नई दिल्ली,30 सितम्बर 2026 (यूटीएन)। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, महंगाई, वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता और रुपए की कमजोरी जैसी चुनौतियों के बीच भारतीय कारोबारी जगत का भरोसा अपेक्षाकृत मजबूत बना हुआ है। उद्योग संगठन एसोचैम ने पहली बार अपने एसोचैम बिजनेस कॉन्फिडेंस इंडेक्स (एबीसी इंडेक्स) का ट्रायल लॉन्च किया है। सूचकांक के शुरुआती आंकड़े संकेत देते हैं कि बाहरी और घरेलू चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में कारोबारी गतिविधियों को लेकर धारणा पूरी तरह कमजोर नहीं हुई है।
एसोचैम के अनुसार अप्रैल-सितंबर 2026-27 के दौरान बिजनेस कॉन्फिडेंस में सालाना आधार पर 5.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। सितंबर 2026 में एबीसी इंडेक्स बढ़कर 128.25 पर पहुंच गया। सूचकांक का आधार माह अप्रैल 2023 रखा गया है और उस समय के स्तर को 100 माना गया है।
इस आधार पर मौजूदा स्तर यह बताता है कि कारोबारी विश्वास आधार अवधि की तुलना में ऊंचा बना हुआ है।
अप्रैल में पहुंचा था सर्वकालिक उच्च स्तर
एबीसी इंडेक्स ने चालू वित्त वर्ष की शुरुआत में ही अपना सर्वकालिक उच्च स्तर दर्ज किया था। अप्रैल 2026 में सूचकांक 129.74 पर पहुंच गया था।
इसके बाद मई में यह 126.35, जून में 126.71, जुलाई में 128.23, अगस्त में 127.69 और सितंबर में 128.25 रहा।
आंकड़ों से पता चलता है कि अप्रैल के रिकॉर्ड स्तर के बाद सूचकांक में कुछ उतार-चढ़ाव जरूर आया, लेकिन सितंबर तक यह फिर मजबूती के साथ 128 के ऊपर बना रहा।
यह प्रदर्शन ऐसे समय में आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कई स्तरों पर अनिश्चितताओं से गुजर रही है। इसलिए सूचकांक के शुरुआती आंकड़ों में कारोबारी धारणा के अपेक्षाकृत स्थिर रहने को महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
तीन साल के आंकड़ों से क्या संकेत
एसोचैम के मुताबिक एबीसी इंडेक्स में 2024-25 के दौरान 7.5 प्रतिशत और 2025-26 में 9.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।
वहीं चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-सितंबर अवधि में वृद्धि दर 5.6 प्रतिशत रही। यानी पिछले दो वित्त वर्षों की तुलना में वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी हुई है, लेकिन कारोबारी विश्वास में सकारात्मक बढ़ोतरी का सिलसिला बना हुआ है।
यह आंकड़ा कारोबारी परिस्थितियों के बारे में एक व्यापक संकेत देता है, हालांकि इसे अर्थव्यवस्था के किसी एक क्षेत्र की स्थिति का अकेला माप नहीं माना जा सकता।
20 प्रमुख आर्थिक संकेतकों से तैयार हुआ इंडेक्स
एबीसी इंडेक्स की खासियत यह है कि इसे केवल एक सर्वे या किसी एक आर्थिक आंकड़े पर आधारित नहीं किया गया है। एसोचैम ने भारत की आर्थिक गतिविधियों और कारोबारी माहौल की व्यापक तस्वीर पेश करने के लिए 20 प्रमुख आर्थिक संकेतकों को इसमें शामिल किया है।
इनमें शामिल हैं—
- जीएसटी संग्रह
- यात्री वाहन बिक्री
- सेंसेक्स
- इंडिया कंपोजिट पीएमआई
- निर्यात
- औद्योगिक उत्पादन सूचकांक
- कोर इंडस्ट्रीज इंडेक्स
- उपभोक्ता मूल्य सूचकांक
- बैंक क्रेडिट
- डिजिटल भुगतान
- थोक मूल्य सूचकांक
- विदेशी मुद्रा भंडार
- सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
