नई दिल्ली, 18 जनवरी 2026 (यूटीएन)। हेयर ट्रांसप्लांट से जुड़ी गलत प्रक्रियाओं और शिकायतों के बढ़ते मामलों को देखते हुए केंद्र सरकार बड़ा बदलाव करने जा रही है. सरकार अब हेयर ट्रांसप्लांट को “कॉस्मेटिक सैलून” की कैटेगरी से निकालकर “सर्जिकल प्रक्रिया” के रूप में मान्यता देने की तैयारी में है. इससे इस तेजी से बढ़ते उद्योग में लापरवाही पर रोक लगाई जा सकेगी।
*क्यों लिया गया फैसला?*
सैलून में आमतौर पर बाल कटवाना या स्टाइलिंग जैसी साधारण सेवाएं दी जाती हैं, जबकि हेयर ट्रांसप्लांट एक मेडिकल प्रक्रिया है. इसमें सुई, एनेस्थीसिया, साफ-सुथरा ऑपरेशन थिएटर और एक्सपर्ट डॉक्टर की जरूरत होती है. नेशनल काउंसिल फॉर क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स ने हेयर ट्रांसप्लांट सेंटर्स के लिए न्यूनतम मानकों का ड्राफ्ट तैयार किया है। इसके मुताबिक अब केवल योग्य डॉक्टर और खासकर डर्मेटोलॉजिस्ट और प्लास्टिक सर्जन ही हेयर ट्रांसप्लांट कर सकेंगे. बिना मेडिकल डिग्री वाले लोग यह काम नहीं कर पाएंगे.
*क्या किया गया बदलाव?*
यह जानकारी तीन सरकारी अधिकारियों के आधार पर सामने आई है, जिसमें से एक सरकारी अधिकारी ने बताया कि “नए नियमों का मकसद फर्जी और गैरकानूनी क्लीनिकों को बंद करना है, हेयर ट्रांसप्लांट को अक्सर सैलून की सामान्य सेवा की तरह दिखाया जाता है. अब सिर्फ एक्सपर्ट डॉक्टर खासकर डर्मेटोलॉजिस्ट और प्लास्टिक सर्जन ही करेंगे.”
*कोर्ट के फैसले के बाद उठाया कदम*
यह फैसला दिल्ली हाई कोर्ट के मई 2022 के आदेश के बाद लिया जा रहा है. कोर्ट ने कहा था कि हेयर ट्रांसप्लांट एक मेडिकल सर्जरी है और इसे केवल एक्सपर्ट डॉक्टर ही मरीज की सहमति से कर सकते हैं. हालांकि, स्वास्थ्य मंत्रालय इन नियमों को तब तक लागू नहीं करेगा, जब तक हाई कोर्ट में चल रहे एक जुड़े मामले पर फैसला नहीं आ जाता.
*भारत में बड़ा बाजार*
मार्केट रिसर्च एजेंसी आईएमएआरसी ग्रुप के मुताबिक, भारत में हेयर ट्रांसप्लांट का बाजार अभी करीब 252 मिलियन डॉलर का है, जो 2033 तक बढ़कर 1.7 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. कई फील्ड में कई बड़ी कंपनियां काम कर रही हैं. फॉलिक्युलर यूनिट एक्सट्रैक्शन और डायरेक्ट हेयर इम्प्लांटेशन जैसी नई तकनीकों के कारण इस इंडस्ट्री की लगभग 80 प्रतिशत कमाई पुरुषों से होती है.
देश में हर साल करीब 3.5 लाख हेयर ट्रांसप्लांट होते हैं, जिसमें साल 2016 से अब तक कम से कम छह लोगों की मौत गलत इलाज और लापरवाही के कारण हो चुकी है. इनमें एनेस्थीसिया की ज्यादा डोज, एलर्जी शॉक, गंदगी से फैला इंफेक्शन और टिश्यू खराब होने जैसी वजहें सामने आई हैं. एक अन्य अधिकारी ने कहा ने बताया कि “कई सस्ते क्लीनिकों में न तो इमरजेंसी सुविधाएं हैं और न ही प्रशिक्षित स्टाफ. सरकार चाहती है कि ऐसे सेंटरों पर सख्त नियम लागू हों, ताकि मरीजों की जान सुरक्षित रह सके.”
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


