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मुनिश्री आर्जव सागर ने राग-द्वेष त्यागने, आत्मचिंतन व आत्मकल्याण का दिया संदेश

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बड़ौत, 18 अक्टूबर  2026  (यूटीएन)। आध्यात्मिक ज्ञान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानव सेवा का अनूठा संगम उस समय देखने को मिला, जब दिल्ली से भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के उप महानिदेशक एवं वैज्ञानिक डॉ. देवकुमार जैन तथा दुबई से पधारीं पिरियोडॉन्टिस्ट डॉ. पद्मलोचनी जैन ने आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज के दर्शन कर उनके श्रीचरणों में नमन किया। दोनों विशिष्ट अतिथियों ने आचार्य श्री को नमोस्तु निवेदित कर उनसे तत्व चर्चा की और आध्यात्मिक विषयों पर मार्गदर्शन प्राप्त किया। इस अवसर पर आचार्य श्री ने उन्हें अपने स्वरचित स्वाध्याय ग्रंथ भेंट किए। वहीं श्री अजितनाथ दिगंबर मंदिर कमेटी की ओर से अतिथियों का बहुमान एवं अभिनंदन किया गया।

इस अवसर ने यह संदेश दिया कि आधुनिक विज्ञान, चिकित्सा और आध्यात्मिक चिंतन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि मानव जीवन को बेहतर बनाने वाले महत्वपूर्ण आयाम हैं। जहां विज्ञान और चिकित्सा मनुष्य के भौतिक जीवन को स्वस्थ एवं सुविधाजनक बनाने में योगदान देते हैं, वहीं अध्यात्म व्यक्ति को आत्मचिंतन, संयम, नैतिकता और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

इष्टोपदेश के स्वाध्याय से आत्मकल्याण की प्रेरणा

आचार्य श्री के सान्निध्य में प्रतिदिन जैन दर्शन के महत्वपूर्ण आध्यात्मिक ग्रंथ इष्टोपदेश का स्वाध्याय किया जा रहा है। इस ग्रंथ के माध्यम से आत्मस्वरूप को समझने, संसार के मोह-माया से ऊपर उठने और राग-द्वेष जैसी मानसिक प्रवृत्तियों का त्याग करने की प्रेरणा दी जाती है। स्वाध्याय के दौरान आत्मा के वास्तविक स्वरूप, जीवन के उद्देश्य और मोक्षमार्ग की दिशा में आगे बढ़ने के महत्व पर चिंतन किया जाता है।

जैन दर्शन में आत्मज्ञान को विशेष महत्व दिया गया है। इसके अनुसार मनुष्य जब बाहरी आकर्षणों और क्षणिक सुखों से ऊपर उठकर अपने भीतर झांकता है, तभी उसे अपने वास्तविक स्वरूप को समझने का अवसर मिलता है। राग-द्वेष, अहंकार और मोह जैसी प्रवृत्तियां व्यक्ति को अशांत करती हैं, जबकि संयम, समता और आत्मचिंतन उसे मानसिक शांति की ओर ले जाते हैं।

आचार्य श्री के सान्निध्य में चल रहा स्वाध्याय इसी आध्यात्मिक दृष्टिकोण को जीवन में अपनाने की प्रेरणा प्रदान करता है। ग्रंथ के अध्ययन के माध्यम से श्रद्धालु अपने विचारों, व्यवहार और जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास कर रहे हैं।

राग-द्वेष का त्याग ही आत्मिक शांति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

जैन आध्यात्मिक परंपरा में राग और द्वेष को आत्मकल्याण के मार्ग में बाधक माना गया है। किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के प्रति अत्यधिक आसक्ति तथा किसी के प्रति घृणा अथवा वैमनस्य मन को अशांत बनाते हैं। ऐसे में आत्मचिंतन और समभाव का अभ्यास व्यक्ति को अपने विचारों एवं भावनाओं को समझने में सहायता करता है।

