Sunday, August 31, 2025

National

spot_img

कठपुतलियों की डोर से शास्त्रीय संगीत तक, चिनार पुस्तक महोत्सव में सुनाई दिए दिलों के स्वर

खुशी से चमकती बच्चोें की आंखों और चेहरों पर उभरी जिज्ञासा को देखकर सहज ही एहसास हो रहा था कि वे पहली बार किसी ऐसे आयोजन का हिस्सा बन रहे हैं जहां कहानी सिर्फ कानों से नहीं, बल्कि दिल से भी सुनी जा रही है। 

नई दिल्ली, 08 अगस्त 2025 (यूटीएन)। श्रीनगर का शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशनल सेंटर बच्चों की तालियों, पैरों की थिरकन, पन्नों की सरसराहट और कहानियों से गूंजता रहा। सुर, शब्द के साथ-साथ लोक धुनों ने एक अलग ही समा बांध दिया। जबकि बच्चों का कोना उनकी कल्पनाओं और ढेर सारे सवालों से गुलज़ार रहा। महोत्सव के छठे दिन की सुबह कठपुतलियों ने शब्दों से बढ़कर कथाएं बांची।
चिल्ड्रन कॉर्नर में आयोजित इस विशेष आयोजन में कहानियां शब्दों के पार जाकर नाचती पोशाकों, उनकी परछाइयों और अद्भुत अंदाज में सुनी गईं। खुशी से चमकती बच्चोें की आंखों और चेहरों पर उभरी जिज्ञासा को देखकर सहज ही एहसास हो रहा था कि वे पहली बार किसी ऐसे आयोजन का हिस्सा बन रहे हैं जहां कहानी सिर्फ कानों से नहीं, बल्कि दिल से भी सुनी जा रही है। 
सीमा वाही ने एक ऐसे ड्रेगन की कहानी सुनाई, जो उड़ना नहीं जानता था। यह कठपुतली के माध्यम से सुनाई गई एक ऐसी कहानी थी जिसने बच्चों को उम्मीद और धैर्यशीलता का सबक दिया। ब्रीद एंड ब्लूम सेशन में उन्होंने बच्चों को श्वास की वह तकनीक सिखाई जिसमें वे अपनी सांसों के माध्यम से खुद को शांत रखने में मदद कर सकते हैं, फिर चाहें कैसा भी समय हो। एक प्रभावशाली सत्र में रईस मोहिउद्दीन, मुनीर और मनोज शीरी ने आरजे मुरसाल से बात करते हुए।
महोत्सव के उद्देश्य की तस्दीक करते हुए कहा कि कैसे कहानियां विभिन्न माध्यम तय करते हुए किताबों से स्टेज तक, परफॉर्मेंस से मास मीडिया तक पहुंचती हैं। अपनी बातचीत में यह सामने आया कि चिनार पुस्तक महोत्सव साहित्य की हर विधा के संरक्षण और हर व्यक्ति तक पहुंचने के अपने लक्ष्य को पूरा कर रहा है। उन्होंने कश्मीरी साहित्य के उद्धरणों से दर्शकों को प्रेरित किया कि वे अपनी मातृभाषा में पढ़ने और सीखने की आदत डालें। 
धरती पर कथा कैसे रची जाती है, लोक कलाकारों के कदमों को देखकर इसे समझा जा सकता है। चिनार पुस्तक महोत्सव में मंच से उतर कर जब लोक कलाकारों ने पूरे मैदान को ही अपना मंच बना लिया तो लोग उनकी थिरकन में खो गए। कोई तालियां बजा रहा था, कोई चीयर अप कर रहा था। स्कूल के विद्यार्थी, प्रोफेशनल्स और महोत्सव में शामिल आमजन सभी एक सत्र से दूसरे सत्र में अपनी रूचियों के अनुकूल सामान खोजते रहे। कुछ गहन विचार-विमर्श में डूबे दिखे, तो कुछ संगीत पर झूमते रहे। जैसे-जैसे शाम ढलने लगी, धनंजय कौल की समृद्ध और भावपूर्ण आवाज़ ने अपना शास्त्रीय जादू बिखेरना शुरू कर दिया।
वहीं एक अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम में, कृषा भट्ट की आवाज़ पूरे परिसर में गूंज उठी, और दर्शकों की प्रिय कलाकार शाज़िया बशीर ने अपनी मधुर प्रस्तुति से भावनाओं और संगीत का ऐसा संगम रचा, जिससे पूरा माहौल मंत्रमुग्ध हो गया। इस संगीतमय शाम का समापन राशिद हाफ़िज़ के भक्ति संगीत के साथ हुआ, जिसने आत्मा को छू लेने वाली अनुभूति देकर छठे दिन को श्रद्धा और ऊष्मा से भर दिया। चिनार पुस्तक महोत्सव में कई प्रतिष्ठित अतिथियों का स्वागत किया गया।
जिससे यह और अधिक स्पष्ट हो गया कि यह उत्सव जम्मू-कश्मीर की सांस्कृतिक डायरी में एक महत्वपूर्ण स्थान बना चुका है। इस अवसर पर डॉ. सैयद दरख़्शां अंद्राबी, अध्यक्ष, जम्मू और कश्मीर वक़्फ बोर्ड, कश्मीर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. निलोफर खान सहित कई अन्य विशिष्ट गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। साहित्य-संस्कृति की यह श्रृंखला जैसे-जैसे आगे बढ़ रही हैं, हर दिन एक नई वजह और एक नया पल इसका आकर्षण और भी बढ़ा रहा है। यह महोत्सव 10 अगस्त, 2025 तक विद्वानों, कलाकारों से सजा रहेगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।

