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जैन हैं तो जैन लिखाएं—सही जनगणना से समाज को सशक्त बनाएं

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नई दिल्ली, 07 सितम्बर  2026  (यूटीएन)।, भारत में होने वाली जनगणना-2027 इस बार कई मायनों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सरकार के अनुसार यह देश की पहली डिजिटल जनगणना होगी, जिसमें आधुनिक तकनीक के माध्यम से आंकड़े एकत्र किए जाएंगे और स्व-गणना जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। ऐसे समय में देश के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह जनगणना की प्रक्रिया को समझे और अपनी वास्तविक जानकारी सही रूप में दर्ज कराए।

जैन समाज के लिए भी यह अवसर केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपनी वास्तविक सामाजिक और धार्मिक पहचान को स्पष्ट रूप से दर्ज कराने का अवसर है।

सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है—जैन हैं तो जैन लिखाएं।

यह किसी संख्या को कृत्रिम रूप से बढ़ाने या घटाने का अभियान नहीं है। यह किसी दूसरे समुदाय के विरुद्ध अभियान भी नहीं है। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि जो व्यक्ति वास्तव में जैन धर्म को मानता है, वह अपनी धार्मिक पहचान बताने में किसी प्रकार का संकोच न करे और जनगणना में अपनी वास्तविक पहचान स्पष्ट रूप से दर्ज कराए।

सही संख्या—सशक्त समाज

जनगणना किसी देश या समाज के लिए केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं होती। इसके माध्यम से देश की सामाजिक संरचना, जनसंख्या और विभिन्न वर्गों की स्थिति को समझने में सहायता मिलती है। भविष्य की अनेक नीतियों और योजनाओं के लिए विश्वसनीय आंकड़े महत्वपूर्ण आधार बनते हैं।

इसलिए जैन समाज के सामने भी यह प्रश्न होना चाहिए कि हमारी वास्तविक संख्या कितनी है और क्या वह आधिकारिक आंकड़ों में सही रूप से दिखाई देती है?

यदि कोई व्यक्ति स्वयं को जैन धर्म का अनुयायी मानता है, तो उसे अपनी धार्मिक पहचान स्पष्ट रूप से “जैन” दर्ज कराने में संकोच नहीं करना चाहिए।

संदेश बिल्कुल साफ है—

न संख्या बढ़ानी है, न संख्या घटानी है।
बस अपनी वास्तविक संख्या और सही पहचान दर्ज करानी है।

गलत जानकारी देना इस अभियान का उद्देश्य नहीं है। किसी प्रकार की अतिशयोक्ति भी नहीं होनी चाहिए। जरूरत केवल जागरूकता की है।

पहचान केवल एक शब्द नहीं, हजारों वर्षों की विरासत है

जैन होना केवल एक धार्मिक संबोधन नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही महान आध्यात्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ाव है।

भगवान महावीर की अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह, सत्य और आत्मसंयम की शिक्षाएं केवल जैन समाज तक सीमित नहीं हैं। इन मूल्यों का प्रभाव भारतीय सभ्यता और मानवता के व्यापक चिंतन पर रहा है।

हमारी पहचान हमारे तीर्थंकरों की वाणी में है।
हमारी पहचान जिनालयों की शिखाओं में है।
हमारी पहचान शास्त्रों और ग्रंथों में है।
हमारी पहचान साधु-साध्वियों की तपस्या में है।
हमारी पहचान हमारे संस्कारों और जीवन-पद्धति में है।

ऐसी महान परंपरा से जुड़े व्यक्ति के लिए अपनी धार्मिक पहचान के प्रति जागरूक रहना स्वाभाविक सामाजिक जिम्मेदारी है।

हर घर तक पहुंचे जागरूकता का संदेश

जनगणना के समय जागरूकता केवल समाज के बड़े संगठनों या पदाधिकारियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। प्रत्येक परिवार इस अभियान की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकता है।

एक परिवार दूसरे परिवार को जानकारी दे।
एक युवा अपने मित्रों को जागरूक करे।
एक समाजसेवी अपने क्षेत्र के परिवारों तक संदेश पहुंचाए।
सामाजिक और धार्मिक संस्थाएं बैठकों में जनगणना की जानकारी दें।

विशेष रूप से उन परिवारों तक पहुंचना आवश्यक है, जहां जनगणना की प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त जानकारी नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों, दूर-दराज के इलाकों और वरिष्ठ नागरिकों वाले परिवारों को भी सही प्रक्रिया और आधिकारिक जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