आध्यात्मिक चिंतन का मूल संदेश यही है कि मनुष्य को परिस्थितियों के प्रभाव में आकर अपने विवेक और संयम को नहीं खोना चाहिए। जीवन में सुख-दुख, लाभ-हानि और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियां आती रहती हैं, लेकिन इन सबके बीच मन की स्थिरता बनाए रखना ही साधना का महत्वपूर्ण पक्ष है।

आत्मकल्याण के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अपने भीतर झांककर अपनी कमियों को पहचाने, गलत प्रवृत्तियों से दूर रहे और अपने आचरण में सद्भाव, करुणा एवं अहिंसा को स्थान दे। जैन धर्म की ये शिक्षाएं व्यक्ति को न केवल आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करती हैं, बल्कि सामाजिक जीवन में भी प्रेम, सहिष्णुता और सौहार्द को बढ़ावा देती हैं।

वैज्ञानिक और चिकित्सक ने प्राप्त किया संत सान्निध्य

दिल्ली से पहुंचे डॉ. देवकुमार जैन कृषि विज्ञान के क्षेत्र में कार्यरत हैं और भारत सरकार के कृषि मंत्रालय में उप महानिदेशक एवं वैज्ञानिक के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। वहीं दुबई से पहुंचीं डॉ. पद्मलोचनी जैन पिरियोडॉन्टिस्ट हैं, जो दंत चिकित्सा की एक महत्वपूर्ण विशेषज्ञता से जुड़ी हैं।

दोनों विशिष्ट व्यक्तित्वों का आचार्य श्री के दर्शनार्थ पहुंचना इस बात को रेखांकित करता है कि व्यावसायिक उपलब्धियों और लौकिक ज्ञान के साथ आत्मिक विकास का महत्व भी बना रहता है। जीवन में ज्ञान की सार्थकता तभी और बढ़ जाती है, जब उसके साथ विनम्रता, नैतिकता, आत्मानुशासन और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता भी जुड़ी हो।

कृषि विज्ञान और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए भी आत्मचिंतन तथा मानवीय मूल्यों का विशेष महत्व है। विज्ञान जहां तर्क, शोध और अनुभव के आधार पर विकास के नए रास्ते खोलता है, वहीं आध्यात्मिक चिंतन व्यक्ति को अपने कर्तव्यों, विचारों और व्यवहार के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देता है।

स्वरचित स्वाध्याय ग्रंथ भेंट कर किया अभिनंदन

इस अवसर पर आचार्य श्री ने अपने स्वरचित स्वाध्याय ग्रंथ अतिथियों को भेंट किए। श्री अजितनाथ दिगंबर मंदिर कमेटी की ओर से भी उनका बहुमान एवं अभिनंदन किया गया। धार्मिक वातावरण में हुए इस आयोजन ने ज्ञान, विनम्रता और आध्यात्मिक साधना के महत्व को सामने रखा।

जैन परंपरा में संतों का सान्निध्य प्राप्त करना, उनके प्रवचनों को सुनना और धार्मिक ग्रंथों का स्वाध्याय करना आत्मिक उन्नति का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। ऐसे अवसर व्यक्ति को अपने जीवन के उद्देश्यों पर विचार करने तथा अपने व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाने की प्रेरणा देते हैं।

आचार्य श्री के सान्निध्य में चल रहा इष्टोपदेश का स्वाध्याय भी श्रद्धालुओं को आत्मा के स्वरूप को समझने, मोह-ममता के प्रभाव को पहचानने और संयमपूर्ण जीवन अपनाने की दिशा में प्रेरित कर रहा है।

इस अवसर पर मुकेश जैन, प्रदीप जैन, वरदान जैन, एडवोकेट विनोद जैन, नवीन जैन, अनुज जैन, सुरेश जैन, अनिल जैन, जितेंद्र जैन, विकास जैन, अनुज जैन, संजय जैन, संजीव जैन सहित अन्य श्रद्धालु एवं गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि जीवन में बाहरी उपलब्धियों के साथ आंतरिक शांति और आत्मिक उन्नति भी आवश्यक है। राग-द्वेष का त्याग, आत्मचिंतन, संयम और सदाचार को अपनाकर व्यक्ति अपने जीवन को अधिक शांतिपूर्ण, सार्थक और कल्याणकारी बना सकता है।

वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।







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