बड़ौत,06 सितम्बर 2026 (यूटीएन)। तीर्थंकर बनने का मार्ग प्रशस्त करने वाली पवित्र सोलहकारण पर्व आराधना के अंतर्गत श्री अजितनाथ दिगंबर जैन प्राचीन मंदिर कमेटी के तत्वावधान में आयोजित आठ दिवसीय लोक कल्याण महामंडल विधान का रविवार को श्रद्धा, भक्ति, आध्यात्मिक उल्लास और धार्मिक भावनाओं के बीच भव्य समापन हुआ। आठ दिनों तक चले इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर जिनेंद्र प्रभु की आराधना की और आत्मशुद्धि, संयम, तप, त्याग एवं धर्ममय जीवन जीने का संकल्प लिया।
30 अगस्त से 6 सितंबर तक आयोजित इस महामंडल विधान में प्रतिदिन प्रातः से ही मंदिर परिसर में धार्मिक गतिविधियों का क्रम प्रारंभ हो जाता था। श्रद्धालुओं ने विधि-विधानपूर्वक भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, पूजन और अर्घ्य समर्पण किया। पूरे आयोजन के दौरान मंदिर परिसर जिनवाणी के जयकारों, भक्ति गीतों और धार्मिक मंत्रोच्चार से गुंजायमान रहा।
विधान का आयोजन अध्यात्म योगी आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में संपन्न हुआ। आचार्य श्री के सान्निध्य ने आयोजन को आध्यात्मिक गहराई प्रदान की। उनके मंगल प्रवचनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को जैन धर्म के सिद्धांतों, आत्मकल्याण, संयम और सदाचार के महत्व को समझने का अवसर मिला।
आठ दिनों तक चली आराधना की अविरल धारा
अजितनाथ सभागार में आठ दिनों तक ब्रह्मचारी गौरव भैया एवं ऋषिका दीदी के निर्देशन में धार्मिक अनुष्ठानों की अविरल धारा बहती रही। प्रतिदिन अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, विधान, विभिन्न अर्घ्यों का समर्पण, मंगल प्रवचन और अन्य धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।
श्रद्धालुओं ने पूरे भक्तिभाव के साथ भगवान के समक्ष अर्घ्य समर्पित किए। आयोजन के दौरान मंदिर परिसर में ऐसा आध्यात्मिक वातावरण बना रहा कि श्रद्धालु देर तक धार्मिक क्रियाओं में शामिल होकर आत्मिक शांति का अनुभव करते रहे।
अंकुर जैन को मिला सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य
विधान के समापन दिवस पर सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य अंकुर जैन को प्राप्त हुआ। इस धार्मिक भूमिका को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। धार्मिक परंपराओं के अनुसार विधान में विभिन्न पात्रों और धार्मिक क्रियाओं के माध्यम से भगवान के गुणों का स्मरण एवं आत्मकल्याण की भावना को मजबूत किया गया।
समापन अवसर पर श्रद्धालुओं के चेहरों पर आठ दिवसीय आयोजन पूर्ण होने की प्रसन्नता साफ दिखाई दी। भक्तों ने एक-दूसरे को धार्मिक आयोजन के सफल समापन की शुभकामनाएं दीं।
धर्म केवल मंदिर तक सीमित न रहे
लोक कल्याण महामंडल विधान की विशेषता यह रही कि यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रत्येक दिन की आराधना के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति, विनय, सेवा, तप, संयम, त्याग और आत्मचिंतन का संदेश दिया गया।
विधान के दौरान दर्शन विशुद्धि, अर्हद्भक्ति, आचार्यभक्ति, बहुश्रुतभक्ति, मार्ग प्रभावना और प्रवचन वात्सल्य जैसी भावनाओं के अर्घ्य श्रद्धापूर्वक समर्पित किए गए। इन भावनाओं के माध्यम से श्रद्धालुओं ने भगवान के गुणों का स्मरण करने के साथ यह संकल्प भी लिया कि धर्म केवल मंदिर और धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि व्यक्ति के आचरण और व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए।
श्रद्धालुओं ने माना कि धार्मिक अनुष्ठानों का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाना है। यदि पूजा, आराधना और धार्मिक शिक्षा के बाद व्यक्ति के व्यवहार में विनम्रता, संयम, करुणा, त्याग और सेवा की भावना विकसित होती है, तभी धर्म की साधना सार्थक मानी जा सकती है।
समवसरण जिनवाणी का पवित्र केंद्र
