खेकड़ा, 13 अक्टूबर 2026 (यूटीएन)। कस्बे में आयोजित रामलीला में शिव धनुष भंग होने के बाद भगवान परशुराम के क्रोध और लक्ष्मण के निर्भीक जवाबों का प्रसंग आकर्षण का केंद्र रहा। परशुराम और लक्ष्मण के बीच हुए तीखे संवादों ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया। कलाकारों के दमदार अभिनय, प्रभावशाली संवाद अदायगी और मंचन ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। रामलीला परिसर में मौजूद दर्शकों ने जय श्रीराम के जयकारे लगाकर कलाकारों का उत्साह बढ़ाया। देर तक चले इस प्रसंग के दौरान दर्शक कथा के प्रत्येक दृश्य से जुड़े रहे और कलाकारों की प्रस्तुति का आनंद लेते रहे।
कस्बे के गांधी प्याऊ पर धार्मिक रामलीला कमेटी के तत्वावधान में रामलीला का आयोजन किया जा रहा है। इसी क्रम में सीता स्वयंवर और शिव धनुष भंग का मंचन किया गया। मंच पर राजा जनक का दरबार सजाया गया, जहां माता सीता के स्वयंवर के लिए देश-विदेश के राजा और वीर उपस्थित हुए। स्वयंवर की शर्त के अनुसार भगवान शिव के विशाल धनुष को उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाने वाले वीर के साथ माता सीता का विवाह होना था। एक-एक कर अनेक राजाओं ने धनुष उठाने का प्रयास किया, लेकिन कोई भी उसे हिला तक नहीं सका। इससे राजा जनक चिंतित हो गए और दरबार में उपस्थित वीरों की सामर्थ्य पर सवाल उठने लगे।
इसी बीच महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा पाकर भगवान राम आगे बढ़े। उन्होंने सहजता और विनम्रता के साथ भगवान शिव के धनुष को उठाया। जैसे ही भगवान राम ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया, धनुष जोरदार आवाज के साथ टूट गया। धनुष भंग होते ही पूरा जनक दरबार आश्चर्य और हर्ष से भर उठा। माता सीता ने भगवान राम के गले में वरमाला डालकर उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार किया। इस दृश्य के मंचन के दौरान दर्शकों ने जय श्रीराम के जयकारे लगाए और पूरा रामलीला परिसर भक्तिमय हो गया।
धनुष भंग की सूचना पर जनक दरबार पहुंचे परशुराम
भगवान शिव के धनुष के टूटने की सूचना जब भगवान परशुराम तक पहुंची तो वे क्रोधित होकर राजा जनक के दरबार में पहुंच गए। भगवान शिव के धनुष को अत्यंत पूजनीय मानने वाले परशुराम ने दरबार में पहुंचकर धनुष भंग करने वाले के बारे में पूछताछ की। उनके क्रोधपूर्ण स्वर और रौद्र रूप ने मंच पर गंभीर वातावरण पैदा कर दिया। परशुराम ने धनुष तोड़ने वाले को सामने आने के लिए कहा और इस घटना पर अपना आक्रोश व्यक्त किया।
दरबार में उपस्थित लोग परशुराम के क्रोध को देखकर सहम गए। वहीं भगवान राम शांत और विनम्र बने रहे। इसी दौरान लक्ष्मण ने परशुराम के क्रोधपूर्ण व्यवहार का निर्भीकता से जवाब देना शुरू किया। लक्ष्मण और परशुराम के बीच शुरू हुआ संवाद धीरे-धीरे तीखा होता चला गया। दोनों कलाकारों ने अपने-अपने पात्रों के स्वभाव के अनुरूप संवाद प्रस्तुत कर दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया।
परशुराम के क्रोध के सामने लक्ष्मण के निर्भीक जवाब
