नई दिल्ली, 07 अक्टूबर 2026 (यूटीएन)। लालकिला मैदान में जब रामलीला का पर्दा उठता है तो सामने केवल रामायण की कथा का मंचन नहीं होता। मंच पर राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान, रावण और अन्य पात्र जीवंत होते हैं, लेकिन उनके साथ एक ऐसी सांस्कृतिक यात्रा भी शुरू होती है, जो मंच की सीमाओं से निकलकर समाज के बीच तक पहुंचती है। हजारों दर्शकों से भरे मैदान में एक तरफ परिवारों की कई पीढ़ियां एक साथ बैठकर रामकथा देखती हैं तो दूसरी ओर आधुनिक तकनीक, डिजिटल इफेक्ट्स, एनीमेशन और 3डी मैपिंग के माध्यम से पारंपरिक कथा को नई पीढ़ी के सामने नए अंदाज में प्रस्तुत किया जाता है।
लवकुश रामलीला की यही विशेषता उसे केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहने देती। यहां रामलीला के मंचन के साथ सामाजिक चेतना, पर्यावरण संरक्षण, युवा सहभागिता, सेवा, संस्कार और सामूहिक जिम्मेदारी जैसे विषयों को भी जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है।
रामलीला की मूल कथा सदियों पुरानी है, लेकिन उसे प्रस्तुत करने के तरीके लगातार बदल रहे हैं। यही बदलाव लवकुश रामलीला के स्वरूप में भी दिखाई देता है। मंच पर तीर-कमान, पुष्पवर्षा और पारंपरिक संवादों के साथ डिजिटल प्रकाश व्यवस्था, विशेष प्रभाव और आधुनिक दृश्य तकनीक दर्शकों के अनुभव को नया आयाम देते हैं।
लेकिन तकनीक का यह प्रयोग केवल भव्यता के लिए नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा सवाल है—आज की डिजिटल पीढ़ी को रामकथा से कैसे जोड़ा जाए?
लवकुश रामलीला के सामाजिक सरोकार इसी सवाल का अपना एक जवाब प्रस्तुत करते हैं।
रामलीला अब सिर्फ मंचन नहीं, सामाजिक संवाद भी
रामलीला भारतीय समाज की उन परंपराओं में शामिल है, जिसने धार्मिक कथा को लोकजीवन से जोड़ने का काम किया है। रामकथा केवल भगवान श्रीराम के जीवन की घटनाओं का वर्णन नहीं करती, बल्कि मर्यादा, कर्तव्य, त्याग, सत्य, न्याय, भाईचारे और जिम्मेदारी जैसे मूल्यों को सामने रखती है।
इसीलिए रामलीला का सामाजिक महत्व उसके मंचन से कहीं आगे जाता है।
जब कोई बच्चा रामलीला में राम का वनवास देखता है, तो उसके सामने त्याग की कथा आती है। जब वह भरत को राजगद्दी स्वीकार करने के बजाय भाई के प्रति निष्ठा निभाते देखता है, तो उसके सामने संबंधों और जिम्मेदारी का उदाहरण आता है। हनुमान का चरित्र सेवा और समर्पण का संदेश देता है और रावण का अंत अहंकार तथा अधर्म के परिणाम की याद दिलाता है।
इस तरह रामलीला एक ऐसी कथा बन जाती है, जिसमें धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक जीवन के अनेक प्रश्नों पर विचार करने की गुंजाइश रहती है।
लवकुश रामलीला कमेटी की कोशिश इसी सामाजिक संदेश को आयोजन के बाहर तक ले जाने की दिखाई देती है।
‘घर-घर राम, घर-घर तुलसी’ से पर्यावरण तक
लवकुश रामलीला से जुड़े सामाजिक अभियानों में ‘घर-घर राम, घर-घर तुलसी’ पहल को विशेष रूप से देखा जा सकता है। इस पहल के तहत 5100 जेन-जेड युवाओं तक तुलसी के पौधे पहुंचाने का प्रयास किया गया।
यह पहल धार्मिक आस्था और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच एक सेतु बनाने की कोशिश के रूप में देखी जा सकती है।
तुलसी भारतीय परिवारों और धार्मिक परंपराओं में विशेष महत्व रखती है। लेकिन जब किसी पौधे को घर तक पहुंचाने के साथ उसकी देखभाल की जिम्मेदारी भी जुड़ती है, तो उसका अर्थ केवल धार्मिक प्रतीक तक सीमित नहीं रहता।
एक युवा रामलीला देखने के बाद तुलसी का पौधा घर ले जाता है। वह उसे मिट्टी में लगाता है, पानी देता है और उसकी देखभाल करता है। इस पूरी प्रक्रिया में एक सांस्कृतिक प्रतीक धीरे-धीरे पर्यावरणीय जिम्मेदारी में बदल सकता है।
यही किसी सामाजिक अभियान की वास्तविक शक्ति है।
मंच पर दिया गया संदेश जब घर के आंगन में एक पौधे के रूप में दिखाई देने लगे, तो संस्कृति और व्यवहार के बीच की दूरी कम होने लगती है।
5100 युवाओं को जोड़ने की पहल क्यों महत्वपूर्ण?
