बड़ौत,08 सितम्बर 2026 (यूटीएन)। नगर के श्रीअजितनाथ सभागार में आयोजित धर्मसभा में आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज ने श्रद्धालुओं को व्यसनमुक्त जीवन का संदेश देते हुए कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसे व्यर्थ के भोग-विलास तथा बुरी आदतों में नष्ट नहीं करना चाहिए। मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य धर्म, संयम, सदाचार, आत्मचिंतन और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना है। प्रत्येक व्यक्ति को समय-समय पर आत्मचिंतन करते हुए यह विचार करना चाहिए कि वह अपने जीवन को किस दिशा में ले जा रहा है।
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य को जीवन में सुख और सुविधाएं अवश्य प्राप्त करनी चाहिए, लेकिन सांसारिक सुखों को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लेना उचित नहीं है। भौतिक सुख क्षणिक होते हैं, जबकि धर्म और सदाचार से प्राप्त आत्मिक शांति व्यक्ति को स्थायी सुख की ओर ले जाती है। इसलिए मनुष्य को अपने आचरण और विचारों को बेहतर बनाने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए।
सप्त व्यसन जीवन को ले जाते हैं पतन की ओर
जैन संत ने कहा कि सप्त व्यसन मनुष्य के जीवन को धीरे-धीरे पतन की ओर ले जाते हैं। शुरुआत में कोई भी व्यसन छोटा, सामान्य अथवा आकर्षक लग सकता है, लेकिन धीरे-धीरे वही आदत व्यक्ति के जीवन पर नियंत्रण स्थापित करने लगती है। व्यसन व्यक्ति की बुद्धि, विवेक, धन, समय और स्वास्थ्य को प्रभावित करने के साथ-साथ उसके पारिवारिक जीवन की सुख-शांति भी छीन लेते हैं।
उन्होंने कहा कि व्यसन के कारण व्यक्ति सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता खोने लगता है। कई बार व्यक्ति अपनी बुरी आदत को छोड़ना चाहता है, लेकिन धीरे-धीरे वह उसका आदी बन जाता है। इसके बाद उसका समय, धन और ऊर्जा उसी व्यसन को पूरा करने में खर्च होने लगती है।
आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि व्यसन से बचने के लिए केवल प्रयास करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यसन से पूरी तरह दूर रहने का संकल्प लेना चाहिए। व्यक्ति यदि दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ निर्णय ले तो वह बुरी आदतों को छोड़कर अपने जीवन को सकारात्मक दिशा दे सकता है।
जैन धर्म में सप्त व्यसनों के त्याग का विशेष महत्व
आचार्य श्री ने कहा कि जैन धर्म में सप्त व्यसनों के त्याग को विशेष महत्व दिया गया है। जुआ, मांस, मद्यपान, शिकार, चोरी, परस्त्री सेवन तथा वेश्यागमन जैसे व्यसन मनुष्य के चरित्र और जीवन को कमजोर करते हैं। इनसे दूर रहकर व्यक्ति संयम, सदाचार और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
उन्होंने कहा कि व्यसन व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा को भी प्रभावित करते हैं। गलत आदतों के कारण व्यक्ति का व्यवहार बदलने लगता है और उसका प्रभाव परिवार तथा समाज के अन्य लोगों पर भी पड़ता है। इसलिए धार्मिक जीवन का पालन करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने आचरण के प्रति सजग रहना चाहिए।
व्यसन का असर केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं
आचार्य श्री ने कहा कि व्यसन का प्रभाव केवल व्यसन करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। इसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है। जब परिवार का कोई सदस्य नशे, जुआ या अन्य बुरी आदतों में फंसता है तो परिवार की आर्थिक स्थिति प्रभावित होने के साथ-साथ घर का वातावरण भी अशांत हो जाता है।
उन्होंने कहा कि परिवार में तनाव बढ़ने लगता है और आपसी संबंधों में दूरी पैदा हो सकती है। कई बार व्यक्ति अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा व्यसन पर खर्च कर देता है, जिसका सीधा असर परिवार की आवश्यकताओं और बच्चों की शिक्षा पर पड़ता है। इसलिए परिवार को सुखी और स्वस्थ रखने के लिए व्यसनमुक्त जीवन बेहद जरूरी है।
युवा पीढ़ी को व्यसनों से बचाना जरूरी
