बागपत, 27 अगस्त 2026 (यूटीएन)। धार्मिक महत्व के पक्का घाट पर गुरुवार को उपाकर्म संस्कार श्रद्धा और धार्मिक विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। आचार्य प्रवीण पुलस्त्य के आचार्यत्व में आयोजित कार्यक्रम में बागपत जनपद के अलावा आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में ब्राह्मण और वटुक पहुंचे। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रद्धालुओं ने सर्वप्रथम यमुना जी का पूजन किया और इसके बाद पवित्र यमुना में स्नान कर उपाकर्म की धार्मिक परंपराओं को पूरा किया।
सुबह से ही पक्का घाट पर ब्राह्मणों और वटुकों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। यमुना तट पर धार्मिक अनुष्ठान और मंत्रोच्चार से वातावरण भक्तिमय नजर आया। स्नान एवं पूजन के बाद श्रद्धालुओं ने ऋषि परंपरा, वेदों के संरक्षण और सनातन संस्कृति के मूल्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
यमुना पूजन के साथ शुरू हुआ उपाकर्म
उपाकर्म संस्कार के अंतर्गत सबसे पहले यमुना जी का विधि-विधान से पूजन किया गया। इसके बाद वटुकों और ब्राह्मणों ने यमुना में स्नान किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार उपाकर्म में स्नान, शुद्धिकरण, ऋषि पूजन, देवता पूजन और पितरों का तर्पण विशेष महत्व रखता है।
कार्यक्रम के दौरान वैदिक मंत्रों के बीच विभिन्न धार्मिक क्रियाएं संपन्न कराई गईं। श्रद्धालुओं ने अपनी परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना की और ऋषियों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की।
आत्मशुद्धि और ऋषि परंपरा से जुड़ा पर्व
आचार्यों ने बताया कि उपाकर्म केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और ऋषि परंपरा के प्रति सम्मान व्यक्त करने का पर्व भी है। इस अवसर पर व्यक्ति अपने जीवन में ज्ञान, संयम और सदाचार को अपनाने का संकल्प लेता है।
उपाकर्म में वेद अध्ययन, ज्ञानवर्धन और वेद संरक्षण को विशेष महत्व दिया जाता है। इसके माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी वैदिक परंपरा और संस्कृति से जोड़ने का प्रयास भी किया जाता है।
जनेऊ पूजन और परिवर्तन की रही विशेष परंपरा
उपाकर्म संस्कार में जनेऊ पूजन, जनेऊ परिवर्तन और नवीन यज्ञोपवीत धारण करने की भी परंपरा रही। कार्यक्रम में ब्राह्मणों और वटुकों ने धार्मिक विधि के अनुसार यज्ञोपवीत से संबंधित संस्कार संपन्न किए।
आचार्यों ने वटुकों को धार्मिक परंपराओं, वेदों के अध्ययन और गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि संस्कारों के माध्यम से युवा पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं की जानकारी मिलती है।
वेद संरक्षण का लिया संकल्प
कार्यक्रम में मौजूद ब्राह्मणों और वटुकों ने वेद, धर्म और भारतीय संस्कृति की रक्षा एवं संरक्षण का संकल्प लिया। आचार्यों ने कहा कि वैदिक ज्ञान हमारी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत है और इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना समाज की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक शिक्षा के साथ युवाओं को अपनी संस्कृति, धर्म और परंपराओं का ज्ञान होना भी आवश्यक है। वेदों का अध्ययन व्यक्ति को ज्ञान, अनुशासन और सदाचार की दिशा में प्रेरित करता है।
पितरों का तर्पण और ऋषियों का पूजन
उपाकर्म के दौरान ऋषि पूजन और पितरों के तर्पण की परंपरा भी निभाई गई। श्रद्धालुओं ने अपने पूर्वजों को स्मरण करते हुए उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की। साथ ही ऋषियों और देवताओं का पूजन कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना की।
यमुना तट पर आयोजित धार्मिक अनुष्ठान के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी रही। घाट पर पूरे समय वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक गतिविधियां चलती रहीं।
वटुकों में दिखा उत्साह
उपाकर्म में बड़ी संख्या में वटुकों ने भाग लिया। उन्होंने आचार्यों के मार्गदर्शन में धार्मिक क्रियाओं को समझा और विधि-विधान से पूरा किया। वटुकों को उपाकर्म के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के बारे में भी जानकारी दी गई।
आचार्यों ने कहा कि बचपन से ही बच्चों को संस्कार और अपनी परंपराओं का ज्ञान दिया जाना जरूरी है। इससे उनमें संस्कृति के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है और वे अपनी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित होते हैं।
दूर-दराज से पहुंचे ब्राह्मण
कार्यक्रम में बागपत के साथ-साथ हरियाणा, दिल्ली, गुड़गांव, मेरठ और शामली समेत आसपास के क्षेत्रों से भी ब्राह्मण और विद्वान पहुंचे। बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के चलते पक्का घाट पर पूरे दिन धार्मिक माहौल बना रहा।
आयोजकों की ओर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं की गईं। कार्यक्रम में शामिल लोगों ने उपाकर्म संस्कार को श्रद्धा और परंपरा के अनुरूप संपन्न कराया।
धर्म और संस्कृति को आगे बढ़ाने पर जोर
आचार्यों ने कहा कि धार्मिक पर्व और संस्कार समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करते हैं। उपाकर्म के माध्यम से व्यक्ति आत्मशुद्धि के साथ अपने ज्ञान और कर्तव्यों के प्रति जागरूक होता है।
उन्होंने युवाओं से वेदों एवं भारतीय संस्कृति का अध्ययन करने तथा अपनी परंपराओं को समझने का आह्वान किया। कहा कि संस्कृति की रक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसे आचरण और संस्कारों के माध्यम से जीवन में उतारना चाहिए।
ये रहे मौजूद
इस अवसर पर आचार्य मनोज जोशी, भागवत कथा वक्ता बागपत, पं. सोमदत्त शास्त्री बागपत, पं. श्रीकृष्ण शर्मा हरियाणा, पं. नवीन शर्मा हरियाणा, पं. प्रदीप शास्त्री दिल्ली, आचार्य मनीष शर्मा गुड़गांव, गोपाल शास्त्री मेरठ, पं. योगेंद्र शास्त्री, पं. जयकिशन शास्त्री, पं. अंकुर शास्त्री, पं. शोभित शास्त्री शामली, पं. अंकित शास्त्री, पं. अनिल शास्त्री, पं. कपिल शास्त्री, पं. नमन शास्त्री, राकेश मोहन शर्मा अध्यक्ष परशुराम संघ, पुनीत शर्मा समेत सैकड़ों ब्राह्मण और वटुक मौजूद रहे।
यमुना पूजन, स्नान, ऋषि पूजन, तर्पण और जनेऊ परिवर्तन सहित विभिन्न धार्मिक संस्कारों के साथ उपाकर्म कार्यक्रम श्रद्धा और उल्लास के वातावरण में संपन्न हुआ। इस दौरान उपस्थित लोगों ने वेद, धर्म और संस्कृति की परंपरा को जीवंत रखते हुए आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प लिया।
वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।

