.मथुरा, 25 जून 2026 (यूटीएन)। गंगा दशहरा सनातन धर्म का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन स्वर्गलोक से पृथ्वी पर मां गंगा का अवतरण हुआ था। इसलिए इस दिन को "गंगा अवतरण दिवस" भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में मां गंगा को केवल एक नदी नहीं, बल्कि मोक्षदायिनी देवी, पापों का नाश करने वाली और जीवनदायिनी शक्ति के रूप में पूजा जाता है।
मां गंगा का दिव्य स्वरूप
पुराणों के अनुसार मां गंगा का उद्गम भगवान विष्णु के चरणों से हुआ माना जाता है। जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर तीन पगों में ब्रह्मांड को नापा था, तब उनके चरणों को ब्रह्मांडीय जल ने स्पर्श किया। यही पवित्र जल बाद में गंगा के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। इसलिए गंगा को "विष्णुपदी" भी कहा जाता है।
भगवान विष्णु के चरणों से उत्पन्न होने के कारण गंगा को अत्यंत पवित्र माना गया। बाद में ब्रह्मा ने उन्हें अपने कमंडल में धारण किया और वे स्वर्गलोक में प्रवाहित होने लगीं।
राजा सगर के पुत्रों की कथा
प्राचीन समय में राजा सगर नामक एक प्रतापी राजा हुए। उन्होंने अपनी शक्ति और साम्राज्य विस्तार के लिए अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के दौरान छोड़ा गया घोड़ा अचानक गायब हो गया।
राजा सगर ने अपने 60 हजार पुत्रों को घोड़े की खोज में भेजा। घोड़े की तलाश करते-करते वे पृथ्वी के विभिन्न भागों में घूमते हुए अंततः कपिल मुनि के आश्रम तक पहुंचे। वहां उन्होंने यज्ञ का घोड़ा देखा।
राजा सगर के पुत्रों ने बिना सत्य जाने कपिल मुनि पर चोरी का आरोप लगा दिया। उनकी तपस्या में बाधा और अपमान से क्रोधित होकर कपिल मुनि ने अपने तेज से सभी 60 हजार पुत्रों को भस्म कर दिया। उनके शरीर राख में बदल गए और उनकी आत्माएं मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकीं।
भगीरथ की कठोर तपस्या
समय बीतता गया, लेकिन राजा सगर के पुत्रों की आत्माएं मुक्ति की प्रतीक्षा करती रहीं। कई पीढ़ियों बाद राजा सगर के वंश में राजा भगीरथ का जन्म हुआ।
जब उन्हें अपने पूर्वजों की दुर्दशा का पता चला तो उन्होंने उन्हें मोक्ष दिलाने का संकल्प लिया। भगीरथ ने वर्षों तक हिमालय की कठिन गुफाओं में कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए।
ब्रह्मा जी ने कहा कि केवल गंगा के जल से ही उनके पूर्वजों की आत्माओं को मुक्ति मिल सकती है। लेकिन गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर सकती थी।
शिव की जटाओं में समाई गंगा
इसके बाद भगीरथ ने भगवान शिव की कठोर आराधना की। शिवजी उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और गंगा को अपनी जटाओं में धारण करने का वचन दिया।
जब मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी की ओर उतरीं तो उन्हें अपने वेग और सामर्थ्य का अभिमान था। उन्होंने सोचा कि उनके प्रवाह को कोई रोक नहीं सकता। लेकिन जैसे ही वे पृथ्वी पर आईं, भगवान शिव ने उन्हें अपनी विशाल जटाओं में समेट लिया।
गंगा कई वर्षों तक शिव की जटाओं में ही उलझी रहीं। बाद में शिवजी ने अपनी एक जटा खोलकर गंगा की धारा को पृथ्वी पर प्रवाहित किया। इस प्रकार गंगा का अवतरण संभव हो सका।
भगीरथ के पीछे-पीछे चली गंगा
गंगा पृथ्वी पर उतरने के बाद भगीरथ के पीछे-पीछे चलने लगीं। इसी कारण गंगा की एक धारा को "भागीरथी" कहा जाता है।
भगीरथ उन्हें उस स्थान तक ले गए जहां राजा सगर के पुत्रों की राख पड़ी थी। जैसे ही गंगा जल ने उनकी अस्थियों और राख को स्पर्श किया, उनकी आत्माओं को मोक्ष प्राप्त हो गया।
यही वह महान क्षण था जिसने गंगा को मोक्षदायिनी और पतितपावनी के रूप में स्थापित किया।
गंगा दशहरा क्यों कहलाता है?
शास्त्रों में बताया गया है कि गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान करने, दान देने और मां गंगा की पूजा करने से दस प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। "दश" का अर्थ है दस और "हरा" का अर्थ है नाश करना।
मान्यता है कि इस दिन किए गए पुण्य कर्मों का फल कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए इसे गंगा दशहरा कहा जाता है।
गंगा दशहरा का धार्मिक महत्व
गंगा दशहरा के दिन श्रद्धालु गंगा नदी में स्नान करते हैं, दीपदान करते हैं, गंगा आरती में भाग लेते हैं और गरीबों को दान देते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे सुख, समृद्धि तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है।
भारतीय संस्कृति में गंगा का स्थान
गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान है। करोड़ों लोगों की आस्था, सभ्यता और जीवन गंगा से जुड़ा हुआ है। जन्म से लेकर मृत्यु तक हिंदू जीवन के अनेक संस्कार गंगा जल के बिना अधूरे माने जाते हैं।
हरिद्वार, ऋषिकेश, प्रयागराज, वाराणसी और गंगोत्री जैसे तीर्थस्थल गंगा की महिमा के प्रमुख केंद्र हैं।
गंगा दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भक्ति, तपस्या, त्याग और लोककल्याण की प्रेरणा देने वाला उत्सव है। राजा भगीरथ के अथक प्रयास, भगवान शिव की करुणा और मां गंगा की पावन धारा की यह कथा आज भी करोड़ों लोगों को धर्म, सेवा और सदाचार का संदेश देती है। मां गंगा को भारतीय संस्कृति में जीवन, पवित्रता और मोक्ष की प्रतीक माना जाता है, इसलिए गंगा दशहरा का पर्व श्रद्धा, आस्था और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

