बड़ौत,09 सितम्बर 2026 (यूटीएन)। नगर के श्री अजितनाथ मंदिर में आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज के सानिध्य में श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ शांति विधान का आयोजन किया गया। विधान में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर धार्मिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की और भगवान के समक्ष शांति, सुख-समृद्धि एवं सर्वकल्याण की भावना से धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किया।
शांति विधान में सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य राजीव कुमार एवं संजीव जैन, छपरौली वालों को प्राप्त हुआ। वहीं ब्रह्मचारी गौरव भैया के सानिध्य में इंद्र-इंद्राणियों ने अत्यंत भक्तिभाव और श्रद्धा के साथ शांति विधान की पूजन संपन्न की। मंदिर परिसर में पूरे आयोजन के दौरान धार्मिक वातावरण बना रहा और श्रद्धालु भक्ति में लीन नजर आए।
अहिंसा जैन धर्म का मूल आधार
विधान के मध्य आयोजित मंगल प्रवचन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज ने कहा कि अहिंसा जैन धर्म का मूल आधार है। अहिंसा का अर्थ केवल किसी जीव को शारीरिक रूप से पीड़ा नहीं पहुंचाना भर नहीं है, बल्कि मन, वचन और काय—तीनों स्तरों पर किसी भी जीव के प्रति हिंसक भावना से बचना ही वास्तविक अहिंसा है।
उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति के मन में किसी के प्रति क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या या वैर की भावना बनी हुई है तो केवल बाहरी रूप से किसी को चोट न पहुंचाना ही पूर्ण अहिंसा नहीं कही जा सकती। अहिंसा का वास्तविक स्वरूप तब प्रकट होता है, जब मन के भीतर भी करुणा, मैत्री और सद्भाव की भावना विकसित हो।
प्रत्येक जीव को अपना जीवन प्रिय
आचार्य श्री ने कहा कि संसार में प्रत्येक जीव अपने जीवन को प्रिय मानता है। जिस प्रकार मनुष्य को अपना जीवन प्रिय है और वह सुखपूर्वक जीना चाहता है, उसी प्रकार छोटे से छोटे जीव को भी अपना जीवन उतना ही प्रिय होता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि हमें अपने दैनिक व्यवहार में विवेक और सावधानी रखनी चाहिए। हमारी असावधानी, लापरवाही या अनावश्यक गतिविधि के कारण किसी जीव को कष्ट न पहुंचे, इसका ध्यान रखना भी अहिंसा के पालन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में ऐसी आदतें विकसित करनी चाहिएं, जिनसे प्रकृति, पर्यावरण और जीव-जगत के प्रति संवेदनशीलता बढ़े। जब मनुष्य दूसरे जीवों के अस्तित्व का सम्मान करता है, तभी उसके भीतर वास्तविक करुणा और धर्म की भावना विकसित होती है।
मन और वाणी की हिंसा से भी बचें
मुनिश्री ने कहा कि अहिंसा को केवल बाहरी आचरण तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। कई बार व्यक्ति किसी को शारीरिक नुकसान नहीं पहुंचाता, लेकिन अपने शब्दों से सामने वाले को गहरी चोट पहुंचा देता है।
उन्होंने कहा कि कटु वचन, अपमानजनक भाषा, क्रोधपूर्ण व्यवहार और किसी के प्रति दुर्भावना रखना भी हिंसा का ही एक रूप है। इसलिए मनुष्य को अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरणा देते हुए कहा कि बोलने से पहले यह विचार करना चाहिए कि हमारे शब्द सामने वाले के मन को चोट तो नहीं पहुंचाएंगे। मधुर और संयमित वाणी से जहां संबंधों में प्रेम बढ़ता है, वहीं कटु वाणी से वर्षों के संबंध भी प्रभावित हो सकते हैं।
विचारों को भी बनाएं अहिंसक
आचार्य श्री ने कहा कि अहिंसक जीवन की शुरुआत मन से होती है। यदि मन में क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और वैर भरा हुआ है तो बाहरी रूप से किए गए धार्मिक आचरण का प्रभाव अधूरा रह जाता है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने विचारों की भी समीक्षा करनी चाहिए। दूसरों के प्रति अच्छी भावना रखना, किसी की सफलता से ईर्ष्या न करना, बदले की भावना से दूर रहना और सभी जीवों के प्रति मैत्री भाव रखना अहिंसक जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
उन्होंने कहा कि मनुष्य के विचार ही उसके व्यवहार का आधार बनते हैं। इसलिए सकारात्मक और करुणामय विचारों का निर्माण करना आवश्यक है।
भोजन में भी रखें जीवदया का ध्यान
आचार्य श्री ने कहा कि अहिंसा का संबंध हमारे खान-पान से भी है। भोजन का चयन करते समय जीवदया और संयम की भावना का ध्यान रखना चाहिए। जैन परंपरा में शाकाहार को अहिंसामय जीवन का महत्वपूर्ण अंग माना गया है।
