बड़ौत,11 सितम्बर 2026 (यूटीएन)। अजितनाथ सभागार में आयोजित मंगल प्रवचन में आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज ने श्रद्धालुओं को भक्ति के वास्तविक स्वरूप का संदेश देते हुए कहा कि केवल मंदिर अथवा तीर्थ स्थल पर जाकर भगवान के दर्शन और पूजा-अर्चना करने वाला व्यक्ति ही सच्चा भक्त नहीं कहलाता। सच्ची भक्ति व्यक्ति के आचरण, विचार और व्यवहार में दिखाई देनी चाहिए। जो व्यक्ति सप्त व्यसनों से दूर रहता है, हिंसा से स्वयं को अलग रखता है और दूसरों को भी अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है, वही वास्तविक अर्थों में भगवान का सच्चा भक्त है।
आचार्य श्री ने कहा कि आजकल भगवान के दरबार में भक्तों की संख्या लगातार बढ़ती दिखाई देती है। अनेक स्थानों पर लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। मंदिरों और तीर्थ स्थलों पर दर्शन के लिए लंबी-लंबी कतारें लगती हैं और कई-कई घंटे प्रतीक्षा करने के बाद श्रद्धालुओं को अपने आराध्य के दर्शन या वंदन का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि यह श्रद्धा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से यह प्रश्न भी करना चाहिए कि वास्तव में सच्चा भक्त कौन है।
भक्ति केवल मंदिर जाने तक सीमित नहीं
मुनि श्री ने कहा कि भगवान के मंदिर में जाना, पूजा करना और दर्शन करना धार्मिक जीवन का एक हिस्सा है, लेकिन भक्ति का वास्तविक अर्थ इससे कहीं व्यापक है। यदि व्यक्ति मंदिर में घंटों पूजा करता है और मंदिर से बाहर निकलते ही किसी जीव को कष्ट पहुंचाता है, किसी के साथ अन्याय करता है या बुरे व्यसनों में लिप्त रहता है तो उसकी भक्ति अधूरी है।
उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ति व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन लाने वाली होनी चाहिए। पूजा-पाठ और धार्मिक क्रियाओं के साथ व्यक्ति के व्यवहार में भी शुद्धता, संयम, करुणा और अहिंसा दिखाई देनी चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे भगवान के सामने केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति की प्रार्थना न करें, बल्कि अपने भीतर के दोषों और बुराइयों को दूर करने का संकल्प भी लें।
सप्त व्यसनों से दूरी जरूरी
आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज ने कहा कि जो व्यक्ति सप्त व्यसनों से दूर रहता है, वही अपने जीवन को संयम और सदाचार की दिशा में आगे बढ़ा सकता है। व्यसन व्यक्ति के विवेक, स्वास्थ्य, परिवार और सामाजिक जीवन को प्रभावित करते हैं। इसलिए धार्मिक जीवन जीने वाले व्यक्ति को इनसे स्वयं को बचाने के साथ-साथ दूसरों को भी इससे दूर रहने की प्रेरणा देनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म केवल पूजा की विधि नहीं बल्कि जीवन जीने की कला है। जब धर्म व्यक्ति के आचरण में उतरता है तो उसके व्यवहार में विनम्रता, संयम और सद्भाव दिखाई देने लगता है।
दया और करुणा को बताया धर्म का मूल
मुनि श्री ने कहा कि जिसके अंतर में दया और करुणा नहीं है, वह सच्चा भक्त नहीं हो सकता। दया धर्म का मूल है। यदि व्यक्ति के हृदय में दूसरे जीवों के प्रति संवेदना नहीं है तो उसकी धार्मिकता पर विचार करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव अपने जीवन को प्रिय मानता है। इसलिए किसी भी जीव को अनावश्यक कष्ट पहुंचाना उचित नहीं है। अहिंसा केवल किसी को नहीं मारने तक सीमित नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म से किसी को पीड़ा न पहुंचाना भी अहिंसा का महत्वपूर्ण स्वरूप है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि अपने जीवन में दया, करुणा और अहिंसा को स्थान दें। जरूरतमंदों की सहायता करें, कमजोर व्यक्ति के प्रति संवेदनशील रहें और अपने व्यवहार से किसी को दुख न पहुंचाएं।
सच्चा भक्त ही भगवान को जान सकता है
आचार्य श्री ने कहा कि सच्चा भक्त वही है जो भगवान के बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करता है। केवल भगवान का नाम लेने से जीवन में परिवर्तन नहीं आता, बल्कि उनके सिद्धांतों को अपने आचरण में उतारना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपने भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करता है और संयम, अहिंसा, दया तथा करुणा के मार्ग पर चलता है, तब वह आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ता है। सच्चा भक्त ही भगवान को जान सकता है और निरंतर पुरुषार्थ करते हुए स्वयं भी एक दिन भगवान बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
श्रद्धालुओं ने सुना मंगल प्रवचन
मंगल प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु सभागार में मौजूद रहे और आचार्य श्री के आध्यात्मिक संदेश को ध्यानपूर्वक सुना। प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं को धार्मिक जीवन के साथ-साथ दैनिक व्यवहार में सदाचार अपनाने की प्रेरणा दी गई।
सभा का संचालन डॉ. श्रेयांस जैन ने किया। इस अवसर पर महेंद्र जैन, मुकेश जैन, प्रदीप जैन, वरदान जैन, नवीन जैन, वकील चंद जैन, जितेंद्र जैन, संजय जैन, संजीव जैन, सुरेश जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
12 और 13 सितंबर को होगी राष्ट्रीय विद्वत् गोष्ठी
मीडिया प्रभारी वरदान जैन ने बताया कि आगामी 12 और 13 सितंबर को एसए यूनिवर्सिटी, नवादा, बिहार के सौजन्य से श्री अजितनाथ सभागार में राष्ट्रीय विद्वत् गोष्ठी का आयोजन किया जाएगा। गोष्ठी का निर्देशन डॉ. श्रेयांस जैन एवं संघस्थ ऋषिका दीदी द्वारा किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि दो दिवसीय राष्ट्रीय विद्वत् गोष्ठी में देश के विभिन्न शहरों से प्रमुख विद्वानों के शामिल होने की उम्मीद है। इस दौरान धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक विषयों पर विद्वानों द्वारा विचार-विमर्श किया जाएगा। आयोजकों की ओर से गोष्ठी की तैयारियां भी की जा रही हैं। उन्होंने बताया कि गोष्ठी का उद्देश्य विद्वानों को एक मंच पर लाकर विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर वैचारिक संवाद को आगे बढ़ाना है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों से विद्वानों के आने से कार्यक्रम को व्यापक स्वरूप मिलने की उम्मीद है।
वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।