- विनिमय दर
- रेपो रेट
- वास्तविक जीडीपी वृद्धि
- बेरोजगारी दर
- चालू खाते का घाटा
- राजकोषीय घाटा
- आर्थिक सुधारों के प्रभाव पर आधारित फीडबैक
इन अलग-अलग संकेतकों को एक साथ लेकर कारोबारी और आर्थिक परिस्थितियों की समग्र तस्वीर तैयार करने का प्रयास किया गया है।
अलग-अलग आंकड़ों को एक पैमाने पर लाने की कोशिश
अर्थव्यवस्था की स्थिति को समझने के लिए आमतौर पर कई अलग-अलग आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। उदाहरण के लिए जीएसटी संग्रह से कर गतिविधियों, पीएमआई से कारोबारी गतिविधियों, औद्योगिक उत्पादन से विनिर्माण क्षेत्र और बैंक क्रेडिट से वित्तीय गतिविधियों के बारे में जानकारी मिलती है।
लेकिन इन सभी आंकड़ों को अलग-अलग देखने से व्यापक तस्वीर समझना हमेशा आसान नहीं होता। एबीसी इंडेक्स का उद्देश्य इन्हीं अलग-अलग संकेतकों को एक समग्र पैमाने पर लाना है।
एसोचैम के अनुसार प्रत्येक संकेतक को सांख्यिकीय विश्लेषण के आधार पर अलग-अलग वजन दिया गया है। इसके बाद इनके संयुक्त प्रदर्शन के आधार पर इंडेक्स तैयार किया जाता है।
कारोबार का भरोसा किन चीजों से प्रभावित होता है
कारोबारी धारणा कई आर्थिक और गैर-आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित होती है। मांग की स्थिति, ब्याज दरें, कच्चे माल की कीमतें, मुद्रा विनिमय दर, निर्यात बाजार, सरकारी नीतियां और निवेश माहौल कारोबारियों के निर्णयों पर असर डालते हैं।
इसी वजह से एबीसी इंडेक्स में वित्तीय बाजार, उत्पादन, खपत, व्यापार, महंगाई, बैंकिंग और सरकारी वित्त से जुड़े अलग-अलग संकेतकों को शामिल किया गया है।
इससे कारोबारी वातावरण को केवल कंपनियों की बिक्री या शेयर बाजार के प्रदर्शन के आधार पर देखने के बजाय अधिक व्यापक तरीके से समझने की कोशिश की गई है।
वैश्विक संकटों के बीच चुनौती
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव का असर ऊर्जा और व्यापार बाजारों पर पड़ सकता है। ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि से परिवहन और उत्पादन लागत प्रभावित हो सकती है। इसी तरह वैश्विक बाजारों में मांग कमजोर होने पर निर्यात आधारित उद्योगों पर दबाव बढ़ सकता है।
रुपए की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव का भी आयातकों और निर्यातकों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। जिन कंपनियों की लागत आयातित कच्चे माल पर निर्भर है, उनके लिए मुद्रा में कमजोरी लागत बढ़ा सकती है।
इन परिस्थितियों के बावजूद एबीसी इंडेक्स का सितंबर में 128.25 पर रहना बताता है कि समग्र कारोबारी धारणा में अभी व्यापक गिरावट दर्ज नहीं हुई है।
अप्रैल के रिकॉर्ड से सितंबर तक का सफर
एबीसी इंडेक्स का मासिक प्रदर्शन इस प्रकार रहा—
| महीना | एबीसी इंडेक्स |
|---|---|
| अप्रैल 2026 | 129.74 |
| मई 2026 | 126.35 |
| जून 2026 | 126.71 |
| जुलाई 2026 | 128.23 |
| अगस्त 2026 | 127.69 |
| सितंबर 2026 | 128.25 |
अप्रैल के 129.74 के रिकॉर्ड स्तर के बाद मई में सूचकांक नीचे आया, लेकिन जून से इसमें फिर सुधार दिखाई दिया। जुलाई में यह 128.23 तक पहुंचा। अगस्त में मामूली गिरावट के बाद सितंबर में यह 128.25 पर पहुंच गया।
इस तरह सितंबर का स्तर अप्रैल के रिकॉर्ड से नीचे जरूर है, लेकिन शुरुआती महीनों के मुकाबले कारोबारी भरोसे में स्थिरता बनी हुई है।