नई पीढ़ी को किसी भी परंपरा से जोड़ना आज बड़ी चुनौती है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, मोबाइल स्क्रीन और डिजिटल मनोरंजन के दौर में युवाओं के पास विकल्पों की कमी नहीं है।
ऐसे समय में किसी पारंपरिक आयोजन के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि युवा दर्शक वहां क्यों आए?
सिर्फ परंपरा के नाम पर युवा पीढ़ी को लंबे समय तक जोड़े रखना संभव नहीं है। उसे संवाद, भागीदारी और अनुभव की जरूरत है।
यही वजह है कि 5100 जेन-जेड युवाओं तक तुलसी पहुंचाने जैसी पहल केवल पौधा वितरण का कार्यक्रम नहीं रह जाती। यह युवाओं को रामलीला और उससे जुड़े सामाजिक संदेश का सक्रिय भागीदार बनाने की कोशिश भी बन जाती है।
यहां युवा केवल दर्शक नहीं रहता। वह एक सामाजिक गतिविधि का हिस्सा बन सकता है।
युवा दर्शक से युवा भागीदार तक
रामलीला के सामने आज एक महत्वपूर्ण चुनौती यह भी है कि युवा पीढ़ी उसे केवल पुराने समय की परंपरा न समझे।
लवकुश रामलीला में डिजिटल इफेक्ट्स, एनीमेशन और 3डी मैपिंग जैसे तकनीकी प्रयोग इसी चुनौती का जवाब देने की कोशिश के रूप में सामने आते हैं।
आधुनिक तकनीक कहानी को बदलती नहीं, बल्कि उसे प्रस्तुत करने का तरीका बदलती है।
राम वही हैं, कथा वही है, संवादों का मूल भाव वही है, लेकिन दृश्य प्रस्तुति बदल गई है।
एक ऐसा युवा जो डिजिटल गेमिंग, फिल्मों, एनीमेशन और सोशल मीडिया के दृश्य संसार का अभ्यस्त है, उसके सामने यदि रामायण के प्रसंग आधुनिक दृश्य तकनीक के साथ प्रस्तुत किए जाते हैं, तो वह कथा को अलग तरीके से ग्रहण कर सकता है।
इसका उद्देश्य परंपरा को बदलना नहीं, बल्कि उसके साथ नई पीढ़ी का संवाद आसान करना है।
3डी मैपिंग और डिजिटल इफेक्ट्स का नया दौर
रामलीला के पारंपरिक मंचन में संवाद, अभिनय, पोशाक और संगीत का विशेष महत्व रहा है। आधुनिक समय में इसमें प्रकाश व्यवस्था, डिजिटल स्क्रीन, एनीमेशन, ध्वनि प्रभाव और 3डी मैपिंग जैसे तत्व जुड़ गए हैं।
इन तकनीकों से युद्ध के दृश्य, लंका का वैभव, पुष्पवर्षा, प्राकृतिक दृश्य और अन्य प्रसंग अधिक प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
लेकिन तकनीक की असली सफलता तब मानी जाएगी जब वह कथा को दबाने के बजाय कथा को समझने में मदद करे।
रामलीला की भव्यता दर्शक को आकर्षित कर सकती है, लेकिन दर्शक को कथा से जोड़ने का काम अंततः उसके भाव और संदेश को करना होता है।
यही कारण है कि आधुनिक तकनीक और पारंपरिक कथा का संतुलन महत्वपूर्ण हो जाता है।
राम के आदर्श और आज का समाज
भगवान श्रीराम का चरित्र भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में मर्यादा, कर्तव्य और अनुशासन से जोड़ा जाता है।
आज के समय में इन मूल्यों की व्याख्या नए संदर्भों में की जा सकती है।
राम का वनवास कर्तव्य और त्याग की बात करता है।
भरत का चरित्र सत्ता से ऊपर रिश्ते और जिम्मेदारी का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
हनुमान का चरित्र सेवा, समर्पण और निष्ठा का संदेश देता है।
रावण का अंत अहंकार और अधर्म के परिणाम की ओर संकेत करता है।
