बड़ौत,07 अगस्त 2026 (यूटीएन)। नगर में चातुर्मास कर रहे आचार्य श्री आर्जव सागर मुनिराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म का मूल आधार दया और अहिंसा है। जहां दया और अहिंसा का भाव पलता है, वहीं करुणा, वात्सल्य, सरलता और परोपकार की भावना स्वतः विकसित होती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में धर्म का प्रभाव तभी दिखाई देता है, जब उसके आचरण में जीवों के प्रति दया, संवेदना और प्रेम दिखाई दे।
धर्मसभा में आचार्य श्री ने अहिंसा के वास्तविक स्वरूप को समझाते हुए कहा कि अहिंसा का आशय यह बिल्कुल नहीं है कि व्यक्ति अपने धर्म अथवा स्वयं की रक्षा न करे। अहिंसा का वास्तविक अर्थ है किसी जीव को जानबूझकर मारने से बचना और अपने स्वाद अथवा पेट भरने के लिए किसी जीव की हत्या न करना। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने भोजन और जीवनशैली के प्रति भी विवेक रखना चाहिए।
हिंसक व्यापार से बचने का आह्वान
आचार्य श्री आर्जव सागर ने कहा कि आज अनेक लोग अपनी आजीविका चलाने के लिए ऐसे व्यवसाय और व्यापार से जुड़े हुए हैं, जिनमें बड़ी संख्या में जीवों का घात होता है। उन्होंने ऐसे हिंसक व्यापार से बचने की प्रेरणा देते हुए कहा कि जीवन-यापन के लिए ऐसा कार्य नहीं चुनना चाहिए, जिसमें प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जीव हिंसा शामिल हो।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के बीच अंतर समझना होगा। केवल अधिक लाभ या स्वाद के लिए किसी जीव को नुकसान पहुंचाना धर्म के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। दया और अहिंसा को जीवन का हिस्सा बनाने से मनुष्य के भीतर सकारात्मक भावनाओं का विकास होता है।
खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर किया सचेत
आचार्य श्री ने वर्तमान समय में खाद्य पदार्थों में बढ़ते मिलावट और कृत्रिम स्वाद को लेकर भी लोगों को सावधान किया। उन्होंने कहा कि आज कुछ उत्पादों का स्वाद और आकर्षण बढ़ाने के लिए खाद्य पदार्थों में ऐसे पदार्थ मिलाए जा रहे हैं, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। उन्होंने खाद्य पदार्थों में मिलाए जाने वाले संदिग्ध एवं हानिकारक रसायनों को लेकर भी चिंता जताई।
उन्होंने लोगों से बाजार में मिलने वाले खाद्य पदार्थों और फास्ट फूड के सेवन से बचने तथा भोजन के प्रति जागरूक रहने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को यह देखना चाहिए कि वह क्या खा रहा है और भोजन में किन पदार्थों का इस्तेमाल किया गया है। स्वाद के पीछे भागने के बजाय शुद्ध, सात्विक और संयमित भोजन को प्राथमिकता देनी चाहिए।
संयुक्त परिवारों से मिलते थे संस्कार
धर्मसभा में आचार्य श्री ने बदलती पारिवारिक व्यवस्था पर भी विचार रखे। उन्होंने कहा कि पहले संयुक्त परिवारों में बच्चों का पालन-पोषण केवल माता-पिता ही नहीं, बल्कि बाबा-दादी, नाना-नानी और परिवार के अन्य सदस्य भी करते थे। बुजुर्ग बच्चों को धार्मिक और नैतिक कहानियां सुनाते थे, जिससे उनमें बचपन से ही अच्छे संस्कार विकसित होते थे।
उन्होंने कहा कि परिवार के बुजुर्ग बच्चों के लिए संस्कारों का महत्वपूर्ण माध्यम हुआ करते थे। उनके अनुभव, कहानियां और जीवन की सीख बच्चों को परिवार, समाज और संस्कृति से जोड़ती थी। आज संयुक्त परिवारों के कम होने से बच्चों और बुजुर्गों के बीच संवाद भी कम होता जा रहा है।
विवाह समारोहों की बदलती परंपरा का किया उल्लेख
आचार्य श्री ने पुराने समय के विवाह समारोहों और वर्तमान समय के आयोजनों में आए बदलाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पहले विवाह समारोहों में घर और परिवार के लोगों की आत्मीयता प्रमुख होती थी। विवाह घर के सामने ही पांडाल लगाकर आयोजित किए जाते थे और आसपास के लोग तथा रिश्तेदार मिल-जुलकर व्यवस्थाएं संभालते थे।
उन्होंने कहा कि उस समय परिवार और समाज के लोगों के बीच अपनापन और आत्मीयता दिखाई देती थी। घर के लोग मेहमानों को आग्रहपूर्वक भोजन कराते थे। भोजन केवल पेट भरने का माध्यम नहीं, बल्कि आपसी प्रेम और संबंधों को मजबूत करने का भी माध्यम था।
बफे सिस्टम पर उठाया सवाल
वर्तमान समय के विवाह समारोहों में बढ़ते बफे सिस्टम का उल्लेख करते हुए आचार्य श्री ने लोगों से भोजन के प्रति विवेक रखने की अपील की। उन्होंने सवाल किया कि आज लोग विवाह समारोहों में भोजन तो कर लेते हैं, लेकिन क्या वे यह जानते हैं कि भोजन किस भावना से तैयार किया गया है और उसमें किस प्रकार की सामग्री का प्रयोग हुआ है?
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को भोजन करते समय भी जागरूक रहना चाहिए। केवल देखने में आकर्षक और स्वादिष्ट लगने वाला भोजन स्वास्थ्य तथा जीवन के लिए हमेशा उचित हो, यह जरूरी नहीं है। भोजन की शुद्धता, गुणवत्ता और उसके प्रति व्यक्ति की भावना का भी जीवन पर प्रभाव पड़ता है।
संस्कार और संयम को जीवन में उतारने की प्रेरणा
आचार्य श्री ने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ या धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। धर्म का वास्तविक स्वरूप व्यक्ति के व्यवहार और आचरण में दिखाई देना चाहिए। यदि मनुष्य दूसरों के प्रति दया रखता है, जीवों को कष्ट देने से बचता है, जरूरतमंदों की सहायता करता है और अपने जीवन में संयम अपनाता है तो यही धर्म का वास्तविक प्रभाव है।
उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से अहिंसा, दया, करुणा, शाकाहार, संयम और परोपकार जैसे मूल्यों को अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि परिवार में बच्चों को भी बचपन से ही अच्छे संस्कार दिए जाने चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ी धर्म और संस्कृति के मूल सिद्धांतों को समझ सके।
श्रद्धालुओं ने सुना प्रवचन
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के प्रवचन को ध्यानपूर्वक सुना। सभा के दौरान धार्मिक वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने धर्म, अहिंसा और संयम से संबंधित संदेशों को जीवन में उतारने का संकल्प लिया।
धर्मसभा का संचालन ऋषिका दीदी ने किया। इस दौरान मुकेश जैन, प्रदीप जैन, महेंद्र जैन, नवीन जैन, वरदान जैन, विकास जैन, अंकुर जैन, सुरेश जैन, संजीव जैन, अनिल जैन, ऋषभ जैन, अनुज जैन, नितिन जैन, अंकित जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं समाज के लोग उपस्थित रहे।
वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।

