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हर राज्य में कैंसर का सरकारी केंद्र: टाटा मेमोरियल तकनीकी साझेदार

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नई दिल्ली,18 अगस्त 2026 (यूटीएन)। देश में कैंसर के बढ़ते मामलों और इलाज के लिए मरीजों की बड़े शहरों पर निर्भरता को कम करने के उद्देश्य से हर राज्य में सरकारी स्तर पर कैंसर उपचार की मजबूत व्यवस्था विकसित करने की सिफारिश की गई है। संसदीय स्थायी समिति ने 28 राज्यों में हब-स्पोक मॉडल के आधार पर कैंसर उपचार नेटवर्क तैयार करने पर जोर दिया है। इसके तहत प्रत्येक राज्य में एक सरकारी अस्पताल को मुख्य कैंसर केंद्र बनाया जाएगा, जबकि एम्स, सरकारी मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल उससे जुड़े सहयोगी केंद्र के रूप में काम करेंगे।

समिति का मानना है कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में इलाज की सफलता के लिए केवल बड़े अस्पतालों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। मरीज की बीमारी की पहचान जितनी जल्दी होगी और उपचार की शुरुआत जितनी जल्द होगी, उतना ही बेहतर परिणाम मिलने की संभावना होगी। इसलिए जिला और स्थानीय स्तर पर कैंसर की जांच को मजबूत करने के साथ-साथ विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह को भी मरीजों के करीब पहुंचाने की जरूरत बताई गई है।

टाटा मेमोरियल सेंटर बनेगा तकनीकी साझेदार

कैंसर की जांच, उपचार, प्रशिक्षण और मरीजों की देखभाल के मानकों में एकरूपता लाने के लिए समिति ने टाटा मेमोरियल सेंटर को राष्ट्रीय तकनीकी साझेदार बनाने की सिफारिश की है। इससे अलग-अलग राज्यों और अस्पतालों में कैंसर उपचार के लिए विशेषज्ञ मार्गदर्शन उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।

प्रस्तावित व्यवस्था में जिला अस्पतालों और छोटे स्वास्थ्य केंद्रों को केवल मरीजों को बड़े अस्पतालों में रेफर करने वाली इकाई के रूप में नहीं देखा जाएगा। यहां प्रारंभिक जांच, आवश्यक परीक्षण और मरीज की स्थिति का आकलन किया जाएगा। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञों से ऑनलाइन सलाह लेकर आगे की उपचार योजना तैयार की जा सकेगी।

गांव और जिले के मरीजों को मिलेगा बड़ा फायदा

कैंसर के इलाज में सबसे बड़ी परेशानियों में से एक है कि मरीजों को जांच और विशेषज्ञ इलाज के लिए दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। कई बार मरीज बीमारी की गंभीर स्थिति में अस्पताल पहुंचते हैं।

हब-स्पोक नेटवर्क लागू होने के बाद शुरुआती स्तर पर ही कैंसर की आशंका वाले मरीजों की पहचान करने और उन्हें उचित चिकित्सा व्यवस्था से जोड़ने पर जोर रहेगा। इससे मरीजों और उनके परिवारों को बार-बार लंबी दूरी की यात्रा करने की जरूरत कम हो सकती है।

स्थानीय स्तर पर जांच होने से मरीज को यह भी पता चल सकेगा कि उसे सामान्य उपचार की आवश्यकता है या विशेषज्ञ कैंसर केंद्र में रेफर किया जाना चाहिए।

क्या है हब-स्पोक व्यवस्था?

हब-स्पोक मॉडल में एक बड़े और विशेषज्ञता वाले अस्पताल को हब बनाया जाता है। इसके साथ जिला अस्पताल, मेडिकल कॉलेज और अन्य सरकारी स्वास्थ्य संस्थान स्पोक सेंटर के रूप में जुड़े रहते हैं।

मुख्य कैंसर हब से विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह, उपचार संबंधी मार्गदर्शन, जांच की विशेषज्ञता और प्रशिक्षण छोटे केंद्रों तक पहुंचाया जाएगा। इस व्यवस्था में हर मरीज को सीधे बड़े कैंसर अस्पताल भेजने के बजाय उसकी बीमारी की गंभीरता के अनुसार उपचार का स्तर तय किया जा सकेगा।

कैसे काम करेगा मॉडल?

