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धन नहीं, धर्म कमाने का समय है चातुर्मास: आचार्य श्री आर्जवसागर

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बड़ौत, 23 अगस्त  2026  (यूटीएन)।  दिगंबर जैनाचार्य श्री आर्जवसागर ने अजितनाथ सभागार में आयोजित मंगल प्रवचन के दौरान चातुर्मास के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि चातुर्मास केवल धार्मिक परंपरा का समय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, तप, संयम और धर्म साधना का अवसर है। उन्होंने धर्मावलंबियों से आह्वान किया कि इन चार महीनों में सांसारिक भागदौड़ के बीच धर्म और आध्यात्मिक ज्ञान के लिए भी पर्याप्त समय निकालें।

आचार्य श्री ने कहा कि चातुर्मास धन कमाने के बजाय धर्म कमाने का समय है। मनुष्य अपना पूरा जीवन भौतिक सुख-सुविधाओं और धन-संपत्ति अर्जित करने में लगा देता है, लेकिन आत्मकल्याण के लिए समय निकालना भूल जाता है। चातुर्मास हमें अपने जीवन की दिशा पर विचार करने और आत्मा की उन्नति के लिए साधना करने का अवसर देता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में किए गए अच्छे कर्मों और तप का फल लंबे समय तक प्राप्त होता है। एक जन्म में किया गया तपश्चरण जन्म-जन्म तक सुख, शांति और आत्मिक संतोष प्रदान करने वाला बन सकता है। इसलिए चातुर्मास के दौरान किया गया संयम, तप, स्वाध्याय और धार्मिक साधना जीवन को सार्थक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

आचार्य श्री आर्जवसागर ने कहा कि साधु-संत चातुर्मास स्वयं के धर्मलाभ और आत्मकल्याण के लिए करते हैं। हालांकि इस दौरान धर्मसभा, प्रवचन, तप, पूजा और अन्य धार्मिक गतिविधियों में शामिल होकर आम श्रद्धालु भी पुण्यार्जन के भागीदार बनते हैं। उन्होंने कहा कि साधु-संतों के सानिध्य में रहने और उनके उपदेशों को जीवन में उतारने से व्यक्ति को आत्मचिंतन का अवसर मिलता है।

उन्होंने धर्मावलंबियों से कहा कि चातुर्मास के दौरान अपनी दिनचर्या में धर्म और ज्ञान के लिए विशेष समय निर्धारित करें। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार प्रतिदिन एक से चार घंटे ज्ञानार्जन, स्वाध्याय और धार्मिक गतिविधियों के लिए निकाल सकता है।

आचार्य श्री ने कहा कि ज्ञान मनुष्य के जीवन को सही दिशा देता है। केवल धार्मिक स्थलों पर जाकर पूजा-अर्चना करना ही धर्म नहीं है, बल्कि धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझना और उसे अपने आचरण में उतारना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य अपने व्यवहार में संयम, अहिंसा, सत्य और सदाचार को स्थान देता है तो उसका जीवन स्वयं दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाता है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से चातुर्मास के दौरान अपनी जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव लाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अनावश्यक भौतिक इच्छाओं के पीछे भागने के बजाय आत्मिक शांति प्राप्त करने के प्रयास करने चाहिए।

आचार्य श्री ने तपस्या के महत्व को समझाते हुए कहा कि एक बार की गई सच्ची तपस्या भी कई जन्मों को धन्य करने वाली हो सकती है। तप केवल शरीर को कष्ट देने का माध्यम नहीं है, बल्कि इच्छाओं और विकारों पर नियंत्रण पाने का मार्ग है। तप, संयम और स्वाध्याय के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर की कमजोरियों को दूर कर सकता है।

उन्होंने कहा कि चातुर्मास का उद्देश्य व्यक्ति को स्वयं से जोड़ना है। इन दिनों में धार्मिक प्रवचन सुनने, शास्त्रों का अध्ययन करने, साधु-संतों के सानिध्य में रहने और आत्मचिंतन करने से जीवन के प्रति दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन आता है।

मंगल प्रवचन के दौरान सभागार में बड़ी संख्या में धर्मावलंबी मौजूद रहे और उन्होंने आचार्य श्री के विचारों को श्रद्धापूर्वक सुना। श्रद्धालुओं ने चातुर्मास के दौरान नियमित रूप से धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होने और ज्ञानार्जन के लिए समय निकालने का संकल्प भी लिया।

सभा में मुकेश जैन, महेंद्र जैन, प्रदीप जैन, वरदान जैन, वकील चंद जैन, अनिल जैन, अंकुर जैन, विकास जैन, अनुज जैन, ऋषभ जैन सहित बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु एवं धर्मावलंबी उपस्थित रहे।

आचार्य श्री के प्रवचन के बाद श्रद्धालुओं ने कहा कि चातुर्मास के दौरान मिले आध्यात्मिक मार्गदर्शन से उन्हें अपने जीवन में धर्म, संयम और आत्मचिंतन को अधिक महत्व देने की प्रेरणा मिली है। कार्यक्रम का वातावरण धार्मिक और आध्यात्मिक भावनाओं से ओतप्रोत रहा।

वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।







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