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रामलीला से पहले ‘रामायण’ पर रण—बॉलीवुड की परीक्षा, आस्था का सवाल

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नई दिल्ली,06 सितम्बर  2026  (यूटीएन)। देश में रामलीला के मंच सजने वाले हैं। गांवों से लेकर महानगरों तक भगवान श्रीराम की कथा एक बार फिर जन-जन के बीच गूंजने की तैयारी में है। कहीं राम के वनगमन का मंचन होगा, कहीं भरत-मिलाप का भावुक प्रसंग दर्शकों की आंखें नम करेगा तो कहीं हनुमान की भक्ति और संजीवनी बूटी के प्रसंग पर जयकारे गूंजेंगे। दशहरे के दिन बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में रावण का दहन होगा।

लेकिन इस बार पारंपरिक रामलीला के मंच सजने से पहले ही रामकथा को लेकर सिनेमा के पर्दे पर बहस तेज हो गई है। रणबीर कपूर अभिनीत बहुचर्चित फिल्म ‘रामायण’ को लेकर धार्मिक और सांस्कृतिक संगठनों की चिंताएं सामने आने लगी हैं। फिल्म की प्रस्तुति, पात्रों के चित्रण और रामकथा की मर्यादा को लेकर सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंचों तक चर्चा जारी है।

दिल्ली के श्रीरामलीला महासंघ की ओर से फिल्म की रिलीज से पहले विशेष स्क्रीनिंग की मांग किए जाने और मांग स्वीकार नहीं होने की स्थिति में विरोध की चेतावनी ने इस पूरे मामले को और चर्चा में ला दिया है।

महासंघ का कहना है कि रामायण केवल एक कहानी या मनोरंजन की सामग्री नहीं है। करोड़ों भारतीयों के लिए यह आस्था, संस्कार, मर्यादा और जीवन-मूल्यों से जुड़ा विषय है। इसलिए रामकथा पर फिल्म बनाते समय निर्माताओं की जिम्मेदारी सामान्य फिल्मों की तुलना में कहीं अधिक हो जाती है।

राम के चरित्र को लेकर विशेष चिंता

श्रीरामलीला महासंघ के अध्यक्ष अर्जुन कुमार ने फिल्म में भगवान श्रीराम के चरित्र के चित्रण को लेकर अपनी आशंकाएं व्यक्त की हैं। उनका कहना है कि रामायण जैसे विषय पर किसी भी प्रकार की सिनेमाई स्वतंत्रता लेने से पहले उसके सामाजिक और धार्मिक प्रभावों को समझना जरूरी है।

महासंघ की मांग है कि फिल्म रिलीज होने से पहले रामलीला से जुड़े प्रतिनिधियों और धार्मिक-सांस्कृतिक क्षेत्र के लोगों को फिल्म दिखाई जाए, ताकि यह देखा जा सके कि इसमें रामकथा की मूल भावना, मर्यादा और धार्मिक संवेदनशीलता का ध्यान रखा गया है या नहीं।

अर्जुन कुमार के अनुसार, संगठन किसी रचनात्मक अभिव्यक्ति के खिलाफ नहीं है, लेकिन करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े पात्रों के चित्रण में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी आवश्यक है।

उनका कहना है कि यदि फिल्म में ऐसा कोई दृश्य, संवाद या प्रस्तुति सामने आती है जिसे धार्मिक भावनाओं के विपरीत माना जाए तो संगठन लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आपत्ति दर्ज कराएगा।

राम सिर्फ फिल्म का किरदार नहीं

रामलीला महासंघ का सबसे बड़ा तर्क यही है कि भगवान श्रीराम को सामान्य फिल्मी पात्र की तरह नहीं देखा जा सकता।

भारतीय समाज में राम केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक आदर्श के रूप में भी स्थापित हैं। राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। उनके जीवन से पुत्र धर्म, भ्रातृ प्रेम, त्याग, सत्य, कर्तव्य, न्याय और शासन की अवधारणाओं को जोड़ा जाता है।

