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अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस पर लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त बनाने का संकल्प

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भारतीय संसद दो सदनों लोकसभा और राज्यसभा से मिलकर बनी है। संसद न केवल कानून निर्माण का कार्य करती है, बल्कि राष्ट्रीय नीतियों, विकास योजनाओं और जनहित के मुद्दों पर व्यापक चर्चा का मंच भी प्रदान करती है।

नई दिल्ली,30 जून 2026 (यूटीएन)। अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस के अवसर पर भारत सहित विश्वभर में लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका, उनकी उपलब्धियों और चुनौतियों पर चर्चा की जाती है। संसद किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का केंद्रीय स्तंभ होती है, जहां जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श करते हैं, कानून बनाते हैं और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं। यही कारण है कि संसद को लोकतंत्र का मंदिर तथा जनभावनाओं और जन आकांक्षाओं का सबसे बड़ा मंच माना जाता है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां की संसद लोकतांत्रिक मूल्यों, विविधता और जनप्रतिनिधित्व का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। भारतीय संसद दो सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—से मिलकर बनी है। संसद न केवल कानून निर्माण का कार्य करती है, बल्कि राष्ट्रीय नीतियों, विकास योजनाओं और जनहित के मुद्दों पर व्यापक चर्चा का मंच भी प्रदान करती है। देश के विभिन्न क्षेत्रों, भाषाओं, संस्कृतियों और समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद संसद में जनता की आवाज़ को मजबूती से उठाते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई अवसरों पर संसद को जन आकांक्षाओं का सबसे बड़ा मंच बता चुके हैं। उनका मानना है कि संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं, बल्कि देश की करोड़ों जनता के सपनों, उम्मीदों और अपेक्षाओं को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। प्रधानमंत्री ने संसद में स्वस्थ बहस, संवाद और सहमति की परंपरा को लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक बताया है। उन्होंने यह भी कहा है कि संसद में होने वाली चर्चाएं देश की दिशा और भविष्य तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि वर्तमान समय में दुनिया के कई देशों में लोकतांत्रिक संस्थाओं के सामने नई चुनौतियां उभर रही हैं। डिजिटल युग में सूचना के तीव्र प्रसार, फेक न्यूज, राजनीतिक ध्रुवीकरण, सामाजिक असमानताओं और वैश्विक संकटों के बीच संसदों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ गई है। ऐसे समय में पारदर्शिता, जवाबदेही और जनभागीदारी को मजबूत बनाना लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक माना जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र और अंतर-संसदीय संघ (आईपीयू) का मानना है कि संसदें सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता, जलवायु परिवर्तन और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर प्रभावी कानून और नीतियां बनाकर संसदें समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं। इसके लिए संसदों में महिलाओं, युवाओं और विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

भारत में संसद की कार्यवाही को अधिक पारदर्शी और तकनीक-सक्षम बनाने की दिशा में भी कई प्रयास किए गए हैं। डिजिटल संसदीय प्रक्रियाएं, ई-पोर्टल, ऑनलाइन दस्तावेज़ीकरण और आधुनिक तकनीकों के उपयोग से संसद की कार्यक्षमता बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे नागरिकों को संसदीय गतिविधियों की जानकारी आसानी से उपलब्ध हो रही है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनकी भागीदारी भी बढ़ रही है।

अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस लोकतंत्र की उस भावना को मजबूत करने का अवसर है, जिसमें जनता सर्वोच्च होती है और संसद उसकी सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि मजबूत संसदें ही मजबूत लोकतंत्र की आधारशिला होती हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों, संवाद, सहिष्णुता और जवाबदेही को बढ़ावा देकर संसदें समाज को अधिक न्यायपूर्ण, समावेशी और प्रगतिशील बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। यही कारण है कि अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस केवल एक औपचारिक अवसर नहीं, बल्कि लोकतंत्र को सशक्त बनाने और जनता की आवाज़ को सम्मान देने का वैश्विक संकल्प भी है।

विशेष संवाददाता (मानव नगर)।







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