बड़ौत, 05 सितम्बर 2026 (यूटीएन)। श्रीअजितनाथ सभागार में आयोजित आठ दिवसीय लोक कल्याण महामंडल विधान के सातवें दिन श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत वातावरण देखने को मिला। अध्यात्म योगी आचार्य श्री आर्जवसागर महाराज ससंघ के सान्निध्य में जैन श्रद्धालुओं ने जिनेंद्र भगवान की विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना की। श्रद्धालुओं ने अष्टद्रव्यों के साथ भगवान की भक्ति करते हुए धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। इस दौरान विधान स्थल जिनेंद्र भगवान के जयकारों और भक्तिमय वातावरण से गूंजता रहा।
विधान के सातवें दिन सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य मुकेश कुमार रूपल जैन को प्राप्त हुआ। ब्रह्मचारी गौरव भैया एवं ऋषिका दीदी के निर्देशन में धार्मिक क्रियाएं संपन्न कराई गईं। सौधर्म इंद्र द्वारा विधि-विधान के साथ मंडल पर 27 अर्घ्य समर्पित किए गए। अर्घ्य समर्पित करते समय श्रद्धालुओं ने एकाग्रचित्त होकर भगवान के गुणों का स्मरण किया और आत्मकल्याण की भावना से धार्मिक अनुष्ठान में सहभागिता की।
अरिहंत परमेष्ठी की भक्ति को जीवन में उतारना जरूरी : आचार्यश्री
विधान के मध्य आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री आर्जवसागर महाराज ने कहा कि अरिहंत परमेष्ठी के प्रति भक्ति केवल पूजा की क्रिया तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। भगवान की पूजा तभी सार्थक होती है, जब उनके वीतराग भाव, निर्मलता, संयम और आत्मसाधना को अपने जीवन का आदर्श बनाया जाए।
उन्होंने कहा कि भगवान के गुणों का स्मरण करने के साथ साधक को अपने भीतर भी उन गुणों को विकसित करने का पुरुषार्थ करना चाहिए। केवल मंदिर में जाकर पूजा करना ही भक्ति का अंतिम स्वरूप नहीं है। वास्तविक अर्हद्भक्ति वह है, जिसमें व्यक्ति भगवान के आदर्शों को अपने आचरण में उतारने का प्रयास करता है।
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य को अपने भीतर के विकारों को दूर करने और आत्मा की शुद्धता की ओर बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। भगवान की वीतरागता हमें राग-द्वेष से ऊपर उठने की प्रेरणा देती है। जब साधक अपने जीवन में संयम, करुणा, क्षमा और आत्मचिंतन को स्थान देता है, तभी धार्मिक साधना का वास्तविक उद्देश्य पूरा होता है।
समवसरण की दिव्य महिमा का वर्णन
धर्मसभा में आचार्यश्री ने समवसरण की दिव्य महिमा और जिनेंद्र भगवान की वीतरागता से जुड़े आध्यात्मिक प्रसंगों का वर्णन किया। समवसरण की महिमा का श्रवण करते हुए श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
उन्होंने बताया कि भगवान की दिव्य देशना सभी जीवों के कल्याण की भावना से जुड़ी होती है। जिनवाणी का उद्देश्य मनुष्य को बाहरी आडंबरों से हटाकर आत्मचिंतन और आत्मकल्याण के मार्ग पर ले जाना है। भगवान की वाणी में किसी के प्रति भेदभाव नहीं होता और उनके उपदेश का मूल उद्देश्य जीव को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कराना है।
समवसरण के प्रसंगों का वर्णन करते हुए आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को सरल रूप में समझाया। प्रवचन के दौरान श्रद्धालु पूरी एकाग्रता और श्रद्धाभाव से आचार्यश्री के विचार सुनते रहे।
जिनवाणी का अध्ययन समाज के लिए आवश्यक
आचार्यश्री ने कहा कि जिनवाणी का अध्ययन और उसका प्रचार-प्रसार समाज को धर्म के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराने का सशक्त माध्यम है। आज के समय में धर्म को समझने के लिए शास्त्रों का अध्ययन और संतों के मार्गदर्शन की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि जिनवाणी मनुष्य को अपने जीवन की वास्तविक दिशा समझने में सहायता करती है। इसके अध्ययन से व्यक्ति को आत्मा, कर्म, संयम, अहिंसा और वीतरागता जैसे विषयों की गहराई समझने का अवसर मिलता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपने बच्चों और नई पीढ़ी को भी धार्मिक संस्कारों और जिनवाणी के अध्ययन से जोड़ें। धार्मिक ज्ञान केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रहे, बल्कि उसे जीवन के व्यवहार में भी उतारने का प्रयास किया जाए।
