नई दिल्ली,30 सितम्बर 2026 (यूटीएन)। राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि विकसित भारत @2047 का लक्ष्य केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के प्रत्येक नागरिक को अवसर, सम्मान, कौशल और आत्मनिर्भरता से जोड़ने का व्यापक संकल्प है। उन्होंने कहा कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए रोजगार व्यवस्था को मजबूत करना सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में से एक है। प्रत्येक विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र का लोकल एम्प्लॉयमेंट एंड स्किल मैप तैयार किया जाना चाहिए, ताकि क्षेत्र विशेष की आवश्यकताओं, उपलब्ध संसाधनों और युवाओं के कौशल के अनुरूप रोजगार के अवसर विकसित किए जा सकें।
देवनानी मंगलवार को नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर के गुलमोहर हॉल में ‘विकसित भारत @2047 के लिए भारत के रोजगार ढांचे की मजबूती’ विषय पर आयोजित कार्यशाला में सांसदों, विधायकों, उद्योग जगत और शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में एनएफपीआरसी फाउंडेशन के अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद तरुण चुघ ने राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी का स्वागत किया।
देवनानी ने कहा कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी विशिष्ट आर्थिक और सामाजिक आवश्यकताएं हैं। कहीं पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं तो कहीं कृषि और कृषि प्रसंस्करण, कहीं इंजीनियरिंग एवं विनिर्माण क्षेत्र मजबूत है तो कहीं नवीकरणीय ऊर्जा और डिजिटल सेवाओं के विस्तार की व्यापक संभावनाएं हैं। ऐसे में पूरे देश के लिए एक समान रोजगार मॉडल के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप रोजगार एवं कौशल विकास की रणनीति तैयार करना अधिक प्रभावी होगा।
उन्होंने कहा कि स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन देने, युवाओं की सोच में सकारात्मक बदलाव लाने तथा शिक्षा और व्यवहारिक कौशल के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने की जरूरत है। जब स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और युवाओं की प्रतिभा को एक-दूसरे से जोड़ा जाएगा, तब रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और पलायन की समस्या को भी कम करने में मदद मिलेगी।
सामूहिक संकल्प से रचेंगे नया इतिहास
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। युवा शक्ति के पौरुष, मातृ शक्ति के सशक्तिकरण, श्रम, सामूहिक संकल्प, आत्मनिर्भरता और व्यवहारिक ज्ञान के माध्यम से देश विकास की नई ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकता है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत का निर्माण किसी एक संस्था, सरकार या क्षेत्र के प्रयास से संभव नहीं है। इसके लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को अपनी भूमिका निभानी होगी।
उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में रोजगार का स्वरूप तेजी से बदलने वाला है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन, रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर, ग्रीन एनर्जी, बायोटेक्नोलॉजी, साइबर सुरक्षा और डिजिटल सेवाओं जैसी नई तकनीकें अर्थव्यवस्था और रोजगार के पारंपरिक ढांचे को प्रभावित करेंगी। इसलिए युवाओं को केवल वर्तमान रोजगार की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षित करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन्हें भविष्य की तकनीकी और औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए भी तैयार करना होगा।
देवनानी ने कहा कि री-स्किलिंग और लाइफलॉन्ग लर्निंग अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुकी है। कामकाजी युवाओं को समय-समय पर नए कौशल सीखने के अवसर मिलने चाहिए, ताकि तकनीकी बदलावों के साथ वे अपनी कार्यक्षमता को लगातार विकसित कर सकें।
नीति के साथ धरातल की वास्तविकता समझना जरूरी