इन प्रसंगों को आज परिवार, सामाजिक जिम्मेदारी, पर्यावरण, युवा मूल्यों और सार्वजनिक जीवन की नैतिकता जैसे विषयों से जोड़कर देखा जा सकता है।
यही कारण है कि रामकथा का सामाजिक संदर्भ समय के साथ बदलता जरूर है, लेकिन उसकी प्रासंगिकता समाप्त नहीं होती।
एक मैदान, कई पीढ़ियां और एक साझा अनुभव
लालकिला मैदान की रामलीला का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसकी सामूहिकता है।
एक ही मैदान में दादा-दादी, माता-पिता और बच्चे एक साथ बैठकर रामकथा देखते हैं। बुजुर्गों के लिए यह पुरानी स्मृतियों को फिर से जीने का अवसर हो सकता है, जबकि बच्चों के लिए यह रामायण के पात्रों से पहली प्रत्यक्ष मुलाकात बन सकती है।
युवा वर्ग इसे भव्य मंचन और तकनीकी प्रस्तुति के रूप में देख सकता है।
लेकिन इन सभी अनुभवों को जोड़ने वाली चीज एक ही है—साझी सांस्कृतिक स्मृति।
सामान्य दिनों में अलग-अलग जीवन जीने वाले लोग कुछ घंटों के लिए एक ही कथा, एक ही मंच और एक ही सांस्कृतिक अनुभव से जुड़ते हैं।
इस दृष्टि से रामलीला सामाजिक मेल-जोल का भी माध्यम बनती है।
मंच के बाहर भी जारी रहती है रामलीला
रामलीला का मंच कुछ दिनों के लिए सजता है, लेकिन उससे जुड़े सामाजिक संदेश की यात्रा उससे कहीं लंबी हो सकती है।
यदि कोई बच्चा रामलीला देखकर अपने माता-पिता से रामायण की कथा के बारे में सवाल करता है, तो कथा मंच से उसके घर पहुंच गई।
यदि कोई युवा तुलसी का पौधा घर ले जाकर उसकी देखभाल करता है, तो पर्यावरण का संदेश मैदान से घर तक पहुंच गया।
यदि परिवार की तीन पीढ़ियां एक साथ बैठकर रामलीला देखती हैं, तो सांस्कृतिक संवाद एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच गया।
यही छोटे-छोटे प्रभाव किसी बड़े सामाजिक अभियान की नींव बन सकते हैं।
सेवा का विस्तार: दिव्यांग सहायता और स्वास्थ्य शिविर
लवकुश रामलीला से जुड़े सामाजिक सरोकारों का दायरा केवल संस्कृति और पर्यावरण तक सीमित नहीं है। दिव्यांग सहायता एवं स्वास्थ्य शिविर जैसे कार्यक्रम इसके सेवा पक्ष को भी सामने लाते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के अवसर पर आयोजित ऐसे शिविरों के माध्यम से स्वास्थ्य जांच, चिकित्सकीय परामर्श और दिव्यांगजनों के लिए आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया।
सांस्कृतिक आयोजन के बीच स्वास्थ्य और सहायता से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन इस बात को रेखांकित करता है कि सामाजिक सेवा किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है।
रामलीला के मंच पर लोककल्याण और सेवा की बात कही जाती है तो मैदान में स्वास्थ्य जांच और जरूरतमंदों की सहायता जैसी गतिविधियां उस विचार को व्यवहार से जोड़ने का प्रयास करती हैं।
धार्मिक आयोजन से जनसेवा तक
किसी भी बड़े सांस्कृतिक आयोजन का प्रभाव केवल मंच पर होने वाले कार्यक्रमों से नहीं मापा जा सकता।
यदि आयोजन के माध्यम से स्वास्थ्य, पर्यावरण, शिक्षा, युवा भागीदारी या जरूरतमंदों की सहायता जैसे विषयों पर समाज को जोड़ने का प्रयास हो, तो उसकी भूमिका व्यापक हो जाती है।
यही बदलाव लवकुश रामलीला के सामाजिक स्वरूप को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार बनता है।
