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मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने पकड़ी रफ्तार, 95% कंपनियों को उत्पादन बढ़ने की उम्मीद

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नई दिल्ली,06 अक्टूबर  2026  (यूटीएन)। पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक स्तर पर बनी अनिश्चितताओं के बीच भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने एक बार फिर मजबूती के संकेत दिए हैं। उत्पादन, नए ऑर्डर, क्षमता उपयोग, रोजगार और निर्यात—लगभग सभी प्रमुख मोर्चों पर उद्योग जगत का भरोसा पिछली तिमाही की तुलना में बढ़ा है। फिक्की के 71वें विनिर्माण पर तिमाही सर्वेक्षण में सामने आए आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि देश का विनिर्माण क्षेत्र बाहरी झटकों से उबरते हुए धीरे-धीरे अपनी रफ्तार हासिल कर रहा है।

सर्वेक्षण में शामिल करीब 95 प्रतिशत निर्माताओं ने उम्मीद जताई है कि दूसरी तिमाही में उनका उत्पादन पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले या तो बढ़ेगा या फिर कम से कम समान स्तर पर रहेगा। पहली तिमाही में ऐसी उम्मीद रखने वाली कंपनियों का अनुपात 77 प्रतिशत था। यानी एक ही तिमाही में उद्योग जगत के भरोसे में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है।

मांग के मोर्चे पर भी कंपनियों का रुख पहले से अधिक सकारात्मक हुआ है। करीब 90 प्रतिशत कंपनियों ने अपने ऑर्डर में बढ़ोतरी या स्थिरता की उम्मीद जताई है। पिछली तिमाही में ऐसा मानने वाली कंपनियों का अनुपात 77 प्रतिशत था। इससे संकेत मिलता है कि घरेलू बाजार में मांग की स्थिति बेहतर हो रही है और कंपनियों को आने वाले महीनों में उत्पादन बनाए रखने या बढ़ाने के लिए पर्याप्त ऑर्डर मिलने की उम्मीद है।

95 फीसदी कंपनियों को उत्पादन में सुधार की उम्मीद

फिक्की के सर्वेक्षण में ऑटोमोबाइल, कैपिटल गुड्स, केमिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, ग्लास, मशीन टूल्स, मेटल, टेक्सटाइल सहित विभिन्न विनिर्माण क्षेत्रों की बड़ी कंपनियों और छोटे एवं मध्यम उद्यमों को शामिल किया गया। सर्वेक्षण में शामिल इकाइयों का संयुक्त वार्षिक कारोबार 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक है।

उद्योग जगत की ओर से उत्पादन को लेकर बढ़ा भरोसा इस बात का महत्वपूर्ण संकेत है कि कंपनियां मौजूदा परिस्थितियों में कारोबार विस्तार की संभावनाएं देख रही हैं। उत्पादन से जुड़ी गतिविधियों में तेजी आने का सीधा असर आपूर्ति श्रृंखला, परिवहन, कच्चे माल की मांग और रोजगार जैसे दूसरे क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है।

फैक्ट्रियों में क्षमता उपयोग 75 फीसदी तक पहुंचा

विनिर्माण क्षेत्र में सुधार का एक महत्वपूर्ण संकेत फैक्ट्रियों की क्षमता उपयोगिता में बढ़ोतरी के रूप में सामने आया है। सर्वेक्षण के अनुसार, विनिर्माण इकाइयों की औसत क्षमता उपयोगिता पिछली तिमाही के 72 प्रतिशत से बढ़कर करीब 75 प्रतिशत हो गई है।

क्षमता उपयोग में बढ़ोतरी का मतलब है कि कंपनियां अपनी मौजूदा उत्पादन क्षमता का पहले की तुलना में अधिक इस्तेमाल कर रही हैं। मांग और ऑर्डर में सुधार होने पर उत्पादन इकाइयों के लिए उपलब्ध संयंत्रों और मशीनरी का बेहतर उपयोग संभव होता है।

क्षेत्रवार देखें तो ग्लास उद्योग 88 प्रतिशत क्षमता उपयोग के साथ सबसे आगे रहा। इसके बाद मेटल एवं मेटल उत्पादों में 78 प्रतिशत, कैपिटल गुड्स में 76 प्रतिशत, टेक्सटाइल में 75 प्रतिशत और ऑटोमोबाइल एवं ऑटो कंपोनेंट्स में 73 प्रतिशत क्षमता उपयोग दर्ज किया गया।

यह आंकड़ा बताता है कि उत्पादन गतिविधियों में आई तेजी अब केवल कंपनियों की उम्मीदों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका असर फैक्ट्री स्तर पर भी दिखाई देने लगा है।

ऑर्डर बढ़ने से उत्पादन को मिलेगा सहारा

मांग और ऑर्डर में सुधार मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए सबसे सकारात्मक संकेतों में से एक है। करीब 90 प्रतिशत कंपनियों द्वारा ऑर्डर में बढ़ोतरी या स्थिरता की उम्मीद जताना बताता है कि उद्योग को बाजार से पर्याप्त समर्थन मिलने की संभावना है।