राम वन जाते हैं तो त्याग का उदाहरण बनते हैं। भरत से मिलते हैं तो भाईचारे की मिसाल सामने आती है। शबरी के प्रसंग में सामाजिक समरसता का संदेश देखा जाता है। हनुमान के साथ उनका संबंध भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। रावण के विरुद्ध युद्ध केवल सत्ता संघर्ष नहीं बल्कि धर्म और अधर्म के संघर्ष के रूप में देखा जाता है।

यही वजह है कि जब राम का चित्रण किसी बड़े सिनेमाई प्रोजेक्ट में किया जाता है तो दर्शकों की अपेक्षा केवल अभिनय से जुड़ी नहीं होती। उनके लिए पात्र का पहनावा, भाषा, व्यवहार, संवाद, भाव-भंगिमा और पूरी प्रस्तुति भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

बॉलीवुड के सामने सबसे बड़ी चुनौती

‘रामायण’ जैसी फिल्म बॉलीवुड के लिए केवल एक बड़ी फिल्म नहीं बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी भी मानी जा सकती है।

एक तरफ फिल्म निर्माताओं के सामने आधुनिक दर्शकों के लिए भव्य और तकनीकी रूप से प्रभावशाली सिनेमा बनाने की चुनौती है। दूसरी तरफ रामायण के पारंपरिक स्वरूप और करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता बनाए रखने की अपेक्षा है।

फिल्म में आधुनिक विजुअल इफेक्ट्स, बड़े सेट, तकनीकी स्तर और अंतरराष्ट्रीय मानकों की प्रस्तुति दर्शकों को आकर्षित कर सकती है, लेकिन इसके साथ कथा की मूल भावना और सांस्कृतिक संदर्भ को लेकर भी सावधानी जरूरी होगी।

यही संतुलन फिल्म की सबसे बड़ी परीक्षा बन सकता है।

क्या रामायण को केवल मनोरंजन की दृष्टि से देखा जा सकता है?

रामलीला से जुड़े संगठनों का कहना है कि रामायण को केवल मनोरंजन की श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।

रामायण भारत के लोकजीवन में सदियों से अलग-अलग रूपों में मौजूद रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों में रामकथा की प्रस्तुति की अपनी परंपराएं हैं। कहीं रामलीला होती है तो कहीं लोकनाट्य, कथा-वाचन, भजन और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से रामकथा जन-जन तक पहुंचती है।

टीवी धारावाहिकों ने भी रामायण को घर-घर तक पहुंचाया है। अब बड़े पर्दे पर बनने वाली फिल्म से भी दर्शकों की अपेक्षाएं स्वाभाविक रूप से काफी अधिक हैं।

रामलीला महासंघ का मानना है कि निर्माता चाहे जितनी रचनात्मक स्वतंत्रता लें, लेकिन रामकथा के मूल चरित्र और धार्मिक मर्यादा के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए।

सोशल मीडिया ने बढ़ाई बहस

फिल्म को लेकर सोशल मीडिया पर भी अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग फिल्म के भव्य स्तर और आधुनिक तकनीक को लेकर उत्साहित हैं तो कुछ लोग पात्रों के चयन और चित्रण को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

सोशल मीडिया पर चल रही बहस ने यह भी दिखाया है कि धार्मिक विषयों पर बनने वाली फिल्मों को लेकर दर्शकों की संवेदनशीलता कितनी अधिक है।

हालांकि सोशल मीडिया पर सामने आने वाली हर प्रतिक्रिया को आधिकारिक या तथ्यात्मक मानना उचित नहीं होगा। फिल्म से जुड़े अंतिम निर्णय और वास्तविक प्रस्तुति को लेकर स्पष्ट तस्वीर फिल्म के आधिकारिक प्रदर्शन और निर्माताओं की जानकारी के बाद ही सामने आएगी।