आज डिजिटल युग में सोशल मीडिया इस जागरूकता का प्रभावी माध्यम बन सकता है। व्हाट्सऐप समूहों, डिजिटल पोस्टर, वीडियो संदेश और सामाजिक मंचों के माध्यम से तथ्यपरक जानकारी अधिक से अधिक परिवारों तक पहुंचाई जा सकती है।

युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण

जैन समाज की युवा पीढ़ी इस जागरूकता अभियान को नई दिशा दे सकती है। युवा तकनीक से जुड़े हैं और डिजिटल माध्यमों के प्रभावी उपयोग में सक्षम हैं।

प्रत्येक युवा यह संकल्प ले सकता है—

“मैं स्वयं जागरूक रहूंगा और कम से कम दस जैन परिवारों को जनगणना के प्रति जागरूक करूंगा।”

यदि एक युवा दस परिवारों तक संदेश पहुंचाता है और प्रत्येक परिवार आगे दस परिवारों को जागरूक करता है, तो थोड़े समय में यह संदेश व्यापक सामाजिक अभियान का रूप ले सकता है।

लेकिन इस अभियान में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संदेश तथ्यपरक हो। किसी प्रकार की अफवाह, गलत जानकारी या अतिरंजित दावा समाज के हित में नहीं है।

मातृशक्ति बने जागरूकता की अग्रदूत

जैन परिवारों में धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्कारों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।

घर में बच्चों को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के बारे में जानकारी देने वाली पहली शिक्षिका अक्सर मां ही होती है। इसलिए यदि परिवार की महिलाएं भी जनगणना के महत्व को समझें और परिवार के सदस्यों को सही जानकारी देने के लिए प्रेरित करें, तो जागरूकता का प्रभाव और व्यापक हो सकता है।

घर जागरूक होगा तो समाज जागरूक होगा।

वरिष्ठजन दें अनुभव और मार्गदर्शन

समाज के वरिष्ठ नागरिक हमारी परंपरा और सामाजिक अनुभव के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। उनके पास समाज के परिवारों और विभिन्न क्षेत्रों से लंबे समय से जुड़े रहने का अनुभव है।

वरिष्ठजन अपने परिवारों, रिश्तेदारों और परिचितों को जनगणना के महत्व की जानकारी दे सकते हैं। वहीं युवा इस संदेश को आधुनिक माध्यमों से आगे बढ़ा सकते हैं।

अनुभव और ऊर्जा का यह मेल समाज को अधिक संगठित बना सकता है।

सामाजिक संस्थाओं को बनानी होगी साझा रणनीति

जैन समाज में धार्मिक, सामाजिक, शैक्षणिक और सेवा से जुड़ी अनेक संस्थाएं कार्यरत हैं। यदि ये संस्थाएं अपने स्तर पर जनगणना जागरूकता अभियान चलाएं तो इसका प्रभाव काफी व्यापक हो सकता है।

संस्थाओं द्वारा—

  • जागरूकता बैठकें आयोजित की जा सकती हैं।
  • डिजिटल सामग्री प्रसारित की जा सकती है।
  • युवाओं को अभियान से जोड़ा जा सकता है।
  • परिवारों को आधिकारिक प्रक्रिया की जानकारी दी जा सकती है।
  • वरिष्ठ नागरिकों और ग्रामीण परिवारों तक स्वयंसेवकों के माध्यम से संदेश पहुंचाया जा सकता है।
  • अफवाहों और अपुष्ट सूचनाओं से बचने के लिए अधिकृत स्रोतों की जानकारी दी जा सकती है।

इस पूरे अभियान का स्वर शांतिपूर्ण, तथ्यपरक और जिम्मेदार होना चाहिए।

संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन संख्या ही सब कुछ नहीं

किसी समाज की ताकत केवल उसकी जनसंख्या से तय नहीं होती। उसकी वास्तविक शक्ति शिक्षा, संस्कार, संगठन, सेवा, आर्थिक योगदान, सामाजिक प्रतिबद्धता और नैतिक मूल्यों में भी होती है।

फिर भी सही आंकड़े महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे समाज की वास्तविक स्थिति को समझने में सहायता करते हैं।

यदि आंकड़े ही सही नहीं होंगे तो समाज की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन कैसे होगा?