उद्योग विशेषज्ञों के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऑर्डर बुक मजबूत होने पर कंपनियां उत्पादन बढ़ाने, क्षमता का बेहतर उपयोग करने और नए कर्मचारियों की भर्ती जैसे फैसले लेने के लिए अधिक तैयार रहती हैं। यदि यह रुझान आने वाली तिमाहियों में भी बना रहता है तो निजी क्षेत्र के निवेश और रोजगार पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

रोजगार के मोर्चे पर भी बढ़ा भरोसा

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की बेहतर स्थिति का असर रोजगार की संभावनाओं पर भी दिखाई दे रहा है। सर्वेक्षण में 43 प्रतिशत कंपनियों ने अगले तीन महीनों में अतिरिक्त कर्मचारियों की भर्ती करने की योजना जताई है। पिछली तिमाही में यह आंकड़ा केवल 35 प्रतिशत था।

इससे संकेत मिलता है कि कंपनियां आने वाले समय में उत्पादन और कारोबारी गतिविधियों में विस्तार की संभावना को देखते हुए अपने कार्यबल को बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं।

हालांकि, कुशल श्रमिकों की उपलब्धता अभी भी उद्योग के सामने चुनौती बनी हुई है। करीब 67 प्रतिशत कंपनियों ने फैक्ट्री स्तर पर श्रमिकों की उपलब्धता को लेकर कोई बड़ी समस्या नहीं बताई, लेकिन 33 प्रतिशत कंपनियों ने कुशल श्रमिकों की कमी को चुनौती माना है।

इससे साफ है कि रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ-साथ उद्योग को प्रशिक्षित और तकनीकी रूप से दक्ष श्रमिकों की जरूरत भी बढ़ रही है। आने वाले समय में कौशल विकास और व्यावसायिक प्रशिक्षण की भूमिका इसलिए और महत्वपूर्ण हो सकती है।

निर्यात बाजार में भी सुधार के संकेत

विनिर्माण क्षेत्र के लिए निर्यात भी महत्वपूर्ण सकारात्मक संकेत लेकर आया है। दूसरी तिमाही में करीब 80 प्रतिशत कंपनियों ने अपने निर्यात को पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में अधिक या समान बताया है। पहली तिमाही में यह आंकड़ा 74 प्रतिशत था।

निर्यात में सुधार से संकेत मिलता है कि भारतीय विनिर्माण कंपनियां वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिशों में आगे बढ़ रही हैं। निर्यात बाजारों में विविधता लाने के प्रयासों का भी असर दिखाई देने लगा है।

हालांकि वैश्विक व्यापार में जारी अनिश्चितता, टैरिफ और विभिन्न देशों की व्यापार नीतियां आगे भी निर्यातकों के लिए चुनौती बनी रह सकती हैं। ऐसे में नए बाजारों की तलाश और अलग-अलग देशों में निर्यात का विस्तार भारतीय कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण रणनीति होगी।

ऑटोमोबाइल सेक्टर सबसे मजबूत

क्षेत्रवार प्रदर्शन की बात करें तो ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट्स सेक्टर में वृद्धि की उम्मीद सबसे मजबूत दिखाई देती है। वाहन उद्योग से जुड़ी कंपनियों में उत्पादन और मांग को लेकर सकारात्मक धारणा बनी हुई है।

इसके अलावा मशीन टूल्स तथा मेटल एवं मेटल उत्पादों के लिए भी वृद्धि का अनुमान मजबूत से मध्यम रहने की उम्मीद है। कैपिटल गुड्स, ग्लास, केमिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स-इलेक्ट्रिकल्स और टेक्सटाइल क्षेत्र में भी मध्यम वृद्धि की संभावना जताई गई है।

इन क्षेत्रों का प्रदर्शन व्यापक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मैन्युफैक्चरिंग के साथ इनका जुड़ाव कई अन्य उद्योगों और सेवाओं से होता है।

लागत का बढ़ता दबाव चिंता का विषय

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के सकारात्मक प्रदर्शन के बीच लागत का दबाव उद्योग के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। सर्वेक्षण में 83 प्रतिशत कंपनियों ने उत्पादन लागत में बढ़ोतरी की बात कही है। पिछली तिमाही में यह आंकड़ा 79 प्रतिशत था।

यानी उत्पादन और मांग में सुधार के बावजूद कंपनियों के लिए लागत का दबाव कम होने के बजाय बढ़ा है। कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, ऊर्जा लागत, लॉजिस्टिक्स, यूटिलिटी खर्च और रुपये की कमजोरी को लागत बढ़ने की प्रमुख वजहों में गिना गया है।

उद्योग के लिए यह चुनौती इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लागत बढ़ने पर कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है। यदि कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ पूरी तरह ग्राहकों पर डालती हैं तो उत्पादों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे मांग प्रभावित होने का जोखिम भी रहता है।