International

spot_img

कठपुतलियों की डोर से शास्त्रीय संगीत तक, चिनार पुस्तक महोत्सव में सुनाई दिए दिलों के स्वर

खुशी से चमकती बच्चोें की आंखों और चेहरों पर उभरी जिज्ञासा को देखकर सहज ही एहसास हो रहा था कि वे पहली बार किसी ऐसे आयोजन का हिस्सा बन रहे हैं जहां कहानी सिर्फ कानों से नहीं, बल्कि दिल से भी सुनी जा रही है। 

नई दिल्ली, 08 अगस्त 2025 (यूटीएन)। श्रीनगर का शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशनल सेंटर बच्चों की तालियों, पैरों की थिरकन, पन्नों की सरसराहट और कहानियों से गूंजता रहा। सुर, शब्द के साथ-साथ लोक धुनों ने एक अलग ही समा बांध दिया। जबकि बच्चों का कोना उनकी कल्पनाओं और ढेर सारे सवालों से गुलज़ार रहा। महोत्सव के छठे दिन की सुबह कठपुतलियों ने शब्दों से बढ़कर कथाएं बांची।
चिल्ड्रन कॉर्नर में आयोजित इस विशेष आयोजन में कहानियां शब्दों के पार जाकर नाचती पोशाकों, उनकी परछाइयों और अद्भुत अंदाज में सुनी गईं। खुशी से चमकती बच्चोें की आंखों और चेहरों पर उभरी जिज्ञासा को देखकर सहज ही एहसास हो रहा था कि वे पहली बार किसी ऐसे आयोजन का हिस्सा बन रहे हैं जहां कहानी सिर्फ कानों से नहीं, बल्कि दिल से भी सुनी जा रही है। 
सीमा वाही ने एक ऐसे ड्रेगन की कहानी सुनाई, जो उड़ना नहीं जानता था। यह कठपुतली के माध्यम से सुनाई गई एक ऐसी कहानी थी जिसने बच्चों को उम्मीद और धैर्यशीलता का सबक दिया। ब्रीद एंड ब्लूम सेशन में उन्होंने बच्चों को श्वास की वह तकनीक सिखाई जिसमें वे अपनी सांसों के माध्यम से खुद को शांत रखने में मदद कर सकते हैं, फिर चाहें कैसा भी समय हो। एक प्रभावशाली सत्र में रईस मोहिउद्दीन, मुनीर और मनोज शीरी ने आरजे मुरसाल से बात करते हुए।
महोत्सव के उद्देश्य की तस्दीक करते हुए कहा कि कैसे कहानियां विभिन्न माध्यम तय करते हुए किताबों से स्टेज तक, परफॉर्मेंस से मास मीडिया तक पहुंचती हैं। अपनी बातचीत में यह सामने आया कि चिनार पुस्तक महोत्सव साहित्य की हर विधा के संरक्षण और हर व्यक्ति तक पहुंचने के अपने लक्ष्य को पूरा कर रहा है। उन्होंने कश्मीरी साहित्य के उद्धरणों से दर्शकों को प्रेरित किया कि वे अपनी मातृभाषा में पढ़ने और सीखने की आदत डालें। 
धरती पर कथा कैसे रची जाती है, लोक कलाकारों के कदमों को देखकर इसे समझा जा सकता है। चिनार पुस्तक महोत्सव में मंच से उतर कर जब लोक कलाकारों ने पूरे मैदान को ही अपना मंच बना लिया तो लोग उनकी थिरकन में खो गए। कोई तालियां बजा रहा था, कोई चीयर अप कर रहा था। स्कूल के विद्यार्थी, प्रोफेशनल्स और महोत्सव में शामिल आमजन सभी एक सत्र से दूसरे सत्र में अपनी रूचियों के अनुकूल सामान खोजते रहे। कुछ गहन विचार-विमर्श में डूबे दिखे, तो कुछ संगीत पर झूमते रहे। जैसे-जैसे शाम ढलने लगी, धनंजय कौल की समृद्ध और भावपूर्ण आवाज़ ने अपना शास्त्रीय जादू बिखेरना शुरू कर दिया।
वहीं एक अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम में, कृषा भट्ट की आवाज़ पूरे परिसर में गूंज उठी, और दर्शकों की प्रिय कलाकार शाज़िया बशीर ने अपनी मधुर प्रस्तुति से भावनाओं और संगीत का ऐसा संगम रचा, जिससे पूरा माहौल मंत्रमुग्ध हो गया। इस संगीतमय शाम का समापन राशिद हाफ़िज़ के भक्ति संगीत के साथ हुआ, जिसने आत्मा को छू लेने वाली अनुभूति देकर छठे दिन को श्रद्धा और ऊष्मा से भर दिया। चिनार पुस्तक महोत्सव में कई प्रतिष्ठित अतिथियों का स्वागत किया गया।
जिससे यह और अधिक स्पष्ट हो गया कि यह उत्सव जम्मू-कश्मीर की सांस्कृतिक डायरी में एक महत्वपूर्ण स्थान बना चुका है। इस अवसर पर डॉ. सैयद दरख़्शां अंद्राबी, अध्यक्ष, जम्मू और कश्मीर वक़्फ बोर्ड, कश्मीर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. निलोफर खान सहित कई अन्य विशिष्ट गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। साहित्य-संस्कृति की यह श्रृंखला जैसे-जैसे आगे बढ़ रही हैं, हर दिन एक नई वजह और एक नया पल इसका आकर्षण और भी बढ़ा रहा है। यह महोत्सव 10 अगस्त, 2025 तक विद्वानों, कलाकारों से सजा रहेगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।

National

spot_img

International

spot_img
RELATED ARTICLES