रामलीला देखने आने वाला व्यक्ति केवल दर्शक नहीं रहता। वह किसी अभियान का सहभागी, किसी सेवा गतिविधि का लाभार्थी या स्वयंसेवक और किसी सामाजिक संदेश का वाहक भी बन सकता है।
पर्यावरण और संस्कृति का संबंध
आज पर्यावरण संरक्षण केवल वैज्ञानिक या सरकारी विमर्श का विषय नहीं है। इसे सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन से जोड़ना भी जरूरी है।
तुलसी जैसे पौधे के माध्यम से पर्यावरण को सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ने की पहल इसी दिशा में एक उदाहरण है।
जब किसी सामाजिक संदेश को लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ा जाता है, तो उसके प्रभाव की संभावना बढ़ती है।
एक पौधा लगाना छोटा कदम लग सकता है, लेकिन उसके साथ नियमित देखभाल, पानी देना और उसे जीवित रखना जिम्मेदारी की भावना पैदा करता है।
यही जिम्मेदारी आगे चलकर बड़े पर्यावरणीय व्यवहार का आधार बन सकती है।
रामलीला और सामाजिक एकता
रामलीला की एक बड़ी ताकत उसका सामूहिक स्वरूप है।
इसमें अलग-अलग उम्र, वर्ग और सामाजिक पृष्ठभूमि के लोग एक साथ बैठते हैं। कथा सभी के लिए एक समान होती है और मंच के सामने दर्शक के रूप में सभी की पहचान एक हो जाती है।
ऐसे आयोजनों में सामाजिक संवाद की संभावना पैदा होती है।
रामकथा के माध्यम से सत्य, न्याय, कर्तव्य, सेवा और भाईचारे जैसे मूल्यों को सामने रखना समाज को साझा मूल्यों पर विचार करने का अवसर देता है।
इसलिए रामलीला को केवल धार्मिक आयोजन के रूप में देखना उसके व्यापक सामाजिक पक्ष को सीमित कर देना होगा।
परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन
लवकुश रामलीला का बदलता स्वरूप एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रश्न भी सामने रखता है—क्या परंपरा को बचाने के लिए उसे उसी पुराने रूप में प्रस्तुत करना जरूरी है?
या फिर परंपरा की मूल भावना को सुरक्षित रखते हुए उसकी प्रस्तुति बदल सकती है?
आधुनिक तकनीक का प्रयोग इस सवाल का एक संभावित उत्तर प्रस्तुत करता है।
कथा की मूल आत्मा वही रखते हुए प्रस्तुति को आधुनिक बनाया जा सकता है। नई पीढ़ी के लिए दृश्य प्रभाव बढ़ाए जा सकते हैं, लेकिन साथ ही कथा के मूल संदेश को केंद्र में रखा जा सकता है।
यही संतुलन किसी भी सांस्कृतिक परंपरा के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।
रामलीला के सामने सबसे बड़ी चुनौती
आज रामलीला के सामने चुनौती केवल आयोजन की भव्यता बनाए रखना नहीं है।
चुनौती यह भी है कि आने वाली पीढ़ियां इसे केवल सालाना मनोरंजन के रूप में न देखें।
यदि रामलीला का संदेश दर्शक के जीवन तक नहीं पहुंचता, तो मंचन का सामाजिक प्रभाव सीमित रह सकता है।
इसलिए आवश्यक है कि मंचन के साथ सामाजिक अभियान, युवा सहभागिता, पर्यावरण संरक्षण और सेवा गतिविधियां भी जुड़ें।
युवा पीढ़ी को दर्शक से भागीदार बनाना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
रामकथा के पात्र और आज के सवाल
रामलीला के पात्र आज भी समाज के सामने कई सवाल रखते हैं।
राम का वनवास पूछता है कि व्यक्तिगत सुविधा से ऊपर कर्तव्य क्या हो सकता है?