निवेश को लेकर कंपनियां सतर्क

अगले छह महीनों में निवेश को लेकर उद्योग जगत का रुख फिलहाल स्थिर दिखाई दे रहा है। कंपनियां निवेश की संभावनाओं को पूरी तरह खारिज नहीं कर रही हैं, लेकिन वैश्विक और घरेलू स्तर पर मौजूद अनिश्चितताओं के कारण बड़े निवेश संबंधी फैसलों में सावधानी बरती जा रही है।

कंपनियों के सामने भू-राजनीतिक तनाव, टैरिफ और व्यापार प्रतिबंध, मांग में अनिश्चितता, कुशल श्रम की उपलब्धता, कच्चे माल की कमी, लॉजिस्टिक्स लागत और नियामकीय चुनौतियां प्रमुख बाधाओं के रूप में सामने आई हैं।

पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक व्यापार व्यवस्था में लगातार हो रहे बदलावों का असर कच्चे माल की कीमतों, परिवहन लागत और निर्यात बाजारों पर पड़ सकता है। इसलिए कंपनियां उत्पादन बढ़ाने के साथ जोखिम प्रबंधन पर भी अधिक ध्यान दे रही हैं।

बैंकिंग क्षेत्र से फंडिंग को लेकर राहत

मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए एक सकारात्मक पहलू बैंकों से मिलने वाली वित्तीय सहायता है। सर्वेक्षण में 90 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि उन्हें वर्किंग कैपिटल और दीर्घकालिक पूंजी के लिए बैंकों से पर्याप्त फंडिंग उपलब्ध है।

हालांकि ब्याज दर में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कंपनियों के लिए औसत ब्याज दर पिछली तिमाही के 8.9 प्रतिशत से बढ़कर 9.1 प्रतिशत हो गई है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी से कंपनियों की वित्तीय लागत पर दबाव पड़ सकता है, खासकर उन इकाइयों पर जो विस्तार के लिए बैंक ऋण पर अधिक निर्भर हैं।

घरेलू मांग बनी उम्मीद का आधार

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की मौजूदा स्थिति में घरेलू मांग की भूमिका महत्वपूर्ण दिखाई दे रही है। ऑर्डर में सुधार और क्षमता उपयोग में बढ़ोतरी से संकेत मिलता है कि बाजार में उत्पादन से जुड़े क्षेत्रों को बेहतर समर्थन मिल रहा है।

यदि घरेलू मांग के साथ निर्यात बाजारों में भी सुधार बना रहता है तो कंपनियों के लिए उत्पादन क्षमता बढ़ाने और नए निवेश की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं। इससे पूंजीगत वस्तुओं, मशीनरी, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और रोजगार जैसे क्षेत्रों को भी लाभ मिलने की उम्मीद है।

छोटी और मध्यम इकाइयों के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत

सर्वेक्षण में बड़ी कंपनियों के साथ एसएमई को शामिल किया जाना भी महत्वपूर्ण है। छोटे और मध्यम उद्यम देश की विनिर्माण आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बड़े उद्योगों के ऑर्डर और उत्पादन में वृद्धि का असर इन इकाइयों तक भी पहुंचता है।

यदि ऑर्डर बुक मजबूत होती है तो एसएमई के लिए उत्पादन बढ़ाने और रोजगार के अवसर पैदा करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। हालांकि इनके लिए कच्चे माल की कीमत, वित्तपोषण लागत, कुशल श्रमिक और बाजार में प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियां बनी रह सकती हैं।

आगे की राह में अवसर भी, चुनौतियां भी

फिक्की के सर्वेक्षण की तस्वीर को देखें तो भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर फिलहाल सुधार के दौर में दिखाई दे रहा है। उत्पादन को लेकर भरोसा बढ़ा है, ऑर्डर की स्थिति बेहतर हुई है, फैक्ट्रियों में क्षमता उपयोग बढ़ा है, निर्यात में सुधार के संकेत मिले हैं और कंपनियां नई भर्तियों की तैयारी कर रही हैं।

दूसरी ओर, उत्पादन लागत में बढ़ोतरी, कुशल श्रमिकों की कमी, वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और टैरिफ जैसे मुद्दे उद्योग के लिए जोखिम बने हुए हैं।

कुल मिलाकर फिक्की का 71वां विनिर्माण सर्वेक्षण भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए उम्मीद की मजबूत तस्वीर पेश करता है। उत्पादन और मांग में सुधार के साथ उद्योग जगत का भरोसा बढ़ा है। यदि लागत संबंधी दबाव और वैश्विक अनिश्चितताओं को नियंत्रित किया जा सका तथा निवेश का माहौल मजबूत बना रहा, तो आने वाले महीनों में भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर आर्थिक विकास और रोजगार सृजन का एक प्रमुख इंजन बन सकता है।

विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।







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