रामलीला के इस प्रसंग में भगवान परशुराम के क्रोध और लक्ष्मण की वीरता, वाकपटुता तथा निर्भीकता का प्रभावशाली चित्रण किया गया। परशुराम बार-बार धनुष भंग करने वाले को लेकर अपना आक्रोश प्रकट करते रहे, जबकि लक्ष्मण ने अपने तर्कपूर्ण और व्यंग्यपूर्ण जवाबों से संवाद को रोचक बना दिया। दोनों के बीच हुए सवाल-जवाब पर दर्शक खूब आनंद लेते नजर आए। कलाकारों की संवाद अदायगी और भाव-भंगिमाओं ने इस पौराणिक प्रसंग को जीवंत कर दिया।
मंच पर कभी परशुराम के क्रोधपूर्ण तेवर दिखाई दिए तो कभी लक्ष्मण के आत्मविश्वास और निर्भीकता ने दर्शकों का ध्यान खींचा। दोनों पात्रों के बीच संवाद के दौरान दर्शक उत्सुकता से अगली प्रस्तुति का इंतजार करते रहे। कलाकारों ने अपने अभिनय से रामायण के इस प्रसिद्ध प्रसंग की गंभीरता, वीरता और नाटकीयता को बखूबी प्रस्तुत किया। इस दौरान रामलीला परिसर जय श्रीराम के जयकारों से गूंजता रहा।
भगवान राम की विनम्रता ने प्रसंग को दिया भावपूर्ण रूप
जहां एक ओर लक्ष्मण परशुराम के क्रोध का जवाब दे रहे थे, वहीं भगवान राम ने पूरे प्रसंग में विनम्रता और धैर्य का परिचय दिया। भगवान राम के शांत व्यवहार ने कथा को संतुलित और भावपूर्ण रूप प्रदान किया। रामलीला के माध्यम से दर्शकों को यह संदेश भी मिला कि कठिन परिस्थितियों में धैर्य, मर्यादा और विवेक का महत्व बना रहता है। रामायण का यह प्रसंग वीरता के साथ-साथ विनम्रता और बड़ों के प्रति सम्मान की भावना को भी दर्शाता है।
अंत में भगवान परशुराम को भगवान राम के वास्तविक स्वरूप और उनकी दिव्यता का बोध हुआ। उनका क्रोध शांत हो गया और उन्होंने भगवान राम तथा माता सीता को आशीर्वाद दिया। इसके बाद भगवान परशुराम वहां से प्रस्थान कर गए। इस प्रकार परशुराम-लक्ष्मण संवाद के समापन के साथ रामलीला का यह प्रसंग संपन्न हुआ। दर्शकों ने कलाकारों की प्रस्तुति की सराहना की और धार्मिक आयोजन के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की।
धार्मिक आयोजनों से जुड़ रहे कस्बे के लोग
कस्बे में रामलीला के आयोजन के चलते प्रतिदिन रामायण के विभिन्न प्रसंगों को मंच के माध्यम से प्रस्तुत किया जा रहा है। इन आयोजनों के जरिए लोगों को भगवान श्रीराम के जीवन, आदर्शों, मर्यादा और धर्म के प्रति समर्पण से जुड़ी कथाओं को जानने का अवसर मिल रहा है। रामलीला न केवल धार्मिक आस्था का माध्यम है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, लोक परंपराओं और सामाजिक मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
रामलीला देखने पहुंचे दर्शकों ने सीता स्वयंवर और परशुराम-लक्ष्मण संवाद का भरपूर आनंद लिया। कलाकारों के अभिनय और संवादों ने पूरे आयोजन को यादगार बना दिया। रामलीला के दौरान दर्शकों की सहभागिता और जय श्रीराम के जयकारों से आयोजन स्थल पर उत्साहपूर्ण माहौल बना रहा।
रामलीला के सफल मंचन में धार्मिक रामलीला कमेटी के प्रधान दीपक शर्मा, नेतराम रूहेला, हरिओम, तरुण गुप्ता, नरेश शर्मा, अरुण धामा, मनोज जैन और पुनीत शर्मा सहित अन्य लोगों का सहयोग रहा। कमेटी के सदस्यों के सहयोग से रामलीला का आयोजन सुचारू रूप से संपन्न हुआ।
वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।