सितंबर में सालाना वृद्धि 8 प्रतिशत
एसोचैम के आंकड़ों के अनुसार सितंबर में एबीसी इंडेक्स का सालाना आधार पर प्रदर्शन 8 प्रतिशत रहा।
जुलाई में सालाना वृद्धि 7.2 प्रतिशत और अगस्त में 8.8 प्रतिशत दर्ज की गई थी।
इससे पता चलता है कि पिछले साल की समान अवधि की तुलना में कारोबारी विश्वास के सूचकांक में सकारात्मक वृद्धि बनी हुई है, हालांकि महीने-दर-महीने इसमें कुछ उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।
2027 से हर पखवाड़े जारी होगा इंडेक्स
एसोचैम ने एबीसी इंडेक्स को आगे और विकसित करने की योजना बनाई है। संगठन के मुताबिक उद्योग जगत और आर्थिक विश्लेषकों से सुझाव लेकर सूचकांक की पद्धति को और मजबूत किया जाएगा।
अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर 2026 में इसका मासिक मूल्य प्रत्येक महीने के अंतिम कार्यदिवस को जारी किया जाएगा।
इसके बाद जनवरी 2027 से एबीसी इंडेक्स को हर पखवाड़े जारी करने की योजना है।
यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो कारोबारी माहौल में होने वाले अपेक्षाकृत तेज बदलावों को नियमित रूप से ट्रैक करना संभव हो सकेगा।
निरमल कुमार मिंडा ने बताया आर्थिक नब्ज का संकेतक
एसोचैम के अध्यक्ष निरमल कुमार मिंडा ने कहा कि एबीसी इंडेक्स भारत की आर्थिक नब्ज को समझने वाला एक समग्र सूचकांक है।
उनके अनुसार इसमें 20 प्रमुख आर्थिक संकेतकों को शामिल किया गया है, जिससे कारोबारी समुदाय, नीति-निर्माताओं और निवेशकों को बदलते आर्थिक वातावरण को व्यापक नजरिए से समझने में मदद मिल सकती है।
इस तरह का इंडेक्स आर्थिक आंकड़ों को एक ही फ्रेम में देखने का माध्यम उपलब्ध कराता है।
नीति-निर्माताओं के लिए भी उपयोगी हो सकता है
किसी अर्थव्यवस्था में कारोबारी विश्वास निवेश और विस्तार के फैसलों को प्रभावित कर सकता है। यदि कंपनियों को मांग, वित्तीय स्थिति और आर्थिक वातावरण के बारे में सकारात्मक संकेत मिलते हैं तो वे नए निवेश, क्षमता विस्तार और रोजगार से जुड़े फैसलों पर विचार कर सकती हैं।
दूसरी ओर, लगातार कमजोर कारोबारी धारणा निवेश संबंधी फैसलों में सावधानी बढ़ा सकती है।
इस लिहाज से नियमित रूप से प्रकाशित होने वाला एबीसी इंडेक्स नीति-निर्माताओं के लिए भी कारोबारी क्षेत्र की धारणा को समझने का एक अतिरिक्त स्रोत बन सकता है।
एसोचैम महासचिव ने बताया संरचित आकलन
एसोचैम के महासचिव सौरभ सान्याल ने कहा कि इंडेक्स प्रमुख आर्थिक संकेतकों को एक साथ लाकर कारोबारी और आर्थिक वातावरण में हो रहे बदलावों का संरचित आकलन उपलब्ध कराता है।
अलग-अलग संकेतकों के प्रदर्शन को एक साथ देखने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि अर्थव्यवस्था में बदलाव व्यापक है या कुछ चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित है।
आर्थिक गतिविधियों की निगरानी में मदद
एसोचैम के मुख्य अर्थशास्त्री डॉ. एस.पी. शर्मा के अनुसार एबीसी इंडेक्स विभिन्न प्रमुख संकेतकों में हो रहे बदलावों को एकीकृत करके आर्थिक गति की समग्र तस्वीर पेश करेगा।
उनके अनुसार नियमित निगरानी से कारोबारी माहौल में होने वाले बदलावों को पहले समझने और उनका विश्लेषण करने में मदद मिल सकती है।