इसलिए जनगणना को जैन समाज केवल सरकारी प्रक्रिया मानकर नजरअंदाज न करे। इसे सामाजिक जागरूकता और आत्ममंथन के अवसर के रूप में भी देखा जाना चाहिए।


वोट-बैंक नहीं, नीति के साझेदार बनें

जनगणना के प्रश्न के साथ जैन समाज के सामने एक और महत्वपूर्ण विषय आता है—राजनीतिक जागरूकता और जवाबदेही।

लोकतंत्र में किसी समाज की राजनीतिक शक्ति केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह किस राजनीतिक दल को वोट देता है। वास्तविक लोकतांत्रिक शक्ति तब बनती है, जब समाज अपने मुद्दों को सामने रखता है और सभी राजनीतिक दलों से उनके समाधान को लेकर सवाल करता है।

इसलिए जैन समाज को केवल यह प्रश्न नहीं पूछना चाहिए कि—

“हम किसके साथ हैं?”

बल्कि इससे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न होना चाहिए—

“हमारे मुद्दों के साथ कौन है?”

यह अंतर समझना जरूरी है।

किसी राजनीतिक दल का समर्थन करना प्रत्येक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। समाज के भीतर राजनीतिक विचारों की विविधता भी स्वाभाविक है। लेकिन किसी पूरे समाज को किसी एक राजनीतिक दल की स्थायी संपत्ति मान लेना स्वस्थ लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है।

सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक दल बदलते हैं, लेकिन समाज के मुद्दे बने रहते हैं।

इसलिए जैन समाज की राजनीतिक सोच का आधार व्यक्ति या दल नहीं, बल्कि नीति और परिणाम होना चाहिए।

पहले नीति, फिर समर्थन

राजनीतिक दलों के लिए किसी समाज का समर्थन स्थायी संपत्ति नहीं होना चाहिए।

समाज को पूछना चाहिए—

काम क्या हुआ?
किस नीति पर निर्णय लिया गया?
कौन-सा वादा पूरा हुआ?
कौन-सा मुद्दा लंबित है?
समाज की समस्याओं के समाधान के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए?

केवल चुनावी मंच से सम्मान मिलना पर्याप्त नहीं है।

केवल प्रशंसा के शब्द पर्याप्त नहीं हैं।

केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं है।

नीति चाहिए।
क्रियान्वयन चाहिए।
परिणाम चाहिए।
और परिणाम के आधार पर जवाबदेही चाहिए।

जैन समाज को सभी राजनीतिक दलों के सामने अपना समान नीति-अजेंडा रखना चाहिए और समान कसौटी पर उनका मूल्यांकन करना चाहिए।

जहां अच्छी नीति हो—समर्थन।

जहां कमी हो—सवाल।

जहां वादा हो—जवाबदेही।

यही स्वस्थ लोकतांत्रिक सामुदायिक राजनीति का आधार हो सकता है।


जैन तीर्थ और सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण

जैन समाज के सामने अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का विषय भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

देशभर में प्राचीन जैन मंदिर, तीर्थ, ऐतिहासिक स्थल, पांडुलिपियां और धार्मिक धरोहरें मौजूद हैं। इनका संरक्षण केवल किसी एक पीढ़ी का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति दायित्व है।

जहां कहीं जैन तीर्थों, मंदिरों या ऐतिहासिक धरोहरों के अधिकार और संरक्षण से जुड़े विवाद या चुनौतियां सामने आती हैं, वहां समाज को तथ्यों, कानून और संवैधानिक प्रक्रिया के आधार पर अपनी बात मजबूती से रखनी चाहिए।

इस विषय पर किसी राजनीतिक दल के प्रति अंधसमर्थन या अंधविरोध के बजाय यह देखा जाना चाहिए कि वास्तविकता क्या है, कानूनी स्थिति क्या है और समाधान के लिए कौन ठोस कदम उठा रहा है।

पहचान सुरक्षित होगी, तभी विरासत सुरक्षित रहेगी।

शिक्षा और युवा सशक्तीकरण हो प्राथमिकता

किसी भी समाज का भविष्य केवल उसकी परंपराओं से नहीं, बल्कि उसकी नई पीढ़ी की क्षमता से तय होता है।

जैन समाज को शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार, उद्यमिता, तकनीक, कानून और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

जरूरत इस बात की है कि युवा केवल अपनी धार्मिक पहचान पर गर्व करने तक सीमित न रहें, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका भी निभाएं।

शिक्षित और सक्षम युवा समाज की सबसे बड़ी शक्ति हैं।

इसलिए समाज को ऐसे कार्यक्रमों को बढ़ावा देना चाहिए जो युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं, उच्च शिक्षा, स्टार्टअप, व्यवसाय, तकनीकी शिक्षा और नए रोजगार अवसरों से जोड़ें।

व्यापार और उद्यमिता को मिले प्रोत्साहन

जैन समाज की आर्थिक और व्यापारिक परंपरा लंबे समय से मजबूत रही है। बदलते समय में इस परंपरा को आधुनिक उद्यमिता से जोड़ना आवश्यक है।