स्वरा भास्कर के बयानों को लेकर भी नाराजगी

इसी बीच अभिनेत्री स्वरा भास्कर द्वारा सनातन धर्म और हिंदू आस्था को लेकर की गई कथित टिप्पणियों पर भी रामलीला कमेटी ने आपत्ति जताई है।

रामलीला कमेटी के अध्यक्ष अर्जुन कुमार ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की महत्वपूर्ण विशेषता है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में किसी भी धार्मिक समुदाय की भावनाओं को लेकर संवेदनशीलता भी जरूरी है।

उन्होंने स्वरा भास्कर को रामलीला देखने और भारतीय संस्कृति तथा रामायण के मूल्यों को समझने की सलाह दी।

अर्जुन कुमार ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को सनातन धर्म पर प्रश्न उठाने हैं या किसी परंपरा की आलोचना करनी है तो वह तथ्य, तर्क और मर्यादा के साथ अपनी बात रख सकता है। लेकिन धार्मिक आस्था का अपमान करने वाली भाषा से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है।

‘पहले रामलीला देखिए, फिर सनातन को समझिए’

अर्जुन कुमार ने कहा कि रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा भी है।

उनके मुताबिक रामलीला में राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, हनुमान और अन्य पात्रों के माध्यम से भारतीय परिवार व्यवस्था, त्याग, कर्तव्य, भाईचारे, सत्य और मर्यादा जैसे मूल्यों को समझने का अवसर मिलता है।

उन्होंने कहा कि जो लोग सनातन धर्म को समझना चाहते हैं, उन्हें उसके मूल ग्रंथों, परंपराओं और सांस्कृतिक आयोजनों का अध्ययन करना चाहिए। रामलीला भी इसी परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है।

आस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन

इस पूरे विवाद ने एक व्यापक सवाल भी खड़ा किया है—अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक आस्था के सम्मान के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए?

लोकतांत्रिक समाज में कलाकारों और फिल्म निर्माताओं को रचनात्मक स्वतंत्रता प्राप्त है। वहीं धार्मिक और सांस्कृतिक समूहों को भी अपनी भावनाएं और आपत्तियां लोकतांत्रिक तरीके से रखने का अधिकार है।

जरूरत इस बात की है कि दोनों पक्ष संवाद का रास्ता अपनाएं।

फिल्मकारों के लिए चुनौती यह है कि वे अपनी रचनात्मक दृष्टि को बनाए रखते हुए धार्मिक संवेदनशीलता का सम्मान करें। वहीं धार्मिक संगठनों से भी अपेक्षा रहती है कि किसी फिल्म या प्रस्तुति के वास्तविक प्रदर्शन से पहले केवल अनुमान या सोशल मीडिया चर्चाओं के आधार पर अंतिम निष्कर्ष न निकालें।

रामायण पर विवाद कोई नई बात नहीं

रामायण को लेकर सार्वजनिक बहस पहली बार नहीं हो रही है। अलग-अलग समय में रामकथा पर आधारित फिल्मों, धारावाहिकों, नाटकों और अन्य प्रस्तुतियों में पात्रों के चित्रण को लेकर बहस होती रही है।

इसका कारण भी स्पष्ट है। रामायण एक ऐसी कथा है जिसके साथ करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है। अलग-अलग समुदायों और क्षेत्रों में रामकथा की प्रस्तुति के तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन श्रीराम के प्रति श्रद्धा व्यापक है।

इसलिए रामायण पर बनने वाली किसी भी बड़ी फिल्म का प्रभाव केवल बॉक्स ऑफिस तक सीमित नहीं रहता। वह सामाजिक और सांस्कृतिक चर्चा का हिस्सा भी बन जाती है।

दशहरे से पहले माहौल पर सबकी नजर

रामलीला का मौसम नजदीक आने के साथ इस विवाद पर नजरें और टिक सकती हैं। एक तरफ मैदानों में रामलीला की तैयारियां तेज होंगी, दूसरी तरफ फिल्म को लेकर दर्शकों और धार्मिक संगठनों की उत्सुकता बढ़ेगी।

