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जनहित याचिकाएं अब पैसा-राजनीतिक हित याचिका बन गईं

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सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की संविधान पीठ धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।

नई दिल्ली, 05 मई 2026  (यूटीएन)। देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिकाओं के लगातार हो रहे दुरुपयोग पर बहुत ही सख्त और बड़ी टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि आज के समय में जनहित याचिका का मकसद पूरी तरह से बदल गया है। अब यह 'प्राइवेट इंटरेस्ट लिटिगेशन' (निजी हित), 'पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन' (प्रसिद्धि), 'पैसा इंटरेस्ट लिटिगेशन' (पैसे के लिए) और 'पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन' (राजनीतिक हित) बनकर रह गई है।
 
सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की संविधान पीठ धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इसी दौरान अदालत ने जनहित याचिकाओं के गिरते स्तर पर यह गहरी चिंता जताई है। इस अहम पीठ में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्या बागची शामिल हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को चुनौती देने वाली 2006 की जनहित याचिका के पीछे के असली मकसद पर कड़े सवाल उठाए हैं।
 
*क्या सिर्फ अखबार की खबरों के आधार पर दायर हुई थी याचिका?*
इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन की तरफ से 2006 में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटाने की मांग की गई थी। इस मामले में एसोसिएशन के वकील रवि प्रकाश गुप्ता ने अदालत को बताया कि यह जनहित याचिका जून 2006 में छपे चार अखबारों के लेखों के आधार पर दायर की गई थी। इस पर मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) ने सख्त लहजे में कहा कि इस याचिका को तो तुरंत खारिज कर दिया जाना चाहिए था। पीठ ने कहा कि सिर्फ अखबार का एक लेख किसी को जनहित याचिका दायर करने का अधिकार कैसे दे सकता है। याचिका दायर करने के लिए अपने हिसाब से लेख लिखवाना तो बहुत ही आसान काम है।
 
*जस्टिस नागरत्ना ने याचिकाओं के दुरुपयोग पर क्या कहा?*
सुनवाई के दौरान पीठ की अहम सदस्य जस्टिस बीवी नागरत्ना ने याचिकाओं के दुरुपयोग को लेकर काफी नाराजगी जताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि हम हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में आम जनता की भलाई के लिए जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हैं, न कि अखबारों में छपे लेखों के आधार पर। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि आज जनहित याचिका असल में 'प्राइवेट', 'पब्लिसिटी', 'पैसा' और 'पॉलिटिकल' इंटरेस्ट लिटिगेशन बन गई है। उन्होंने यह भी साफ किया कि लोग भले ही इन सबको पीआईएल कहते हों, लेकिन अदालत केवल सच्ची और वास्तविक जनहित याचिकाओं पर ही विचार करती है।
 
*सबरीमाला मंदिर मामले में पहले क्या फैसला आया था?*
जस्टिस नागरत्ना ने यह भी बताया कि मुख्य न्यायाधीश को रोज सैकड़ों चिट्ठियां मिलती हैं, तो क्या उन सभी को जनहित याचिका में बदल दिया जाए। अदालत में इस मामले की सुनवाई अभी भी जारी है। आपको बता दें कि सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने एक बड़ा फैसला सुनाया था। उस फैसले में 4:1 के बहुमत से केरल के सबरीमाला अयप्पा मंदिर में 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर लगे सदियों पुराने प्रतिबंध को हटा दिया गया था। अदालत ने उस समय इस पुरानी हिंदू धार्मिक प्रथा को पूरी तरह से अवैध और असंवैधानिक करार दिया था।
 
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।






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