उन्होंने कहा कि भोजन केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि शरीर को स्वस्थ रखने और जीवन को संयमित बनाने का माध्यम होना चाहिए। व्यक्ति को भोजन के प्रति भी विवेक और मर्यादा रखनी चाहिए।
बच्चों में बचपन से दें जीवदया के संस्कार
आचार्य श्री ने विशेष रूप से बच्चों में संस्कारों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बच्चों को बचपन से ही जीवों के प्रति दया, करुणा और प्रेम की भावना सिखाई जानी चाहिए।
यदि बच्चे छोटे जीवों के प्रति भी संवेदनशील होंगे तो आगे चलकर उनके व्यक्तित्व में करुणा और सह-अस्तित्व की भावना मजबूत होगी। उन्होंने अभिभावकों से कहा कि बच्चों को केवल किताबी शिक्षा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें अच्छे संस्कार देना भी उतना ही आवश्यक है।
अहिंसा से मजबूत होता है समाज
मुनिश्री ने कहा कि अहिंसा केवल व्यक्तिगत जीवन को श्रेष्ठ नहीं बनाती, बल्कि इसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। जब लोग एक-दूसरे के प्रति प्रेम, सम्मान और सहनशीलता का भाव रखते हैं तो समाज में विवाद और तनाव कम होते हैं।
उन्होंने कहा कि आज के समय में जब छोटी-छोटी बातों पर विवाद और क्रोध बढ़ता जा रहा है, ऐसे में अहिंसा का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। व्यक्ति यदि अपने क्रोध पर नियंत्रण कर ले और सामने वाले की भावनाओं को समझने का प्रयास करे तो अनेक विवाद अपने आप समाप्त हो सकते हैं।
धार्मिक आयोजनों का उद्देश्य आत्मशुद्धि
आचार्य श्री ने कहा कि धार्मिक अनुष्ठानों का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होना चाहिए। ऐसे आयोजनों के माध्यम से व्यक्ति को अपने भीतर झांकने और अपने आचरण में सुधार करने की प्रेरणा लेनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि शांति विधान जैसे धार्मिक आयोजन व्यक्ति को आत्मचिंतन, संयम और सद्भाव की दिशा में आगे बढ़ाते हैं। पूजा के साथ यदि व्यक्ति अपने व्यवहार में भी सकारात्मक परिवर्तन लाता है तो धार्मिक साधना सार्थक होती है।
श्रद्धा और भक्ति से संपन्न हुआ शांति विधान
श्री अजितनाथ मंदिर में आयोजित शांति विधान के दौरान श्रद्धालुओं ने विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की। इंद्र-इंद्राणियों ने भक्ति भाव से धार्मिक क्रियाएं संपन्न कीं। मंदिर परिसर में धार्मिक मंत्रोच्चार और भक्ति का वातावरण बना रहा।
श्रद्धालुओं ने भगवान के समक्ष परिवार और समाज में सुख-शांति की कामना की। आयोजन के दौरान बड़ी संख्या में धर्मावलंबी मौजूद रहे और सभी ने धार्मिक वातावरण का लाभ उठाया।
धर्मसभा में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
मंगल प्रवचन के दौरान धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने एकाग्र होकर आचार्य श्री के विचार सुने। अहिंसा, जीवदया, संयम और करुणा पर दिए गए संदेश को श्रद्धालुओं ने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।
वक्ताओं ने कहा कि जैन धर्म की शिक्षाएं केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे मनुष्य को बेहतर जीवन जीने की राह दिखाती हैं। अहिंसा का संदेश आज के दौर में समाज के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।
आयोजन में ये रहे मौजूद
शांति विधान के दौरान मुकेश जैन, प्रदीप जैन, नवीन जैन, वरदान जैन, राकेश जैन, ऋषभ जैन, विकास जैन, संजीव जैन, सुरेश जैन, वकील चंद जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं समाज के लोग मौजूद रहे।
सभी ने धार्मिक आयोजन में भाग लेकर पुण्यार्जन किया और आचार्य श्री के मंगल प्रवचनों का लाभ लिया।
अहिंसा को जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश
अंततः आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि अहिंसा को केवल धार्मिक सिद्धांत के रूप में न देखें, बल्कि उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। मन में मैत्री, वाणी में मधुरता और व्यवहार में करुणा हो तो जीवन स्वतः श्रेष्ठ बन जाता है।
उन्होंने कहा कि श्रेष्ठ जीवन वही है जिसमें मनुष्य स्वयं सुखी रहने के साथ दूसरों के सुख और जीवन का भी सम्मान करे। जीवदया, संयम, करुणा और अहिंसा के मार्ग पर चलकर व्यक्ति न केवल अपने जीवन को शांतिमय बना सकता है, बल्कि समाज में भी प्रेम और सद्भाव का वातावरण तैयार कर सकता है।
वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।