श्रद्धालुओं ने एकाग्र भाव से सुने मंगल प्रवचन
धर्मसभा में बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालु उपस्थित रहे। श्रद्धालुओं ने एकाग्र भाव से आचार्यश्री के मंगल प्रवचनों का श्रवण किया। प्रवचन के दौरान कई प्रसंगों ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित किया।
श्रद्धालुओं ने वीतराग प्रभु, आचार्य परमेष्ठी एवं बहुश्रुत संतों के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित की। धार्मिक वातावरण के बीच श्रद्धालुओं ने भगवान के गुणों का स्मरण करते हुए अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का संकल्प लिया।
अष्टद्रव्य से हुई जिनेंद्र भगवान की पूजा
लोक कल्याण महामंडल विधान के सातवें दिन धार्मिक अनुष्ठानों के क्रम में जिनेंद्र भगवान की अष्टद्रव्य से पूजा की गई। श्रद्धालुओं ने विधि-विधान के साथ भगवान का अभिषेक, पूजन और अर्घ्य समर्पण किया।
पूजन के दौरान श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। भक्ति और श्रद्धा के साथ किए गए धार्मिक अनुष्ठानों से पूरा सभागार आध्यात्मिक वातावरण से भर गया। भगवान के जयकारों और धार्मिक मंत्रोच्चार से श्रद्धालुओं में भक्ति की भावना और प्रबल होती रही।
आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा विधान स्थल
आठ दिवसीय विधान के चलते श्रीअजितनाथ सभागार में प्रतिदिन धार्मिक अनुष्ठान और धर्मसभा का आयोजन किया जा रहा है। सातवें दिन भी विधान स्थल पर सुबह से ही श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया था।
पूजन, अर्घ्य समर्पण और मंगल प्रवचन के दौरान वातावरण में आध्यात्मिक ऊर्जा बनी रही। श्रद्धालुओं ने धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लेकर पुण्यार्जन की भावना व्यक्त की। आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं में अनुशासन और धार्मिक आस्था का विशेष वातावरण देखने को मिला।
लोक कल्याण की भावना से आयोजित विधान
लोक कल्याण महामंडल विधान का उद्देश्य सभी जीवों के कल्याण और विश्व में सुख-शांति की मंगलकामना से जुड़ा हुआ है। विधान के दौरान श्रद्धालु धार्मिक अनुष्ठानों के साथ आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना की ओर भी प्रेरित हो रहे हैं।
आयोजन से जुड़े लोगों का कहना है कि ऐसे धार्मिक आयोजनों से समाज में धार्मिक संस्कारों का प्रसार होता है और नई पीढ़ी को भी अपनी संस्कृति, परंपराओं एवं आध्यात्मिक मूल्यों को समझने का अवसर मिलता है।
आठ दिवसीय विधान के सातवें दिन हुए आयोजन ने श्रद्धालुओं को भक्ति के साथ आत्मचिंतन का संदेश दिया। आचार्यश्री के मंगल प्रवचनों और समवसरण की दिव्य महिमा के वर्णन से श्रद्धालु भावविभोर नजर आए। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ कार्यक्रम श्रद्धा और भक्तिभाव के वातावरण में आगे बढ़ा।
ये रहे मौजूद
इस अवसर पर महेंद्र जैन, अरुण जैन, प्रदीप जैन, वरदान जैन, राकेश जैन, नवीन जैन, संजय जैन, संजीव जैन, अंकुर जैन, ऋषभ जैन, अनुज जैन, नितिन जैन सहित बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालु उपस्थित रहे।
श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री के सान्निध्य में धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेकर भगवान जिनेंद्र की आराधना की और लोक कल्याण एवं आत्मकल्याण की भावना से विधान में सहभागिता की।
वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।