इसमें विशेष रूप से उत्पादन, खपत, निवेश, बैंकिंग, व्यापार और वित्तीय स्थितियों से जुड़े संकेतकों का संयुक्त प्रदर्शन महत्वपूर्ण होगा।
जीएसटी और डिजिटल भुगतान जैसे संकेतक
इंडेक्स में जीएसटी संग्रह और डिजिटल भुगतान जैसे संकेतकों को शामिल किया गया है। ये दोनों संकेतक औपचारिक अर्थव्यवस्था और आर्थिक लेन-देन की गतिविधियों के अलग-अलग पहलुओं को समझने में उपयोगी हो सकते हैं।
जीएसटी संग्रह कारोबारी लेन-देन और कर गतिविधियों की तस्वीर देता है, जबकि डिजिटल भुगतान के आंकड़े अर्थव्यवस्था में डिजिटल लेन-देन के विस्तार को दर्शाते हैं।
हालांकि, इन संकेतकों की व्याख्या करते समय व्यापक आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है।
बैंक क्रेडिट और ब्याज दर भी अहम
कारोबार के लिए बैंकिंग प्रणाली से मिलने वाला ऋण महत्वपूर्ण होता है। इसलिए बैंक क्रेडिट को भी एबीसी इंडेक्स में शामिल किया गया है।
इसी तरह रेपो रेट को शामिल करने से ब्याज दरों के वातावरण को भी सूचकांक में जगह मिलती है। ब्याज दरों में बदलाव से कंपनियों की उधारी लागत, निवेश योजनाओं और उपभोक्ता ऋण की मांग पर असर पड़ सकता है।
महंगाई और मुद्रा बाजार की भूमिका
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और थोक मूल्य सूचकांक को शामिल करने का उद्देश्य महंगाई से जुड़ी परिस्थितियों को भी समग्र कारोबारी तस्वीर में शामिल करना है।
दूसरी ओर विनिमय दर का प्रदर्शन विशेष रूप से उन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है जो आयात या निर्यात से जुड़ी हैं। रुपए में उतार-चढ़ाव का असर आयातित कच्चे माल की लागत और निर्यात से होने वाली आय दोनों पर पड़ सकता है।
विदेशी मुद्रा भंडार और एफडीआई भी शामिल
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जैसे संकेतक बाहरी क्षेत्र की स्थिति से संबंधित हैं। इनका प्रदर्शन वैश्विक निवेश और बाहरी वित्तीय परिस्थितियों की व्यापक तस्वीर समझने में मदद कर सकता है।
एफडीआई के माध्यम से आने वाला निवेश भारत में उत्पादन क्षमता, तकनीक और रोजगार के विस्तार से जुड़ सकता है।
निर्यात और औद्योगिक उत्पादन पर नजर
निर्यात भारत की बाहरी आर्थिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वैश्विक मांग में बदलाव का सीधा असर निर्यात क्षेत्र पर पड़ सकता है।
इसी तरह औद्योगिक उत्पादन और कोर इंडस्ट्रीज इंडेक्स को शामिल करने से विनिर्माण और बुनियादी उद्योगों की गतिविधियों को भी समग्र सूचकांक में शामिल किया गया है।
रोजगार की स्थिति भी बनी इंडेक्स का हिस्सा
एबीसी इंडेक्स में बेरोजगारी दर को भी शामिल किया गया है। कारोबारी गतिविधियों और रोजगार के बीच महत्वपूर्ण संबंध होता है।
नए निवेश और उत्पादन क्षमता में विस्तार से रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं, जबकि कमजोर आर्थिक गतिविधियों में रोजगार बाजार पर दबाव आ सकता है।
इसलिए रोजगार संकेतक को शामिल करने से कारोबारी धारणा की तस्वीर को केवल कंपनियों के नजरिए तक सीमित रखने के बजाय व्यापक आर्थिक संदर्भ मिलता है।
जीडीपी और राजकोषीय स्थिति का प्रभाव
वास्तविक जीडीपी वृद्धि और राजकोषीय घाटे को भी सूचकांक में जगह दी गई है। जीडीपी अर्थव्यवस्था की समग्र उत्पादन गतिविधि का प्रमुख संकेतक है।
