नई दिल्ली,13 अक्टूबर 2026 (यूटीएन)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत लोकतंत्र की जननी है और बदलती वैश्विक व्यवस्था में शक्ति का संतुलन बेहद जरूरी है। उन्होंने तकनीक, डेटा, ज्ञान और नवाचार को 21वीं सदी की महत्वपूर्ण शक्तियां बताते हुए कहा कि असली सवाल यह नहीं है कि शक्ति किसके पास है, बल्कि यह है कि उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है। तकनीक और ज्ञान का लाभ केवल कुछ लोगों तक सीमित रहने के बजाय समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचना चाहिए, ताकि करोड़ों लोगों के लिए नए अवसर पैदा हो सकें।
प्रधानमंत्री ने ब्लूमबर्ग न्यू इकॉनमी फोरम को संबोधित करते हुए भारत में पहली बार इस आयोजन के होने का स्वागत किया। उन्होंने फोरम के आयोजन के लिए माइकल ब्लूमबर्ग और उनकी पूरी टीम को बधाई दी। मोदी ने कहा कि यह मंच हर साल दुनिया के प्रमुख विचारकों, कारोबारियों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों और नीति निर्माताओं को एक साथ लाता है, जहां अर्थव्यवस्था, तकनीक, ऊर्जा और वैश्विक मामलों पर चर्चा होती है। उन्होंने भारत में इस आयोजन को सही समय पर सही जगह का चयन बताया।
शक्ति का असली मूल्य उसके उद्देश्य में
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हर दौर में शक्ति के स्रोत और उसकी परिभाषा बदलती रही है। समय के साथ दुनिया में प्रभाव और क्षमता के आधार भी बदलते रहे हैं। 21वीं सदी के तीसरे दशक में तकनीक, डेटा, ज्ञान और नवाचार की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि इन शक्तियों का उपयोग मानवता और समाज के व्यापक हित में कैसे किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि तकनीक आज शक्ति है, डेटा शक्ति है, ज्ञान शक्ति है और नवाचार भी शक्ति है। लेकिन केवल संसाधनों या क्षमताओं का होना ही पर्याप्त नहीं है। उनकी सार्थकता इस बात से तय होती है कि उनका उपयोग किस तरह किया जाता है और उनसे समाज को कितना लाभ मिलता है।
प्रधानमंत्री ने सवाल उठाया कि क्या तकनीक का लाभ केवल कुछ लोगों तक सीमित रहेगा या इससे करोड़ों लोगों के लिए नए अवसर पैदा होंगे? क्या ज्ञान कुछ लोगों की ताकत बनकर रह जाएगा या इससे आम लोगों की क्षमता बढ़ेगी? उनके संबोधन का प्रमुख संदेश यही रहा कि आधुनिक दौर में शक्ति का आकलन उसके उद्देश्य और उपयोग के आधार पर भी किया जाना चाहिए।
भारत में पहली बार हो रहा फोरम का आयोजन
पीएम मोदी ने अपने संबोधन में ब्लूमबर्ग न्यू इकॉनमी फोरम के भारत में आयोजन को महत्वपूर्ण अवसर बताया। उन्होंने कहा कि यह मंच हर साल दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े प्रमुख लोगों को एक साथ लाता है। यहां वैश्विक अर्थव्यवस्था, तकनीकी बदलाव, ऊर्जा, उद्योग और अंतरराष्ट्रीय संबंधों जैसे विषयों पर विचार-विमर्श होता है।
प्रधानमंत्री ने माइकल ब्लूमबर्ग और उनकी टीम का स्वागत करते हुए आयोजन के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि दुनिया में नई आर्थिक और तकनीकी शक्तियों के उभरने के दौर में इस तरह की चर्चा महत्वपूर्ण है। विभिन्न देशों, उद्योगों और संस्थानों के प्रतिनिधियों के बीच संवाद से बदलती परिस्थितियों को समझने और भविष्य की संभावनाओं पर विचार करने का अवसर मिलता है।
फोरम की थीम का उल्लेख करते हुए मोदी ने कहा कि आज दुनिया में शक्ति के पारंपरिक स्रोतों के साथ-साथ नए स्रोत भी उभर रहे हैं। डिजिटल तकनीक, डेटा, ज्ञान और नवाचार अर्थव्यवस्था तथा समाज की दिशा को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे समय में यह चर्चा महत्वपूर्ण हो जाती है कि इन बदलावों का लाभ किसे मिलता है और इनसे पैदा होने वाले अवसरों को अधिक व्यापक कैसे बनाया जा सकता है।
भारत में अलग-अलग मुद्दों पर खुलकर होती है बहस
प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की भाषाई, सामाजिक और लोकतांत्रिक विविधता का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में अलग-अलग मुद्दों पर खुलकर बहस होती है। यहां विभिन्न दृष्टिकोण सामने आते हैं और जनता अनेक विषयों पर अपने विचार व्यक्त करती है।
उन्होंने भारत में भाषाओं, समाचार पत्रों, प्रकाशनों और टेलीविजन चैनलों की व्यापक मौजूदगी का जिक्र किया। उनके अनुसार, भारत में 100 से अधिक भाषाएं हैं और मीडिया के अनेक माध्यम लोगों तक सूचनाएं पहुंचाते हैं। सोशल मीडिया के विस्तार ने भी सार्वजनिक विमर्श को नया स्वरूप दिया है।