देवनानी ने कहा कि कोई भी नीति तभी प्रभावशाली बन सकती है, जब उसके पीछे ठोस अध्ययन, जमीनी वास्तविकताओं की समझ और परिणामों का निरंतर मूल्यांकन हो। रोजगार के क्षेत्र में भी आंकड़ों और वास्तविक जरूरतों के आधार पर नीतियां बनाई जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि देश की रोजगार वास्तुकला को अधिक सुदृढ़, समावेशी और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने की आवश्यकता है। युवाओं को किस क्षेत्र में किस प्रकार के कौशल की आवश्यकता है, स्थानीय उद्योगों को किस प्रकार के मानव संसाधन की जरूरत है और आने वाले वर्षों में किन क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, इसका नियमित अध्ययन किया जाना चाहिए।
युवा कौशल से खुलेंगे रोजगार के नए द्वार
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि भारत की युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी पूंजी है। यदि युवाओं की क्षमता को कौशल, अवसर और उद्यमिता से जोड़ा जाए तो रोजगार के नए द्वार खोले जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि युवा केवल नौकरी तलाशने वाला न बने, बल्कि रोजगार सृजित करने वाला भी बने, इसके लिए उद्यमिता को शिक्षा और कौशल विकास के साथ जोड़ना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि स्कूल और कॉलेज स्तर से ही विद्यार्थियों को व्यावहारिक शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और उद्योगों की आवश्यकताओं से परिचित कराया जाना चाहिए। इससे शिक्षा पूरी करने के बाद युवाओं को रोजगार की दुनिया में प्रवेश करने में आसानी होगी।
रोजगार केवल नौकरी नहीं, आत्मनिर्भरता का माध्यम
देवनानी ने कहा कि रोजगार को केवल नौकरी उपलब्ध कराने के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। रोजगार व्यक्ति की क्षमता, कौशल, सम्मान, आत्मनिर्भरता और राष्ट्र की उत्पादक शक्ति से जुड़ा विषय है। जब किसी व्यक्ति को उसकी योग्यता और कौशल के अनुरूप अवसर मिलता है, तो उसका लाभ केवल उसके परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिलती है।
उन्होंने कहा कि एक कुशल और उत्पादक कार्यबल देश की आर्थिक शक्ति को मजबूत करता है। इसलिए रोजगार के साथ-साथ कार्य की गुणवत्ता, कौशल और उत्पादकता पर भी समान रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है।
शिक्षा और कौशल में बेहतर तालमेल जरूरी
देवनानी ने कहा कि जब कोई युवा अपनी शिक्षा को कौशल में, कौशल को कार्य में और कार्य को मूल्य सृजन में बदलता है तो वह अपने व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी आगे बढ़ाता है। इसलिए शिक्षा और कौशल विकास को उद्योगों की वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओं से जोड़ना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि पारंपरिक शिक्षा के साथ व्यावसायिक एवं तकनीकी प्रशिक्षण को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। अप्रेंटिसशिप, इंटर्नशिप और उद्योग आधारित प्रशिक्षण युवाओं को वास्तविक कार्य वातावरण से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
भारत की युवा शक्ति को अवसर देने की आवश्यकता
देवनानी ने कहा कि भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है और देश की बड़ी आबादी युवा है। यह जनसांख्यिकीय स्थिति भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। यदि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक कौशल, पर्याप्त अवसर और उद्यमिता का वातावरण उपलब्ध कराया जाए तो यही युवा शक्ति देश की आर्थिक प्रगति की आधारशिला बन सकती है।
उन्होंने कहा कि युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा देना सरकार, उद्योग, शिक्षण संस्थानों और समाज की साझा जिम्मेदारी है। युवाओं को उनकी रुचि और क्षमता के अनुसार प्रशिक्षण और अवसर मिलना चाहिए।
स्टार्टअप और स्वरोजगार को बढ़ावा देने पर जोर
