बड़ौत,07 सितम्बर 2026 (यूटीएन)। नगर के श्रीअजितनाथ सभागार में आचार्यश्री आर्जव सागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि, मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात् प्राप्त यह मनुष्य भव आत्मकल्याण का श्रेष्ठ अवसर है। इसे केवल सांसारिक सुख तथा सुविधाओं को प्राप्त करने में ही व्यतीत न करें, बल्कि अपने जीवन को धर्म, संयम, सदाचार और आत्मचिंतन से सार्थक बनाएं।
आचार्य श्री ने कहा कि धर्म केवल मंदिर जाने, पूजा करने अथवा धार्मिक क्रियाएँ करने तक सीमित नहीं है। धर्म का वास्तविक स्वरूप हमारे आचरण में दिखाई देना चाहिए। हमारे विचार, वाणी और व्यवहार यदि किसी जीव को पीड़ा पहुँचाने वाले हैं,तो हमें आत्मचिंतन करना चाहिए। धर्म वह है, जो जीवन में परिवर्तन लाए, बुराइयों से दूर करे और आत्मा को निर्मल बनाने की प्रेरणा दे।
उन्होंने कहा कि, मनुष्य के जीवन में अनेक प्रकार के विकार आते हैं। इन विकारों पर विजय पाने के लिए सबसे पहले पाँच पापों का त्याग करने का संकल्प लेना आवश्यक है। हिंसा, असत्य, चोरी, कुशील और परिग्रह को पाप बताया गया है। साथ ही सप्त व्यसनों का त्याग भी करना चाहिए। इनसे दूर रहकर व्यक्ति अपने जीवन को शांत, संयमित और संस्कारित बना सकता है।
आचार्य श्री ने कहा कि, जो वस्तु हमें स्वेच्छा से प्राप्त नहीं हुई है,उसे लेना चोरी है। व्यक्ति को पराए धन, वस्तु और अधिकार पर अपना अधिकार नहीं समझना चाहिए। ईमानदारी और संतोष से अर्जित जीवन ही वास्तव में सुखद एवं सम्मानपूर्ण होता है।उन्होंने कहा कि इन्द्रियों पर संयम रखना आवश्यक है। मनुष्य को अपने विचारों और व्यवहार में पवित्रता रखनी चाहिए। विषय-वासनाओं में फँसने के बजाय आत्मचिंतन और सदाचार की ओर बढ़ना चाहिए।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि, प्रतिदिन स्वयं से पूछें कि, आज मैंने किस किस जीव को कितना सुख दिया, कितने असत्य से बचा,किसी की वस्तु पर तो अधिकार नहीं किया, अपने आचरण को कितना संयमित रखा और अनावश्यक संग्रह की प्रवृत्ति को कितना कम किया। यही आत्मनिरीक्षण ही धीरे धीरे जीवन को धर्ममय बनाता है।सभा में मुकेश जैन,प्रदीप जैन, वरदान जैन,नवीन जैन,राकेश जैन, अनिल जैन,महेंद्र जैन,वकील चंद जैन,संजीव जैन आदि उपस्थित रहे।
वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।