आचार्य श्री ने विशेष रूप से युवा पीढ़ी को व्यसनों से बचाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों और युवाओं को बचपन से ही अच्छे संस्कार दिए जाने चाहिए। धर्म, अहिंसा, शाकाहार, सत्य, संयम और सदाचार जैसे मूल्यों को जीवन का हिस्सा बनाने की प्रेरणा दी जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जिस घर में धार्मिक और संस्कारयुक्त वातावरण होता है, वहां बच्चों पर उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। माता-पिता स्वयं अपने आचरण से बच्चों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करें। बच्चों को केवल उपदेश देने के बजाय अपने व्यवहार के माध्यम से अच्छे संस्कारों की सीख दी जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी के सामने अनेक प्रकार के आकर्षण हैं। ऐसे में अभिभावकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे बच्चों के साथ संवाद बनाए रखें और उन्हें सही तथा गलत का अंतर समझाएं। युवाओं को सकारात्मक गतिविधियों, शिक्षा, संस्कार और आध्यात्मिक चिंतन से जोड़ने की आवश्यकता है।
धर्म को केवल सुनें नहीं, जीवन में उतारें
धर्मसभा में श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि धर्म का वास्तविक लाभ तभी है, जब उसके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारा जाए। केवल धार्मिक प्रवचन सुनना अथवा धार्मिक आयोजनों में शामिल होना पर्याप्त नहीं है। व्यक्ति को अपने व्यवहार, विचार और आचरण में भी धर्म का प्रभाव दिखाई देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि स्वयं व्यसनमुक्त बनें, अपने परिवार को व्यसनमुक्त बनाएं और समाज में भी सदाचार एवं संस्कारों का वातावरण तैयार करें। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में अच्छे आचरण को अपनाने का प्रयास करे तो समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य जीवन की वास्तविक सार्थकता धन-संपत्ति या भौतिक सुखों के संचय में नहीं, बल्कि अपने जीवन को धर्म और सदाचार से जोड़ने में है। संयमित जीवन व्यक्ति को आत्मिक शांति प्रदान करता है और उसे आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाता है।
श्रद्धालुओं ने ग्रहण किया धर्मोपदेश
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के प्रवचन को सुना और व्यसनमुक्त जीवन अपनाने का संदेश ग्रहण किया। सभा के दौरान श्रद्धालुओं ने धर्म, संयम और सदाचार के महत्व को समझते हुए अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का संकल्प लिया।
सभा में मुकेश जैन, प्रदीप जैन, वरदान जैन, नवीन जैन, राकेश जैन, विकास जैन, ऋषभ जैन आदि उपस्थित रहे।
12 और 13 सितंबर को होगी राष्ट्रीय विद्वत् गोष्ठी
मीडिया प्रभारी वरदान जैन ने बताया कि श्रीअजितनाथ सभागार में 12 और 13 सितंबर को राष्ट्रीय विद्वत् गोष्ठी का आयोजन किया जाएगा। गोष्ठी का आयोजन डॉ. श्रेयांस जैन एवं ऋषिका दीदी के निर्देशन में किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय स्तर की इस विद्वत् गोष्ठी में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से प्रसिद्ध विद्वान बड़ौत नगर पहुंचेंगे। गोष्ठी में धार्मिक, आध्यात्मिक एवं जैन दर्शन से जुड़े विभिन्न विषयों पर विद्वानों द्वारा विचार-विमर्श और व्याख्यान प्रस्तुत किए जाएंगे।
आयोजकों के अनुसार, राष्ट्रीय विद्वत् गोष्ठी को लेकर तैयारियां की जा रही हैं और इसमें नगर के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों से भी श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। आयोजन के माध्यम से लोगों को धर्म, दर्शन, संस्कार और आत्मचिंतन से जुड़े विषयों को समझने का अवसर मिलेगा।
आचार्य श्री के संदेश का सार यही रहा कि व्यसन व्यक्ति को भीतर से कमजोर बनाते हैं, जबकि संयम, सदाचार और धर्म उसे जीवन में वास्तविक सुख और शांति की ओर ले जाते हैं। इसलिए स्वयं व्यसनमुक्त बनना और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करना ही स्वस्थ, सुखी और संस्कारवान समाज की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।