पहला चरण: जिला या स्थानीय अस्पताल में मरीज की प्रारंभिक जांच होगी।

दूसरा चरण: जरूरत पड़ने पर पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी जैसी जांच कराई जाएगी।

तीसरा चरण: मरीज की रिपोर्ट और स्थिति विशेषज्ञ डॉक्टरों के साथ साझा की जाएगी।

चौथा चरण: विशेषज्ञ सलाह के आधार पर तय होगा कि मरीज का इलाज स्थानीय स्तर पर हो सकता है या उसे स्टेट कैंसर हब भेजना जरूरी है।

पांचवां चरण: गंभीर और जटिल मामलों को विशेषज्ञ कैंसर केंद्र में रेफर किया जाएगा।

इससे रेफरल व्यवस्था अधिक व्यवस्थित हो सकती है और मरीजों को अनावश्यक रूप से एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल जाने की परेशानी कम हो सकती है।

650 करोड़ में मुख्य कैंसर केंद्र

समिति के अनुमान के अनुसार, एक मॉडल कैंसर केंद्र तैयार करने में करीब 650 करोड़ रुपये की शुरुआती लागत आ सकती है। इसके संचालन पर सालाना लगभग 120 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।

वहीं, इससे जुड़े जिला या मेडिकल कॉलेज स्तर के केंद्र को विकसित करने में करीब 400 करोड़ रुपये की शुरुआती लागत और लगभग 40 करोड़ रुपये सालाना खर्च होने का अनुमान बताया गया है।

इससे स्पष्ट है कि कैंसर उपचार का व्यापक सरकारी नेटवर्क तैयार करना एक बड़ा निवेश मांगता है। हालांकि, इसके साथ अस्पतालों में उपकरण, विशेषज्ञ मानव संसाधन, जांच सुविधाएं और नियमित प्रशिक्षण जैसी व्यवस्थाओं को भी मजबूत करना होगा।

विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी सबसे बड़ी चुनौती

कैंसर के बढ़ते मामलों के बीच विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। समिति ने ऑन्कोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट और पैथोलॉजिस्ट समेत प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की कमी की ओर ध्यान दिलाया है।

कैंसर के इलाज में केवल सर्जन या मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट की भूमिका नहीं होती। सही निदान के लिए पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी विशेषज्ञों की जरूरत होती है। उपचार की निगरानी, दवाओं का प्रबंधन, रेडिएशन उपचार और मरीज की देखभाल के लिए अलग-अलग विशेषज्ञ और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी आवश्यक होते हैं।

इसलिए पूरे नेटवर्क को सफल बनाने के लिए डॉक्टरों के साथ नर्सिंग स्टाफ, तकनीशियन और अन्य संबद्ध स्वास्थ्यकर्मियों का प्रशिक्षण भी जरूरी होगा।

सिर्फ मेडिकल सीटें बढ़ाने से नहीं चलेगा काम

समिति ने स्पष्ट किया है कि केवल मेडिकल कॉलेजों में सीटें बढ़ाने से कैंसर उपचार की चुनौती का समाधान नहीं होगा। कैंसर के लिए विशेष प्रशिक्षण और विशेषज्ञता विकसित करना भी उतना ही जरूरी है।

जिला अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को कैंसर की शुरुआती पहचान, संदिग्ध मामलों की जांच, मरीज की रिपोर्ट समझने और समय पर रेफरल की ट्रेनिंग देने की आवश्यकता होगी।

विशेषज्ञ संस्थानों और सरकारी मेडिकल कॉलेजों के बीच प्रशिक्षण व्यवस्था विकसित होने से छोटे शहरों और जिलों में कैंसर देखभाल की क्षमता बढ़ाई जा सकती है।

जांच की गुणवत्ता में आएगी एकरूपता

कैंसर की पहचान और उपचार में जांच की गुणवत्ता बेहद महत्वपूर्ण होती है। अलग-अलग अस्पतालों में जांच की प्रक्रिया और रिपोर्टिंग के मानकों में अंतर होने पर मरीज के उपचार पर असर पड़ सकता है।

प्रस्तावित राष्ट्रीय तकनीकी साझेदारी के तहत पैथोलॉजी, रेडियोलॉजी और उपचार संबंधी प्रक्रियाओं के लिए बेहतर मानक विकसित करने पर जोर दिया जा सकता है। इससे अलग-अलग सरकारी अस्पतालों में उपचार की गुणवत्ता में एकरूपता लाने में मदद मिलेगी।