वहीं राजकोषीय स्थिति सरकार की वित्तीय क्षमता और खर्च से जुड़े व्यापक वातावरण की जानकारी देती है। सरकारी निवेश और सार्वजनिक खर्च कई क्षेत्रों में मांग और आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं।
सूचकांक को अभी ट्रायल चरण में देखा जा रहा है
चूंकि एसोचैम ने इसे पहली बार ट्रायल के रूप में लॉन्च किया है, इसलिए आने वाले महीनों में इसके आंकड़ों और पद्धति का और विस्तार से परीक्षण किया जाएगा।
उद्योग और आर्थिक विशेषज्ञों से मिलने वाले सुझावों के आधार पर संकेतकों के वजन, डेटा स्रोत और गणना पद्धति में बदलाव किए जा सकते हैं।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सूचकांक कारोबारी माहौल में वास्तविक बदलावों को अधिक उपयोगी तरीके से प्रतिबिंबित करे।
एक आंकड़ा पूरी अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर नहीं
एबीसी इंडेक्स आर्थिक माहौल को समझने का एक अतिरिक्त माध्यम है। किसी भी समग्र सूचकांक की तरह इसके आंकड़ों को अन्य आर्थिक संकेतकों के साथ पढ़ना आवश्यक होगा।
उदाहरण के लिए किसी महीने में शेयर बाजार मजबूत हो सकता है, जबकि किसी विशेष उद्योग में मांग कमजोर हो। इसी तरह निर्यात में वृद्धि के बावजूद किसी अन्य क्षेत्र में लागत का दबाव हो सकता है।
इसलिए एबीसी इंडेक्स का महत्व उसके रुझान को अन्य आर्थिक आंकड़ों के साथ मिलाकर समझने में अधिक होगा।
आगे की निगरानी होगी महत्वपूर्ण
जनवरी 2027 से हर पखवाड़े इंडेक्स जारी करने की योजना के बाद इसके आंकड़ों की आवृत्ति बढ़ जाएगी। इससे आर्थिक परिस्थितियों में होने वाले बदलावों पर अधिक नियमित नजर रखी जा सकेगी।
विशेष रूप से वैश्विक ऊर्जा कीमतों, भू-राजनीतिक परिस्थितियों, मुद्रा बाजार और घरेलू मांग में तेजी या कमजोरी जैसे बदलावों का कारोबारी धारणा पर प्रभाव इस सूचकांक के माध्यम से ट्रैक किया जा सकता है।
भारतीय कारोबार के लिए मिश्रित लेकिन सकारात्मक संकेत
सितंबर में 128.25 का स्तर और सालाना 8 प्रतिशत की वृद्धि ऐसे समय में दर्ज हुई है जब वैश्विक स्तर पर कई जोखिम मौजूद हैं। वहीं अप्रैल के 129.74 के रिकॉर्ड स्तर से सितंबर तक मामूली उतार-चढ़ाव भी यह दर्शाता है कि कारोबारी धारणा पूरी तरह एकतरफा दिशा में नहीं चल रही है।
अप्रैल-सितंबर की 5.6 प्रतिशत सालाना वृद्धि भी पिछले दो वित्त वर्षों की तुलना में धीमी है। इसलिए आगे के महीनों में इंडेक्स का रुझान यह समझने के लिए महत्वपूर्ण होगा कि कारोबारी विश्वास किस दिशा में जाता है।
एबीसी इंडेक्स का अगला चरण
एसोचैम की योजना के अनुसार आने वाले महीनों में सूचकांक को और विकसित किया जाएगा और 2027 से इसे अधिक बार प्रकाशित किया जाएगा। इससे उद्योग जगत और आर्थिक विश्लेषकों को कारोबारी माहौल के बदलावों को अधिक नियमित रूप से देखने का अवसर मिल सकता है।
फिलहाल शुरुआती आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय कारोबारी धारणा में मजबूती बनी हुई है, हालांकि वृद्धि की रफ्तार में कुछ नरमी दिखाई देती है।
एबीसी इंडेक्स आने वाले समय में निवेश, उत्पादन, खपत, वित्तीय स्थितियों और बाहरी क्षेत्र से जुड़े संकेतकों को एक साथ देखने का एक उपयोगी ढांचा बन सकता है। इसकी वास्तविक उपयोगिता आने वाले महीनों के आंकड़ों, नियमित प्रकाशन और समय के साथ इसकी पद्धति के और मजबूत होने पर अधिक स्पष्ट होगी।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।