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि मजबूत रोजगार व्यवस्था के लिए केवल सरकारी और निजी नौकरियों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। कौशल विकास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप, स्टार्टअप, स्वरोजगार तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को प्रोत्साहन देना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि स्थानीय स्तर पर छोटे उद्योग और उद्यम बड़ी संख्या में रोजगार पैदा कर सकते हैं। युवाओं को अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों से रोजगार
देवनानी ने कहा कि ग्रामीण भारत में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक कौशल और आधुनिक तकनीक का समन्वय करके ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए मॉडल विकसित किए जा सकते हैं।
उन्होंने कृषि प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, स्थानीय उत्पाद, खाद्य प्रसंस्करण, पर्यटन, सेवा क्षेत्र और डिजिटल माध्यमों से जुड़े कार्यों को ग्रामीण रोजगार से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका कहना था कि गांवों के युवाओं को स्थानीय स्तर पर अवसर मिलने से उनकी प्रतिभा का उपयोग वहीं हो सकेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
डिजिटल अर्थव्यवस्था से युवाओं को जोड़ना जरूरी
देवनानी ने कहा कि डिजिटल अर्थव्यवस्था आने वाले समय में रोजगार का महत्वपूर्ण आधार बनने वाली है। डिजिटल सेवाओं, साइबर सुरक्षा, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन सेवाओं और तकनीकी क्षेत्रों में युवाओं के लिए रोजगार तथा स्वरोजगार की संभावनाएं तेजी से विकसित हो रही हैं।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण और छोटे शहरों के युवाओं को भी डिजिटल कौशल उपलब्ध कराने की दिशा में विशेष प्रयास किए जाने चाहिए, ताकि रोजगार के नए अवसर केवल बड़े शहरों तक सीमित न रहें।
महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि रोजगार और आर्थिक विकास में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना आवश्यक है। इसके लिए सुरक्षित एवं अनुकूल कार्य वातावरण, कौशल प्रशिक्षण, उद्यमिता के अवसर और कार्यस्थल से जुड़ी आवश्यक सुविधाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि महिलाओं को रोजगार और उद्यमिता के पर्याप्त अवसर मिलने से परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और व्यापक स्तर पर अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलता है। इसलिए रोजगार नीतियों में महिलाओं की जरूरतों और उनकी भागीदारी को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए।
केंद्र, राज्य, उद्योग और शिक्षा जगत में समन्वय
देवनानी ने कहा कि रोजगार व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों, उद्योग जगत, शैक्षणिक संस्थानों तथा कौशल विकास से जुड़े संगठनों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
उन्होंने कहा कि सरकार रोजगार से संबंधित नीतियां बनाती है, उद्योगों को कुशल मानव संसाधन की आवश्यकता होती है और शिक्षण संस्थान युवाओं को ज्ञान एवं कौशल प्रदान करते हैं। इन तीनों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित होने पर रोजगार व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
राजस्थान में स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप प्रयास
देवनानी ने कहा कि राजस्थान में भी युवाओं के कौशल, उद्यमिता और रोजगार क्षमता को बढ़ाने के लिए स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप प्रयासों को लगातार गति दी जा रही है। प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों की भौगोलिक, आर्थिक और औद्योगिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए रोजगार के अवसरों को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में पर्यटन, कृषि, हस्तशिल्प, खनिज, ऊर्जा, सेवा और अन्य क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं मौजूद हैं। स्थानीय संसाधनों और युवाओं के कौशल को इन क्षेत्रों से जोड़कर रोजगार क्षमता को और मजबूत किया जा सकता है।