प्रधानमंत्री ने लोकतंत्र में विविध विचारों और संवाद की भूमिका पर जोर दिया। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में विभिन्न मुद्दों पर चर्चा और विचारों की अभिव्यक्ति को देश की विशेषताओं में शामिल करते हुए उन्होंने कहा कि भारत को लोकतंत्र की जननी के रूप में देखा जाता है।
डिजिटल युग में सार्वजनिक संवाद के स्वरूप में तेजी से बदलाव आया है। समाचार माध्यमों से लेकर सोशल मीडिया तक, लोगों के पास विचार व्यक्त करने और सूचनाएं साझा करने के अनेक साधन हैं। इस परिवेश में सूचना की विश्वसनीयता, जिम्मेदार संवाद और अलग-अलग विचारों को समझने की क्षमता भी महत्वपूर्ण बनी हुई है।
डिजिटल पहचान और भुगतान के क्षेत्र में भारत का मॉडल
प्रधानमंत्री मोदी ने भारत में विकसित डिजिटल समाधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि डिजिटल पहचान और भुगतान जैसी व्यवस्थाओं के क्षेत्र में भारत के अनुभव को देखा जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि जब दुनिया को प्रतिभाशाली और कुशल युवाओं की जरूरत होती है, तो भारतीय युवाओं की क्षमताओं पर भरोसा किया जाता है।
डिजिटल सेवाओं का विस्तार वित्तीय लेनदेन, पहचान सत्यापन और विभिन्न सेवाओं तक पहुंच को आसान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण रहा है। भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से लोगों और संस्थानों के बीच संपर्क के नए रास्ते विकसित हुए हैं। इन व्यवस्थाओं ने तकनीक के उपयोग को लेकर वैश्विक चर्चा में भारत की भूमिका को भी प्रमुखता दी है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की तकनीकी क्षमताएं और कुशल मानव संसाधन वैश्विक अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे हैं। उनके संबोधन में डिजिटल समाधानों और प्रतिभा को देश की बदलती आर्थिक भूमिका से जोड़कर प्रस्तुत किया गया।
हालांकि, डिजिटल व्यवस्था के विस्तार के साथ डेटा सुरक्षा, निजता, डिजिटल साक्षरता और तकनीक तक समान पहुंच जैसे विषयों पर ध्यान देना भी आवश्यक है, ताकि तकनीकी विकास का लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सके।
भारत में 2,000 से अधिक ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर का उल्लेख
पीएम मोदी ने अपने संबोधन में भारत में मौजूद 2,000 से अधिक ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटरों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ये केंद्र दुनिया भर की कंपनियों को विभिन्न सेवाएं प्रदान कर रहे हैं।
ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर यानी जीसीसी ऐसे केंद्र होते हैं, जिनके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय कंपनियां अपने वैश्विक परिचालन से जुड़े कई कार्य एक स्थान से संचालित करती हैं। इनमें तकनीकी सेवाएं, अनुसंधान एवं विकास, वित्तीय प्रक्रियाएं, डेटा विश्लेषण और व्यावसायिक सहयोग जैसी गतिविधियां शामिल हो सकती हैं।
भारत में कुशल पेशेवरों की उपलब्धता, तकनीकी शिक्षा और सेवा क्षेत्र की मौजूदगी ने इस उद्योग को विकसित होने का आधार दिया है। जीसीसी की गतिविधियां भारतीय पेशेवरों को वैश्विक कंपनियों के साथ काम करने के अवसर भी उपलब्ध कराती हैं।
प्रधानमंत्री ने इस उदाहरण के माध्यम से भारत के मानव संसाधन और तकनीकी क्षमताओं का उल्लेख किया। उनके संबोधन में यह विचार प्रमुख रहा कि ज्ञान और कौशल आधुनिक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं तथा उनका प्रभाव राष्ट्रीय सीमाओं से आगे तक पहुंच सकता है।
भारत अपनी उपलब्धियों का श्रेय दुनिया के साथ साझा करता है
प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की ऐतिहासिक उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश अपनी उपलब्धियों का श्रेय लेने के बजाय उन्हें मानवता की साझा विरासत के रूप में देखता है। उन्होंने शून्य का उदाहरण देते हुए कहा कि दुनिया गर्व से स्वीकार करती है कि भारत ने दुनिया को शून्य दिया और इससे पूरी मानवता को लाभ हुआ।
मोदी ने कहा कि भारत ने शून्य के योगदान के लिए कभी रॉयल्टी नहीं मांगी। इस उदाहरण के जरिए उन्होंने ज्ञान और आविष्कारों के व्यापक महत्व को रेखांकित किया।