इस अवसर पर आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज ने मंगल प्रवचन में समवसरण की आध्यात्मिक महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समवसरण केवल एक दिव्य सभा का नाम नहीं है, बल्कि वह जिनवाणी का ऐसा पवित्र केंद्र है, जहां से समस्त जीवों को आत्मकल्याण का मार्ग प्राप्त होता है।
उन्होंने कहा कि भगवान की वाणी किसी एक वर्ग, जाति या समुदाय के लिए नहीं होती, बल्कि प्रत्येक जीव को उसके कल्याण का मार्ग दिखाती है। जिनवाणी मनुष्य को बाहरी संसार के साथ-साथ अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देती है। आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझना और कर्मों के बंधन से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ना ही धर्म साधना का मूल उद्देश्य है।
आचार्य श्री ने कहा कि धार्मिक आयोजनों में शामिल होने के साथ-साथ व्यक्ति को अपने जीवन में भी धर्म के सिद्धांतों को उतारना चाहिए। अहिंसा, सत्य, संयम, अपरिग्रह और आत्मचिंतन जैसे सिद्धांत जीवन को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। धर्म का प्रभाव तभी दिखाई देता है, जब वह व्यक्ति के विचारों, वाणी और व्यवहार में दिखाई दे।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे धार्मिक आयोजनों से प्राप्त आध्यात्मिक ऊर्जा को अपने दैनिक जीवन में बनाए रखें और स्वयं के साथ-साथ समाज के कल्याण में भी योगदान दें।
श्रद्धालुओं में रहा विशेष उत्साह
आठ दिवसीय आयोजन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रतिदिन मंदिर पहुंचकर धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। महिला, पुरुष और युवा श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक पूजा-अर्चना में हिस्सा लिया। प्रत्येक दिन मंदिर परिसर में धार्मिक वातावरण बना रहा।
समापन अवसर पर श्रद्धालुओं ने कहा कि ऐसे आयोजन व्यक्ति को कुछ समय के लिए सांसारिक चिंताओं से दूर कर आत्मचिंतन का अवसर प्रदान करते हैं। भगवान की आराधना, जिनवाणी का श्रवण और संतों के प्रवचन से मन को शांति मिलने के साथ जीवन को बेहतर दिशा देने की प्रेरणा भी मिलती है।
आयोजन के दौरान मंदिर कमेटी के सदस्यों और श्रद्धालुओं ने व्यवस्थाओं में सहयोग किया। धार्मिक कार्यक्रमों को सफल बनाने में सभी की सहभागिता रही।
सेवा, संयम और आत्मकल्याण का संदेश
महामंडल विधान के समापन पर वक्ताओं ने कहा कि जैन धर्म में प्रत्येक धार्मिक क्रिया के पीछे आत्मकल्याण की भावना निहित है। पूजा और विधान केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि आत्मा को शुद्ध करने और अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाने की साधना हैं।
आठ दिवसीय विधान ने श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया कि मनुष्य को अपने जीवन में अहंकार, क्रोध, लोभ और मोह जैसे विकारों को कम करते हुए संयम, क्षमा, करुणा और त्याग के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए। यही भावनाएं व्यक्ति के जीवन को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाती हैं।
कार्यक्रम के अंत में श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज ससंघ के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की तथा आयोजन के सफल संचालन के लिए मंदिर कमेटी एवं सभी सहयोगियों का आभार जताया।
इस अवसर पर मुकेश जैन, वरदान जैन, प्रदीप जैन, नवीन जैन, अनिल जैन, सुनील जैन, इंद्राणी जैन, ऊषा जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने भक्तिभाव के साथ विधान के समापन में भाग लिया और धर्ममय जीवन जीने का संकल्प लिया।
समापन के साथ ही आठ दिनों से चल रही धार्मिक आराधना का विधिवत विराम हुआ, लेकिन श्रद्धालुओं के मन में भगवान की भक्ति, जिनवाणी के संदेश और आत्मकल्याण की भावना को जीवन में आगे भी बनाए रखने का संकल्प और मजबूत हुआ।
वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।