भरत का चरित्र बताता है कि अधिकार और जिम्मेदारी के बीच संबंध क्या है?
हनुमान का चरित्र पूछता है कि सेवा और समर्पण का अर्थ क्या है?
रावण का प्रसंग यह याद दिलाता है कि ज्ञान और शक्ति के बावजूद अहंकार व्यक्ति के पतन का कारण बन सकता है।
इन सवालों के जवाब हर पीढ़ी अपने समय और परिस्थितियों के अनुसार खोज सकती है।
इसीलिए रामलीला की कथा पुरानी होकर भी सामाजिक रूप से नई बनी रहती है।
भव्यता जरूरी, लेकिन संदेश उससे भी जरूरी
लालकिला मैदान में बड़ी भीड़ जुटाना अपने आप में किसी आयोजन की सफलता का एक पहलू हो सकता है। भव्य मंच, आधुनिक प्रकाश व्यवस्था और तकनीकी प्रभाव दर्शकों को आकर्षित कर सकते हैं।
लेकिन किसी रामलीला की वास्तविक सामाजिक भूमिका इस बात से तय होगी कि दर्शक मंच से अपने साथ क्या लेकर लौटता है।
यदि वह केवल दृश्य वैभव लेकर लौटता है तो अनुभव मनोरंजन तक सीमित रह सकता है।
लेकिन यदि वह राम के कर्तव्य, भरत के त्याग, हनुमान की सेवा और रावण के अहंकार से जुड़ा कोई संदेश अपने जीवन में ले जाता है, तो मंचन सामाजिक प्रभाव पैदा करता है।
इसी अंतर को समझना जरूरी है।
मंच से घर तक, कथा से व्यवहार तक
‘घर-घर राम, घर-घर तुलसी’ जैसी पहल का महत्व इसी दृष्टि से देखा जा सकता है।
रामलीला मैदान में शुरू हुई बात घर के आंगन तक पहुंचती है। पौधा एक प्रतीक बनता है और उसके साथ पर्यावरण की जिम्मेदारी जुड़ती है।
इसी तरह स्वास्थ्य शिविर मंच से समाज के जरूरतमंद वर्ग तक पहुंचने का माध्यम बनता है।
युवा कार्यक्रम युवा पीढ़ी को दर्शक से सहभागी बनाने का अवसर देते हैं।
इस तरह रामलीला की यात्रा चार स्तरों पर दिखाई देती है—
मंच से कथा,
कथा से संदेश,
संदेश से सहभागिता,
और सहभागिता से सामाजिक जिम्मेदारी।
संस्कृति का भविष्य नई पीढ़ी से जुड़ा है
किसी भी सांस्कृतिक परंपरा का भविष्य केवल उसके पुराने इतिहास में नहीं, बल्कि इस बात में छिपा होता है कि नई पीढ़ी उसे किस रूप में स्वीकार करती है।
रामलीला की परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए यह जरूरी है कि युवा उससे संवाद कर सकें।
तकनीक इस संवाद का माध्यम बन सकती है। सामाजिक अभियान इसे व्यवहार से जोड़ सकते हैं और सेवा गतिविधियां इसे समाज की वास्तविक जरूरतों से जोड़ सकती हैं।
लवकुश रामलीला का बदलता स्वरूप इसी व्यापक दिशा की ओर संकेत करता है।
एक आयोजन, अनेक संदेश
लालकिला मैदान की रामलीला में एक साथ कई कहानियां चलती हैं।
मंच पर राम और रावण की कथा होती है।
दर्शक दीर्घा में परिवारों की कहानी होती है।
युवाओं के बीच नई तकनीक से जुड़ने की कहानी होती है।
‘घर-घर राम, घर-घर तुलसी’ में पर्यावरण और संस्कार की कहानी होती है।
स्वास्थ्य एवं दिव्यांग सहायता शिविरों में सेवा की कहानी होती है।
और इन सबके बीच भारतीय संस्कृति की निरंतरता की कहानी भी चलती रहती है।