रामलीला आयोजकों के लिए यह सिर्फ एक फिल्म का मुद्दा नहीं बल्कि रामकथा की प्रस्तुति से जुड़ा प्रश्न है।

वहीं फिल्म निर्माताओं के लिए यह अवसर है कि वे अपनी फिल्म के माध्यम से भारतीय संस्कृति और रामकथा को बड़े स्तर पर दुनिया के सामने प्रस्तुत करें।

क्या फिल्म बनेगी आस्था और आधुनिक सिनेमा के बीच पुल?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ‘रामायण’ आधुनिक सिनेमा और पारंपरिक आस्था के बीच एक मजबूत पुल बना पाएगी?

अगर फिल्मकार रामकथा की मूल भावना को बरकरार रखते हुए आधुनिक तकनीक और सिनेमाई भाषा का इस्तेमाल करते हैं तो यह फिल्म भारतीय पौराणिक कथाओं को वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाने का बड़ा माध्यम बन सकती है।

लेकिन यदि कथा के मूल चरित्रों या धार्मिक भावनाओं को लेकर कोई विवादित प्रस्तुति सामने आती है तो फिल्म के सामने विरोध और विवाद की चुनौती भी खड़ी हो सकती है।

इसलिए आने वाले दिनों में फिल्म की हर जानकारी, किरदारों के लुक, संवाद, पोस्टर, ट्रेलर और अंततः पूरी फिल्म पर दर्शकों की नजर रहेगी।

‘सनातन के सम्मान से समझौता नहीं’

रामलीला कमेटी ने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए कहा है कि सनातन धर्म भारतीय संस्कृति और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसके सम्मान से समझौता नहीं किया जाना चाहिए।

अर्जुन कुमार ने कहा कि मतभेद लोकतंत्र में स्वाभाविक हैं। आलोचना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन आलोचना और अपमान के बीच अंतर समझना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि सनातन पर सवाल पूछे जा सकते हैं, बहस की जा सकती है और विचार रखे जा सकते हैं, लेकिन भाषा में मर्यादा और संवाद में सम्मान होना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि सनातन की सहिष्णुता को कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए।

अब निगाहें फिल्म की आधिकारिक प्रस्तुति पर

फिलहाल विवाद के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यही होगी कि फिल्म निर्माता रामायण को किस दृष्टिकोण से दर्शकों के सामने रखते हैं।

क्या फिल्म पारंपरिक रामकथा की मर्यादा को प्राथमिकता देगी? क्या पात्रों को भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक भावनाओं के अनुरूप प्रस्तुत किया जाएगा? क्या आधुनिक सिनेमाई तकनीक कथा की भव्यता बढ़ाएगी या रचनात्मक बदलाव विवाद का कारण बनेंगे?

इन सवालों के जवाब फिल्म की वास्तविक प्रस्तुति सामने आने के बाद ही मिलेंगे।

फिलहाल इतना तय है कि रामलीला के मंचों पर श्रीराम की जय-जयकार के साथ-साथ सिनेमा के पर्दे पर आने वाली ‘रामायण’ भी चर्चा के केंद्र में रहने वाली है।

एक तरफ करोड़ों लोगों की आस्था है, दूसरी तरफ फिल्मकारों की रचनात्मक स्वतंत्रता। दोनों के बीच संतुलन बनाना ही इस फिल्म की सबसे बड़ी कसौटी होगी।

राम केवल एक सिनेमाई पात्र नहीं हैं—वे भारतीय जनमानस में आस्था, मर्यादा और सांस्कृतिक स्मृति के प्रतीक हैं। यही कारण है कि ‘रामायण’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि आस्था और आधुनिक सिनेमा के बीच संवाद की बड़ी परीक्षा बनती दिखाई दे रही है।

विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।







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