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संसार रूपी भवबंधन से छुटकारा पाना आवश्यक :श्री आर्जव सागर महाराज

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बड़ौत,12 अगस्त 2026 (यूटीएन)। विराजमान आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज ने भगवान् अजितनाथ सभागार में धर्मसभा में कहा कि, जीवन में सुख शांति की बड़ी ही जरूरत है।प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक क्षण ही इसकी खोज करते रहते हैं।पर, भैया सच्चा सुख तो अपनी आत्मा में ही है।आत्मा को प्राप्त करने के लिए हमें कर्म रूपी बीज को जलाना पड़ेगा ;जिससे संसार का अंत होगा और हम अपनी आत्मा को प्राप्त कर परमात्मा बन पाएंगे। मोक्ष प्राप्त कर पाएंगे।

उन्होंने कहा,जीवन में आध्यात्मिक शांति -सुख का अन्य कोई दूसरा साधन नहीं है, मात्र मंदिर जी ही एक ऐसा साधन है; जिसमें प्रभु दर्शन से सच्ची शांति और सच्चा सुख प्राप्त होता है।आचार्य श्री ने कहा कि ,दुख तीन तरह के होते हैं तन का दुख, मन का दुख और धन का दुख।धन तो जीवन में बहुत मिलता है। जैसे राजकुल में जन्म लेने वाले तीर्थंकरों को भी धन की कोई कमी नहीं थी। उनके काल में तो भूमि पर कोई भी जीव दीन -दरिद्र नहीं रहता था। हमेशा रत्नो की वर्षा होती रहती थी। सभी जीव खुशहाल पूर्वक अपना जीवन यापन करते थे और सभी जीव राग द्वेष से दूर होकर सदैव संतुष्ट भी रहते थे।फिर भी वह तीर्थंकर इस संसार की असारता को समझ कर अपनी आत्मा और शरीर के भेद विज्ञान को जानकर ऐसे अपार वैभव को छोड़कर... जिन दीक्षा (मुनिपद ) धारण कर लेते हैं।सभी तीर्थंकर जन्म से ही अनंत बल के धारी होते हैं। उनसे बलशाली अन्य दूसरा व्यक्ति नहीं होता है एवं उन्हें कोई हरा भी नहीं सकता। ऐसे जैन धर्म में 24 तीर्थंकर कह गए हैं, जिनमें सभी में समान बल और समान शक्ति होती है।

आचार्य श्री जी ने संसार और मोक्ष की पहचान कराते हुए और भी बताया कि, संसार क्या है?संसरितीति संसार : अर्थात् चारों गतियों (मनुष्य गति, तिर्यंच गति,देव गति और नरक गति )में भ्रमण का नाम ही संसार है।और मोक्ष क्या है? तो जहां संपूर्ण कर्मों का क्षय होता है, वहां मोक्ष होता है अर्थात् संपूर्ण कर्मों के क्षय का नाम ही मोक्ष है।जिसे प्राप्त करने हमें पुरुषार्थ करना है।इस दौरान सभा में मुकेश जैन,प्रदीप जैन, नवीन जैन,वरदान जैन,विकास जैन, अंकुर जैन,ऋषभ जैन आदि उपस्थित रहे।

वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )







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