यही कारण है कि रामलीला को केवल एक मंचीय कार्यक्रम मानना उसके प्रभाव के दायरे को छोटा कर देना होगा।
रामलीला का असली विस्तार मंच के बाद शुरू होता है
रामलीला का पर्दा एक दिन गिर जाता है। मंच खाली हो जाता है। पात्र अपने वास्तविक जीवन में लौट जाते हैं। मैदान से भीड़ चली जाती है।
लेकिन यदि दर्शक के मन में कोई विचार रह जाए, किसी बच्चे के मन में रामायण जानने की जिज्ञासा पैदा हो जाए, किसी युवा के घर में तुलसी का पौधा पहुंच जाए, किसी जरूरतमंद को स्वास्थ्य सहायता मिल जाए या परिवार की पीढ़ियों के बीच किसी प्रसंग को लेकर संवाद शुरू हो जाए, तो रामलीला का प्रभाव समाप्त नहीं होता।
वह मंच से निकलकर समाज में आगे बढ़ता है।
यही किसी सांस्कृतिक आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि हो सकती है।
परंपरा भी, परिवर्तन भी
लवकुश रामलीला की कहानी मूल रूप से इसी संतुलन की कहानी है—परंपरा को बचाते हुए प्रस्तुति में परिवर्तन और धार्मिक कथा के साथ सामाजिक जिम्मेदारी।
रामकथा अपनी मूल भावना में वही है, लेकिन उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने के माध्यम बदल रहे हैं।
डिजिटल तकनीक दर्शकों को आकर्षित करती है, सामाजिक अभियान संदेश को मैदान से बाहर ले जाते हैं, पर्यावरण पहल जिम्मेदारी का भाव पैदा करती है और सेवा शिविर आयोजन को जनसरोकार से जोड़ते हैं।
इस तरह रामलीला का मंच केवल कथा कहने की जगह नहीं रह जाता।
वह संवाद का मंच बनता है।
वह पीढ़ियों को जोड़ने का मंच बनता है।
वह सामाजिक संदेश देने का मंच बनता है।
और वह सेवा की भावना को व्यवहार से जोड़ने का माध्यम भी बन सकता है।
निष्कर्ष: राम के आदर्श मंच से जीवन तक पहुंचें
रामलीला की वास्तविक शक्ति उसके मंच की ऊंचाई या तकनीकी भव्यता में नहीं, बल्कि उस संदेश में है जो दर्शक अपने साथ लेकर घर लौटता है।
लालकिला मैदान में जब रामलीला का मंच सजता है, तब हजारों लोग एक कथा देखने आते हैं। लेकिन उस कथा के माध्यम से मर्यादा, त्याग, कर्तव्य, न्याय, सेवा और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विचार भी लोगों के बीच पहुंचते हैं।
लवकुश रामलीला द्वारा आधुनिक तकनीक, युवा सहभागिता, पर्यावरण अभियान और सेवा गतिविधियों को रामलीला से जोड़ने का प्रयास इसी व्यापक सोच को सामने लाता है।
मंच पर राम की कथा और मंच के बाहर राम के आदर्श—यही वह विस्तार है जो रामलीला को केवल एक वार्षिक उत्सव से आगे ले जाकर सामाजिक-सांस्कृतिक अभियान का स्वरूप दे सकता है।
रामलीला कुछ दिनों के लिए होती है, लेकिन राम के आदर्शों की यात्रा पूरे वर्ष चल सकती है।
और शायद यही उस परंपरा का सबसे बड़ा संदेश है—राम को केवल मंच पर देखने की नहीं, उनके आदर्शों को जीवन और समाज में उतारने की जरूरत है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।