मरीजों को समय पर मिलेगा विशेषज्ञ मार्गदर्शन

प्रस्तावित नेटवर्क का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विशेषज्ञ डॉक्टरों की ऑनलाइन सलाह होगी। जिला स्तर पर मौजूद डॉक्टर मरीज की रिपोर्ट और स्थिति विशेषज्ञ केंद्र तक पहुंचा सकेंगे और वहां से उपचार संबंधी सलाह प्राप्त कर सकेंगे।

इससे ऐसे मरीजों को तत्काल बड़े शहरों की यात्रा करने की जरूरत नहीं होगी, जिनका प्रारंभिक उपचार स्थानीय स्तर पर संभव है। वहीं जटिल मामलों की पहचान होने पर उन्हें बिना अनावश्यक देरी के कैंसर हब तक भेजा जा सकेगा।

रेफरल सिस्टम होगा अधिक मजबूत

कैंसर उपचार में समय पर रेफरल महत्वपूर्ण है। यदि किसी मरीज को स्थानीय स्तर पर आवश्यक उपचार उपलब्ध नहीं है, तो उसे विशेषज्ञ केंद्र तक पहुंचाना जरूरी होता है।

हब-स्पोक व्यवस्था में इसी रेफरल प्रक्रिया को व्यवस्थित करने पर जोर है। इससे मरीज को अपनी बीमारी के अनुसार सही स्तर के अस्पताल तक पहुंचाने की व्यवस्था विकसित की जा सकेगी।

मरीज को क्या-क्या फायदा होगा?

  • स्थानीय स्तर पर कैंसर की शुरुआती जांच हो सकेगी।
  • संदिग्ध मरीजों की समय पर पहचान में मदद मिलेगी।
  • विशेषज्ञ डॉक्टरों की ऑनलाइन सलाह उपलब्ध कराई जा सकेगी।
  • गंभीर मरीजों को स्टेट कैंसर हब में रेफर किया जा सकेगा।
  • बड़े शहरों में इलाज के लिए जाने वाले मरीजों का दबाव कम हो सकता है।
  • जिला अस्पतालों के डॉक्टरों को विशेषज्ञ संस्थानों से प्रशिक्षण मिलेगा।
  • पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी की गुणवत्ता में एकरूपता लाने का प्रयास होगा।
  • सरकारी अस्पतालों के बीच बेहतर रेफरल नेटवर्क तैयार किया जा सकेगा।
  • मरीज और उनके परिवार का समय तथा यात्रा का खर्च कम हो सकता है।
  • कैंसर उपचार की विशेषज्ञ सुविधाओं को राज्यों और जिलों के करीब लाने में मदद मिलेगी।

कैंसर के खिलाफ सरकारी स्वास्थ्य नेटवर्क को मजबूती

इस प्रस्ताव का उद्देश्य केवल नए कैंसर अस्पताल बनाना नहीं, बल्कि मौजूदा सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को एक-दूसरे से जोड़कर एक समन्वित कैंसर उपचार व्यवस्था तैयार करना है। राज्य स्तर पर मजबूत कैंसर हब और जिला स्तर पर सक्षम स्पोक सेंटर होने से मरीज को बीमारी की शुरुआत से लेकर विशेषज्ञ उपचार तक एक व्यवस्थित स्वास्थ्य नेटवर्क मिल सकता है।

अगर इस मॉडल को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है तो कैंसर उपचार की सुविधा महानगरों तक सीमित रहने के बजाय राज्यों और जिलों तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। इसके लिए अस्पतालों के निर्माण के साथ-साथ आधुनिक जांच सुविधाओं, प्रशिक्षित डॉक्टरों, तकनीकी कर्मचारियों, दवाओं, रेडिएशन और सर्जिकल सुविधाओं तथा लगातार प्रशिक्षण पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा। कुल मिलाकर, संसदीय समिति की सिफारिश का केंद्रबिंदु यही है कि कैंसर की जांच और इलाज मरीज के घर के जितना संभव हो उतना करीब पहुंचे, जबकि जटिल मामलों के लिए विशेषज्ञ केंद्रों की सुविधा भी मजबूत बनी रहे।

विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।







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