नई पीढ़ी को डिजिटल व्यापार, तकनीकी स्टार्टअप, वित्तीय प्रबंधन, आधुनिक उद्योग और वैश्विक बाजार की संभावनाओं से जोड़ने की आवश्यकता है।

समाज के सफल उद्यमी युवाओं का मार्गदर्शन कर सकते हैं।

एक सफल व्यक्ति यदि दस युवाओं को आगे बढ़ने में मदद करे, तो समाज की आर्थिक शक्ति कई गुना बढ़ सकती है।

अहिंसा और पर्यावरण—जैन दर्शन की वैश्विक शक्ति

जैन दर्शन की सबसे बड़ी विशेषताओं में अहिंसा, अपरिग्रह, संयम और जीव-दया प्रमुख हैं।

आज पूरी दुनिया पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन और जीवनशैली से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में जैन दर्शन के अनेक मूल्यों को आधुनिक सामाजिक विमर्श से जोड़ने की आवश्यकता है।

जैन समाज केवल अपनी पहचान की बात न करे, बल्कि देश और दुनिया के सामने अपने दर्शन के सकारात्मक मूल्यों को भी प्रस्तुत करे।

अहिंसा केवल धार्मिक सिद्धांत नहीं, मानवता के भविष्य की आवश्यकता भी है।

जनगणना से शुरू हो व्यापक सामाजिक जागरूकता

जनगणना में अपनी सही धार्मिक पहचान दर्ज कराना पहला कदम हो सकता है। इसके बाद समाज को अपनी वास्तविक सामाजिक स्थिति को समझने और उसके आधार पर भविष्य की दिशा तय करने की जरूरत है।

पहला कदम—सही जानकारी।

दूसरा कदम—अपनी सामाजिक स्थिति की समझ।

तीसरा कदम—स्पष्ट सामाजिक और नीति-अजेंडा।

चौथा कदम—हर सरकार और हर राजनीतिक दल से जवाबदेह संवाद।

इस प्रक्रिया में न किसी दल से स्थायी समर्थन आवश्यक है और न स्थायी विरोध।

स्थायी केवल समाजहित होना चाहिए।


आइए संकल्प लें

हम जनगणना के महत्व को समझेंगे।

हम अपनी वास्तविक जानकारी सही रूप में देंगे।

धार्मिक पहचान पूछे जाने पर अपनी वास्तविक पहचान “जैन” स्पष्ट रूप से दर्ज कराएंगे।

हम किसी भी प्रकार की गलत जानकारी का समर्थन नहीं करेंगे।

हम अफवाहों के बजाय आधिकारिक जानकारी पर विश्वास करेंगे।

हम अपने परिवार और समाज के अन्य परिवारों को जागरूक करेंगे।

हम युवाओं को इस अभियान से जोड़ेंगे।

हम अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए जागरूक रहेंगे।

हम राजनीतिक दलों का मूल्यांकन केवल नारों से नहीं, बल्कि नीतियों और परिणामों से करेंगे।

क्योंकि—

पहचान हमारी है, जिम्मेदारी भी हमारी है।

अंतिम आह्वान—आज जागना ही नहीं, जगाना भी है

आइए, घर-घर यह संदेश पहुंचाएं—

“जैन हैं—तो जैन लिखाएं।
सही जानकारी—सही पहचान।
सही जनगणना—सशक्त समाज।”

न संख्या बढ़ानी है,
न संख्या घटानी है।

बस अपनी वास्तविक पहचान
सही-सही दर्ज करानी है।

एक जागरूक परिवार दस परिवारों को जागरूक कर सकता है। दस परिवार सौ परिवारों तक संदेश पहुंचा सकते हैं। और यही छोटी-छोटी पहल एक बड़े सामाजिक जन-जागरण का रूप ले सकती है।

आज आवश्यकता केवल स्वयं जागने की नहीं, बल्कि दूसरों को जगाने की है।

एक दीपक स्वयं जलता है और अनेक दीपकों को रोशन कर सकता है।

आइए, हम वह पहला दीपक बनें।

“जागृत जैन—सशक्त जैन समाज।”

“जनगणना में सही पहचान—जैन समाज का स्वाभिमान।”

और इसके साथ एक और संकल्प—

वोट-बैंक नहीं, नीति के साझेदार बनें।

न स्थायी समर्थन।
न स्थायी विरोध।

स्थायी केवल समाजहित, सत्य, अहिंसा और सही नीति की कसौटी हो।

यही जागरूकता आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी और सबसे मूल्यवान विरासत होगी।

लेखक : गजराज जैन गंगवाल

विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।,







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