शून्य और दशमलव पद्धति के विकास ने गणित के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन अवधारणाओं ने गणना, विज्ञान और तकनीकी विकास के लिए आधार तैयार करने में योगदान दिया। गणितीय ज्ञान का प्रसार विभिन्न सभ्यताओं और विद्वानों के माध्यम से हुआ, जिसने आगे चलकर आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास में सहायता की।
प्रधानमंत्री के संबोधन में शून्य का उदाहरण इस बात को समझाने के लिए सामने आया कि ज्ञान का वास्तविक महत्व उसके व्यापक उपयोग और मानवता को मिलने वाले लाभ में निहित है।
तकनीक का लाभ सभी तक पहुंचना जरूरी
प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन में तकनीक और ज्ञान के लोकतंत्रीकरण का विचार भी प्रमुख रहा। डिजिटल युग में नई तकनीकों से उत्पादकता, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, कारोबार और रोजगार के क्षेत्रों में नए अवसर पैदा हो सकते हैं। लेकिन इन अवसरों का लाभ तभी व्यापक होगा, जब लोगों को जरूरी संसाधन, प्रशिक्षण और तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध होंगी।
तकनीकी विकास के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि छोटे कारोबार, ग्रामीण समुदाय, युवा और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग इन बदलावों से किस तरह लाभान्वित हो सकते हैं। डिजिटल सेवाओं तक पहुंच और उनका प्रभावी इस्तेमाल लोगों की आर्थिक तथा सामाजिक भागीदारी को प्रभावित कर सकता है।
इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री का यह सवाल महत्वपूर्ण है कि तकनीक कुछ लोगों की ताकत बनेगी या करोड़ों लोगों की क्षमता बढ़ाएगी। यह प्रश्न आधुनिक अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद एक व्यापक चुनौती को भी रेखांकित करता है—तकनीकी प्रगति के साथ अवसरों का विस्तार कैसे किया जाए।
बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका
दुनिया की अर्थव्यवस्था में डिजिटल तकनीक, डेटा, ऊर्जा, नवाचार और कुशल मानव संसाधन का महत्व बढ़ रहा है। कंपनियां और देश नए आर्थिक अवसरों की तलाश कर रहे हैं, जबकि तकनीकी बदलाव उत्पादन, सेवाओं और रोजगार के स्वरूप को प्रभावित कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में भारत की डिजिटल क्षमताओं, कुशल युवाओं और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटरों का उल्लेख करते हुए वैश्विक अर्थव्यवस्था में देश की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने भारत को ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत किया, जहां तकनीक और प्रतिभा के माध्यम से वैश्विक जरूरतों से जुड़ने की क्षमता है।
इस तरह के मंचों पर होने वाली चर्चाएं विभिन्न देशों के आर्थिक अनुभवों और विकास की प्राथमिकताओं को सामने लाती हैं। साथ ही, ये चर्चाएं इस बात पर विचार करने का अवसर भी देती हैं कि तकनीकी बदलावों के दौर में विकास, अवसरों और सामाजिक लाभ के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।
लोकतंत्र, ज्ञान और नवाचार पर जोर
प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन में तीन प्रमुख विचार उभरकर सामने आए—भारत की लोकतांत्रिक परंपरा, आधुनिक युग में तकनीक और ज्ञान की बढ़ती भूमिका तथा शक्ति के संतुलित उपयोग की आवश्यकता।
उन्होंने कहा कि भारत लोकतंत्र की जननी है और देश में विभिन्न विषयों पर खुलकर बहस होती है। तकनीकी क्षेत्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने डेटा, ज्ञान और नवाचार को नई सदी की महत्वपूर्ण शक्तियां बताया। इसके साथ ही उन्होंने जोर दिया कि इन शक्तियों का महत्व उनके उद्देश्य और उपयोग से तय होता है।
डिजिटल पहचान, भुगतान व्यवस्था, भारतीय प्रतिभा और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटरों के उदाहरणों के माध्यम से प्रधानमंत्री ने भारत की तकनीकी और आर्थिक क्षमताओं का उल्लेख किया। शून्य के उदाहरण से उन्होंने ज्ञान के ऐसे योगदान की बात रखी, जिसका लाभ पूरी मानवता तक पहुंचा।
कुल मिलाकर, ब्लूमबर्ग न्यू इकॉनमी फोरम में प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था और तकनीकी शक्ति के उपयोग पर केंद्रित रहा। उनका मुख्य संदेश था कि 21वीं सदी में केवल शक्ति हासिल करना पर्याप्त नहीं है; यह भी महत्वपूर्ण है कि उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया जाता है और उससे समाज तथा मानवता को कितना लाभ मिलता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।

