नई दिल्ली, 15 अगस्त 2025 (यूटीएन)। आदिवासी अधिकारों और भाषाई संरक्षण के प्रति उनके अथक समर्पण को मान्यता देते हुए, दिल्ली विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज़ (एफएमएस) में सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. अनाबेल बेंजामिन बारा को यूनेस्को द्वारा ‘अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी भाषा दशक 2022-2032’ के लिए गठित ग्लोबल टास्क फोर्स की संचालन समिति में सह-अध्यक्ष के रूप में दूसरे कार्यकाल (2025-2027) के लिए पुनः नियुक्त किया गया है। उन्होंने इससे पहले 2022-2024 तक भी इस जिम्मेदारी का सफल निर्वहन किया था।
यह पुनर्नियुक्ति ऐतिहासिक महत्व की है, क्योंकि झारखंड के गुमला जिले के उरांव आदिवासी समुदाय से आने वाले डॉ. बारा, भारत के पहले ऐसे आदिवासी हैं जिन्हें एशिया क्षेत्र से यह प्रतिष्ठित वैश्विक दायित्व सौंपा गया है। उनका निरंतर नेतृत्व आदिवासी भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते फोकस को रेखांकित करता है।
डॉ. बारा का राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी समुदायों के साथ सक्रिय जुड़ाव उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। एक उत्साही अधिवक्ता के रूप में, उन्होंने आदिवासी भाषाओं, संस्कृति, परंपराओं और अधिकारों की रक्षा के लिए निरंतर प्रयास किए हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा, एफएओ, यूएनपीएफआईआई, यूएनईएमआरआईपी और यूएनडीआरआईपी जैसे प्रमुख मंचों पर आदिवासी समुदायों का प्रतिनिधित्व किया है और संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक के साथ भी विचार-विमर्श किया है।
अपने पिछले कार्यकाल में उन्होंने विश्व स्तर पर स्वदेशी भाषाओं के पुनर्जीवन के लिए कई पहल कीं। डिजिटल समावेशन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को देखते हुए उन्हें ‘डिजिटल समानता और डोमेन’ नामक एड-हॉक समूह का सह-अध्यक्ष भी नियुक्त किया गया, जो अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी भाषा दशक के ग्लोबल टास्क फोर्स का एक महत्वपूर्ण अंग है। इस पद पर नियुक्त होने वाले वे पहले आदिवासी प्रतिनिधि भी हैं।
शैक्षणिक पृष्ठभूमि की बात करें तो डॉ. बारा ने एक्सएलआरआई, जमशेदपुर, झारखंड से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है और वे एक विधिवेत्ता भी हैं। एफएमएस में शामिल होने से पहले उन्होंने भारत सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय में अतिरिक्त निजी सचिव और नई दिल्ली स्थित इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट में सामाजिक वैज्ञानिक के रूप में कार्य किया। एफएमएस में वे बिजनेस एथिक्स, बिजनेस सस्टेनेबिलिटी, बिजनेस लॉ और उद्यमिता जैसे विषय पढ़ाते हैं। उनकी यह पुनर्नियुक्ति उनके गहन प्रभाव और समर्पण का प्रमाण है, जो आदिवासी भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के वैश्विक प्रयासों को नई दिशा प्रदान करेगी।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।