कार्यों के दौरान भी की जा सकती है। ध्यान का वास्तविक अर्थ सद्भावना और शुभ विचारों से है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य के विचार और भावनाएं ही उसके ध्यान की दिशा निर्धारित करती हैं। शुभ भावनाओं और शुभ विचारों से धर्म ध्यान होता है, जबकि अशुभ भावों और बुरे विचारों से अशुभ ध्यान की स्थिति बनती है। इसलिए व्यक्ति को अपने मन में उत्पन्न होने वाले विचारों और भावनाओं के प्रति सजग रहना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि बुरी भावनाओं और अशुभ विचारों से बचने के लिए व्यक्ति निश्चित समय और निश्चित स्थान पर विशेष आसन में बैठकर ध्यान करता है, लेकिन केवल आसन लगाने से ध्यान की सिद्धि नहीं होती। ध्यान के लिए मन पर विजय प्राप्त करना सबसे आवश्यक है। जिसने अपने मन को नियंत्रित कर लिया, उसने ही वास्तविक अर्थों में सब कुछ पा लिया।
मन की स्थिरता के लिए एकत्व भावना जरूरी
आचार्य आर्जवसागर महाराज ने कहा कि ध्यान में मन की स्थिरता के लिए एकत्व भावना का विशेष महत्व है। व्यक्ति को इस भावना के साथ चिंतन करना चाहिए कि संसार में अपनी आत्मा के अतिरिक्त अणु मात्र भी वास्तव में उसका नहीं है। संसार में दिखाई देने वाले सभी संबंध और पदार्थ अस्थायी हैं। आत्मा के स्वरूप को समझकर ही मनुष्य मोह-माया और आसक्ति से ऊपर उठ सकता है।
उन्होंने कहा कि सभी जीवों के प्रति समान दृष्टि रखनी चाहिए। शत्रु-मित्र, अपना-पराया जैसे भेदभाव को छोड़कर राग-द्वेष से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। मन में किसी के प्रति बैर भाव रखने वाला व्यक्ति सच्चे अर्थों में ध्यान नहीं कर सकता। यदि मन में किसी के प्रति द्वेष, ईर्ष्या या बदले की भावना है तो बाहर से ध्यान की मुद्रा में बैठना केवल दिखावा बनकर रह जाता है।
राग-द्वेष से मुक्ति ही सच्चे ध्यान की पहचान
आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं को समझाते हुए कहा कि ध्यान केवल आंखें बंद करने या शांत मुद्रा में बैठने का नाम नहीं है। ध्यान मन के भीतर चलने वाले विचारों को शुद्ध करने की प्रक्रिया है। जब व्यक्ति के भीतर से राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी प्रवृत्तियां कम होने लगती हैं, तभी उसका मन वास्तविक शांति की ओर बढ़ता है।
उन्होंने कहा कि संसार के बंधनों से मुक्त होने के लिए धर्म ध्यान की ओर बढ़ना आवश्यक है। सच्चा ध्यानी अथवा योगी संसारिक सुखों की प्राप्ति की कामना के लिए ध्यान नहीं करता। उसका उद्देश्य संसार के बंधनों से मुक्त होकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना होता है।
संयमित जीवन से मिलती है धर्म ध्यान की पात्रता
आचार्य श्री ने कहा कि जिसने इंद्रियों के विषय-भोगों का परित्याग कर संयमित जीवन को स्वीकार किया है और संसार के छोटे-बड़े सभी जीवों के प्रति दया और करुणा का भाव विकसित किया है, वही धर्म ध्यान की वास्तविक पात्रता प्राप्त कर सकता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से अपने जीवन में संयम, करुणा और सद्भावना को अपनाने का आह्वान किया। कहा कि मन को नियंत्रित करने की साधना केवल धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि परिवार, समाज और दैनिक जीवन के व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए।
ध्यान से जीवन में आती है आंतरिक शांति
प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने कहा कि आज का मनुष्य बाहरी सुख-सुविधाओं के पीछे भाग रहा है, लेकिन वास्तविक शांति भीतर से प्राप्त होती है। जब तक मन अशांत और इच्छाओं से भरा रहेगा, तब तक बाहरी साधन भी व्यक्ति को स्थायी संतोष नहीं दे सकते। ध्यान व्यक्ति को स्वयं के भीतर झांकने और अपने वास्तविक स्वरूप को समझने का अवसर देता है।
उन्होंने कहा कि मन को एकाग्र करने के लिए नियमित अभ्यास आवश्यक है। शुरुआत में मन बार-बार भटकेगा, लेकिन निरंतर अभ्यास, शुभ चिंतन और संयम के माध्यम से धीरे-धीरे मन की चंचलता कम की जा सकती है।
श्रद्धालुओं ने सुने आचार्य के आध्यात्मिक विचार
प्रवचन के दौरान अजितनाथ सभागार में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। श्रद्धालुओं ने शांत भाव से आचार्य श्री के विचारों को सुना और ध्यान तथा धर्म के गूढ़ विषयों को समझने का प्रयास किया। प्रवचन के बाद उपस्थित श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ लिया।
इस अवसर पर मुकेश जैन, प्रदीप जैन, नवीन जैन, वरदान जैन, सुरेश जैन, राकेश जैन, अनिल जैन, विकास जैन, ऋषभ जैन, अनुज जैन, संजीव जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
28 अगस्त को गुरु सान्निध्य में मनाया जाएगा रक्षाबंधन पर्व
मीडिया प्रभारी वरदान जैन ने बताया कि आगामी 28 अगस्त को गुरु सान्निध्य में अजितनाथ सभागार में रक्षाबंधन पर्व का आयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर भगवान श्रेयांसनाथ के मोक्ष कल्याणक पर्व के उपलक्ष्य में निर्वाण लाडू चढ़ाया जाएगा।
उन्होंने बताया कि रक्षाबंधन पर्व के अवसर पर आचार्य श्री के सान्निध्य में रक्षाबंधन की कथा पर विशेष प्रवचन भी आयोजित किए जाएंगे। धार्मिक आयोजन को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह है और तैयारियां की जा रही हैं।
30 अगस्त से शुरू होगा षोडशकारण महापर्व
मीडिया प्रभारी वरदान जैन ने बताया कि 30 अगस्त से 6 सितंबर तक षोडशकारण महापर्व के अवसर पर आठ दिवसीय लोक कल्याण महामंडल विधान का आयोजन किया जाएगा। इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-अर्चना और विभिन्न आध्यात्मिक कार्यक्रम संपन्न होंगे।
उन्होंने श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में धार्मिक आयोजनों में शामिल होकर धर्मलाभ लेने का आह्वान किया। आगामी कार्यक्रमों को लेकर जैन समाज में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है।
वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।