रोजगार व्यवस्था बने विकास की केंद्रीय धुरी
देवनानी ने आह्वान किया कि विकसित भारत @2047 के संकल्प को जनभागीदारी के माध्यम से साकार करने के लिए रोजगार को विकास की केंद्रीय धुरी बनाया जाए। ऐसी रोजगार व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है, जो युवाओं की आकांक्षाओं, उद्योगों की जरूरतों और देश की भविष्य की आर्थिक आवश्यकताओं के बीच प्रभावी सेतु का कार्य करे।
उन्होंने कहा कि रोजगार के अवसरों की उपलब्धता के साथ यह भी जरूरी है कि युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप सम्मानजनक कार्य मिले और उन्हें अपनी क्षमताओं को विकसित करने का अवसर प्राप्त हो।
तकनीकी बदलावों के लिए तैयार रहना होगा
उन्होंने कहा कि तकनीकी परिवर्तन को चुनौती के रूप में देखने के बजाय उसे नए अवसरों के रूप में समझने की आवश्यकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन से कुछ पारंपरिक कार्यों का स्वरूप बदल सकता है, लेकिन इसके साथ ही नए प्रकार के कार्य और कौशल की मांग भी उत्पन्न होगी।
ऐसे में युवाओं को तकनीकी बदलावों के प्रति जागरूक करने और उन्हें नए कौशल से लैस करने की आवश्यकता है। शिक्षा व्यवस्था में भी समय के साथ आवश्यक बदलाव किए जाने चाहिए, ताकि युवा भविष्य की अर्थव्यवस्था में प्रभावी भूमिका निभा सकें।
स्थानीय उद्योगों और युवाओं के बीच बने सीधा संबंध
देवनानी ने कहा कि स्थानीय उद्योगों और युवाओं के बीच सीधा संवाद रोजगार व्यवस्था को मजबूत कर सकता है। यदि उद्योग अपनी भविष्य की मानव संसाधन आवश्यकताओं की जानकारी शैक्षणिक एवं कौशल संस्थानों को उपलब्ध कराएं, तो प्रशिक्षण कार्यक्रमों को उसी अनुरूप तैयार किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि इससे प्रशिक्षण और रोजगार के बीच मौजूद अंतर को कम करने में मदद मिलेगी। स्थानीय स्तर पर रोजगार की मांग और उपलब्ध कौशल का नियमित अध्ययन भी इस दिशा में उपयोगी साबित हो सकता है।
विकसित भारत का अर्थ व्यापक अवसर
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि विकसित भारत @2047 केवल आर्थिक विकास का लक्ष्य नहीं है। यह ऐसा भारत बनाने का संकल्प है, जहां प्रत्येक युवा को अपनी प्रतिभा और क्षमता के अनुरूप आगे बढ़ने का अवसर मिले। जहां महिलाएं आर्थिक गतिविधियों में अधिक भागीदारी करें, जहां ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच अवसरों का अंतर कम हो तथा जहां शिक्षा और कौशल रोजगार एवं उद्यमिता से सीधे जुड़े हों।
उन्होंने कहा कि विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब विकास का लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचे और देश के अलग-अलग क्षेत्रों की क्षमताओं का पूरा उपयोग किया जाए।
राष्ट्र प्रथम हमारी जीवन दृष्टि
अपने संबोधन के अंत में देवनानी ने कहा कि “राष्ट्र प्रथम एक नारा ही नहीं है, बल्कि यही हमारी जीवन दृष्टि है।” उन्होंने कहा कि राष्ट्र को सर्वोपरि रखते हुए सामूहिक प्रयास और जनभागीदारी के माध्यम से विकसित भारत के संकल्प को साकार किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि देश की प्रगति केवल सरकारों की योजनाओं से नहीं, बल्कि नागरिकों की सक्रिय भागीदारी, युवाओं की ऊर्जा, महिलाओं के सशक्तिकरण, श्रमिकों के योगदान, उद्यमियों के नवाचार और शिक्षण संस्थानों की भूमिका से संभव होगी। यदि इन सभी शक्तियों को एक दिशा में जोड़ा जाए तो वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित करने के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की जा सकती है।
कार्यशाला में देश के विभिन्न हिस्सों से आए सांसद, विधायक, उद्योग जगत के प्रतिनिधि, शिक्षाविद, कौशल विकास क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ तथा अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम में रोजगार के बदलते स्वरूप, भविष्य के कौशल, शिक्षा और उद्योग के बीच तालमेल, युवाओं के लिए नए अवसर, उद्यमिता, स्टार्टअप और स्थानीय रोजगार क्षमता जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।

