नई दिल्ली,13 जुलाई 2026 (यूटीएन)। दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में आयोजित जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज के 84वें प्राकट्य महोत्सव को "राष्ट्रोत्कर्ष दिवस" के रूप में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर योग गुरु बाबा रामदेव ने अपने विस्तृत संबोधन में हिंदू राष्ट्र, भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, गुरुकुल शिक्षा, गौसंरक्षण, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संत, धर्माचार्य, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता और श्रद्धालु उपस्थित रहे।
समारोह में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह, आचार्य धर्मवीर, आदिशंकराचार्य सनातन सेवा संस्थानम् फाउंडेशन के संदीप गर्ग, विभिन्न धर्मसंघों एवं पीठ परिषदों के प्रतिनिधि, आदित्य वाहिनी और आनंद वाहिनी के पदाधिकारी, देश-विदेश से आए संत-महात्मा तथा बड़ी संख्या में विद्यार्थी और श्रद्धालु मौजूद रहे।
अपने संबोधन में बाबा रामदेव ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक पहचान हजारों वर्षों पुरानी है और यहां रहने वाले सभी लोगों की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक जड़ें इसी भूमि से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि धर्म और मजहब अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन भारत की सभ्यता और पूर्वजों की विरासत सभी की साझा धरोहर है।
"मुसलमानों को किसी प्रकार का भय नहीं होना चाहिए"
बाबा रामदेव ने कहा कि समाज में समय-समय पर यह आशंका व्यक्त की जाती है कि यदि भारत हिंदू राष्ट्र की दिशा में आगे बढ़ेगा तो मुसलमानों का क्या होगा। इस पर उन्होंने कहा कि किसी भी मुसलमान को डरने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत में रहने वाले प्रत्येक नागरिक को संविधान और कानून के तहत समान अधिकार प्राप्त हैं तथा समाज में परस्पर विश्वास और भाईचारा बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि उन्होंने वर्ष 2009 में भी इसी प्रकार की बात कही थी और आज भी अपने उसी विचार पर कायम हैं कि सभी भारतीयों के पूर्वज एक हैं। उन्होंने लोगों से आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देने का आह्वान किया।
पहनावा अलग हो सकता है, लेकिन चरित्र भारतीय संस्कृति के अनुरूप हो
अपने भाषण के दौरान बाबा रामदेव ने कहा कि किसी व्यक्ति का पहनावा, टोपी, पगड़ी, दाढ़ी या अन्य धार्मिक पहचान उसकी व्यक्तिगत आस्था का विषय है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म का हो, उसे अपने जीवन में ईमानदारी, सत्य, अनुशासन, सेवा, राष्ट्रभक्ति और नैतिक मूल्यों को अपनाना चाहिए। उनके अनुसार भारतीय संस्कृति का मूल संदेश भी यही है कि व्यक्ति का चरित्र श्रेष्ठ होना चाहिए।
गुरुकुल शिक्षा को बताया समय की आवश्यकता
बाबा रामदेव ने कहा कि आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक शिक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि बच्चों को बचपन से ही अच्छे संस्कार, अनुशासन और भारतीय संस्कृति की जानकारी दी जाए तो समाज में अनेक सामाजिक समस्याओं का समाधान स्वतः हो सकता है।
उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे अपने बच्चों को केवल परीक्षा और नौकरी तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अच्छे नागरिक और जिम्मेदार इंसान बनाने पर भी ध्यान दें। उनके अनुसार प्रत्येक परिवार स्वयं एक गुरुकुल की तरह कार्य कर सकता है, जहां बच्चों को सत्य, सेवा, अनुशासन, करुणा और राष्ट्रप्रेम के संस्कार मिलें।
मंदिरों को सामाजिक सेवा का केंद्र बनाने की वकालत
बाबा रामदेव ने कहा कि भारत में लाखों मंदिर हैं और यदि इन धार्मिक संस्थानों को शिक्षा, गौसंरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सेवा से जोड़ा जाए तो समाज में व्यापक सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि देश के अनेक बड़े मंदिर आर्थिक और सामाजिक रूप से सक्षम हैं। यदि वहां गुरुकुल, गौशाला, आयुर्वेद चिकित्सा, योग केंद्र, गरीब विद्यार्थियों के लिए छात्रावास तथा संस्कार केंद्र संचालित किए जाएं तो लाखों लोगों को इसका लाभ मिल सकता है।
प्रमुख मंदिरों की भूमिका पर दिया जोर
अपने संबोधन में उन्होंने अयोध्या के श्रीराम मंदिर, काशी विश्वनाथ धाम, माता वैष्णो देवी, वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर और मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये संस्थान धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक उत्थान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
भारतीय संस्कृति को विश्व में स्थापित करने की बात
योग गुरु ने कहा कि योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन और सनातन संस्कृति आज पूरी दुनिया में सम्मान प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत को केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नेतृत्व भी करना चाहिए। उनके अनुसार भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा विश्व कल्याण का मार्ग दिखा सकती है।
राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका अहम
उन्होंने विद्यार्थियों और युवाओं से कहा कि वे नशामुक्त जीवन अपनाएं, शारीरिक रूप से स्वस्थ रहें, योग करें, चरित्र निर्माण पर ध्यान दें और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी ही भारत के भविष्य का निर्माण करेगी और यदि उसमें संस्कार, अनुशासन तथा सेवा की भावना होगी तो देश हर क्षेत्र में आगे बढ़ेगा।
सामाजिक समरसता बनाए रखने का आह्वान
बाबा रामदेव ने कहा कि समाज में वैमनस्य के बजाय संवाद, सहयोग और सद्भाव का वातावरण बनना चाहिए। उन्होंने सभी समुदायों से परस्पर सम्मान और सहयोग की भावना के साथ आगे बढ़ने की अपील की। उनके अनुसार भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता और सांस्कृतिक एकता है।
कार्यक्रम के अंत में संत-महात्माओं और उपस्थित श्रद्धालुओं ने भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, नैतिक मूल्यों और राष्ट्र निर्माण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। समारोह में वैदिक मंत्रोच्चार, आध्यात्मिक प्रवचन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भारतीय परंपरा की झलक भी देखने को मिली।
नोट: इस समाचार में हिंदू राष्ट्र, मुसलमानों और अन्य विषयों पर व्यक्त विचार कार्यक्रम के दौरान बाबा रामदेव द्वारा दिए गए वक्तव्य पर आधारित हैं। इन्हें उनके व्यक्तिगत विचारों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। भारत का शासन संविधान के अनुसार संचालित होता है और देश का संवैधानिक ढांचा सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।

