बड़ौत,07 अक्टूबर 2026 (यूटीएन)। अजितनाथ सभागार में आयोजित धर्मसभा में आचार्यश्री 108 आर्जव सागर महाराज ने श्रद्धालुओं को अहिंसा, आत्मसंयम और विचारों की शुद्धता का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि क्रोध पर विजय प्राप्त करना ही अहिंसा की पहली सीढ़ी है। अहिंसा का वास्तविक अर्थ केवल किसी जीव को शारीरिक कष्ट नहीं पहुंचाना नहीं है, बल्कि मन, वचन और व्यवहार से भी किसी के प्रति द्वेष, वैर या पीड़ा का भाव नहीं रखना है। जिस जीवन में करुणा, क्षमा और आत्मसंयम का विकास हो जाता है, वही जीवन वास्तविक अर्थों में अहिंसामय बनता है।
धर्मसभा में आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य के विचार ही उसके व्यवहार की नींव तैयार करते हैं। व्यक्ति के मन में जैसे विचार होते हैं, उसी के अनुरूप उसका आचरण और व्यवहार सामने आता है। यदि मन में क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और वैर की भावना बनी रहती है तो व्यक्ति का व्यवहार भी अशांत और कठोर हो जाता है। इसलिए अहिंसा का पालन केवल बाहरी आचरण को बदलने से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए सबसे पहले अपने भीतर के विचारों को शुद्ध करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने भीतर उठने वाले क्रोध और नकारात्मक भावों पर नियंत्रण रखना चाहिए। परिस्थितियां कैसी भी हों, संयमित रहकर निर्णय लेने का प्रयास करना चाहिए। क्रोध में किया गया व्यवहार अक्सर स्वयं व्यक्ति के साथ-साथ दूसरों के लिए भी परेशानी का कारण बन जाता है। इसके विपरीत धैर्य, क्षमा और विवेक से किया गया व्यवहार रिश्तों में मधुरता और समाज में शांति स्थापित करता है।
कटु वाणी भी हिंसा का एक रूप
आचार्य आर्जव सागर महाराज ने कहा कि किसी जीव को शारीरिक चोट पहुंचाना ही हिंसा नहीं है। कटु वचन बोलना, किसी का मन दुखाना, तिरस्कार करना, अपमानित करना और किसी के प्रति द्वेष की भावना रखना भी अहिंसा के सिद्धांत के विपरीत है। कई बार व्यक्ति अपने शब्दों से सामने वाले को ऐसी पीड़ा पहुंचा देता है, जिसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से प्रेमपूर्ण वाणी का प्रयोग करने, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने तथा आवश्यकता पड़ने पर क्षमा मांगने और दूसरों को क्षमा करने की भावना विकसित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि प्रेम, सहयोग, करुणा और क्षमा जैसे गुण समाज में सौहार्द और शांति का वातावरण तैयार करते हैं।
दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को बदलें
आचार्यश्री ने धर्म को केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित न रखने की बात कही। उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के जीवन और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। दूसरों की कमियां देखने और उन्हें बदलने का प्रयास करने से पहले व्यक्ति को स्वयं के भीतर झांकना चाहिए।
उन्होंने कहा कि दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को बदलना ही सच्ची साधना है। यदि हमारा व्यवहार किसी दूसरे व्यक्ति को सुख और सम्मान देता है, किसी जीव को हमारे कारण भय नहीं होता और हमारे व्यवहार से किसी के मन में पीड़ा उत्पन्न नहीं होती, तो यही अहिंसक जीवन की सुंदर पहचान है।
उन्होंने कहा कि आत्मसंयम व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है। जब मनुष्य अपने विचारों, शब्दों और कर्मों पर नियंत्रण रखना सीख जाता है, तो उसके जीवन में शांति और संतुलन का विकास होता है। यही संतुलित जीवन परिवार और समाज में भी सकारात्मक वातावरण बनाने में सहायक होता है।
आठ दिवसीय श्री सिद्ध चक्र महामंडल विधान का आयोजन
मीडिया प्रभारी वरदान जैन ने बताया कि अजितनाथ सभागार में आचार्यश्री आर्जव सागर महाराज के सानिध्य में श्री सिद्ध चक्र महामंडल विधान का आठ दिवसीय आयोजन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि विधान का आयोजन आज से शुरू होकर 15 अक्टूबर तक चलेगा। धार्मिक आयोजन का शुभारंभ पालकी यात्रा के साथ किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि आयोजन को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह है। विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की उम्मीद है। आयोजन के माध्यम से धर्म, आत्मशुद्धि, संयम और आध्यात्मिक साधना का संदेश दिया जाएगा।
श्रद्धालुओं ने सुने आचार्यश्री के प्रवचन
धर्मसभा में आचार्यश्री के प्रवचनों को श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक सुना। इस दौरान उपस्थित लोगों ने अहिंसा, क्षमा, करुणा और आत्मसंयम को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। सभा में मुकेश जैन, प्रदीप जैन, वरदान जैन, नवीन जैन, संजय जैन, अनिल जैन, राजेश जैन आदि मौजूद रहे।
धर्मसभा का वातावरण आध्यात्मिक और भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री के संदेश को जीवन में उतारने और धर्म के सिद्धांतों के अनुरूप आचरण करने की प्रेरणा ली।
वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।

