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लोक कल्याण महामंडल विधान में बढ़ रहा श्रद्धालुओं का सैलाब

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बड़ौत,03 सितम्बर  2026  (यूटीएन)। तीर्थंकर बनाने वाले सोलहकारण पर्व महोत्सव के अवसर पर श्री अजितनाथ दिगंबर जैन प्राचीन मंदिर कमेटी के संयोजन में आयोजित आठ दिवसीय लोक कल्याण महामंडल विधान में श्रद्धालुओं की आस्था लगातार बढ़ती जा रही है। विधान के पांचवें दिन अध्यात्म योगी आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में श्रद्धालुओं ने विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना की और विभिन्न धार्मिक भावनाओं के साथ अर्घ्य समर्पित किए।

विधान स्थल पर सुबह से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ भगवान का पूजन किया और मंत्रोच्चार के बीच मंडल पर अर्घ्य समर्पित किए। धार्मिक अनुष्ठानों के चलते पूरा वातावरण भक्तिमय और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत नजर आया।

साधु समाधि भावना के अर्घ्य किए समर्पित

विधान के पांचवें दिन साधु समाधि भावना, वैयावृत्यकरण तथा शक्तिस्तप की भावना के अर्घ्य श्रद्धा एवं भक्ति के साथ समर्पित किए गए। श्रद्धालुओं ने आत्मकल्याण, पुण्यार्जन और जीवन में धर्म एवं संयम की भावना को मजबूत करने के उद्देश्य से विधान में सहभागिता की।

इस दौरान श्रद्धालुओं ने साधु-संतों के त्याग, तपस्या और संयम के प्रति श्रद्धा व्यक्त की। अर्घ्य समर्पण के दौरान मंदिर परिसर में धार्मिक मंत्रों का उच्चारण होता रहा, जिससे वातावरण में आध्यात्मिकता और भक्ति का विशेष संचार दिखाई दिया।

सौधर्म इंद्र का सौभाग्य वीरेंद्र कुमार यश जैन को मिला

विधान में सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य वीरेंद्र कुमार यश जैन खट्टे वालों को प्राप्त हुआ। ब्रह्मचारी गौरव भैया एवं संघस्थ ऋषिका दीदी के निर्देशन में सौधर्म इंद्र द्वारा मंडल पर विधिपूर्वक 32 अर्घ्य समर्पित किए गए।

अर्घ्य समर्पण के दौरान श्रद्धालुओं ने भगवान के समक्ष विभिन्न धार्मिक भावनाओं के साथ अपनी श्रद्धा अर्पित की। इस धार्मिक अनुष्ठान में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर पुण्यार्जन किया।

साधु समाधि भावना सिखाती है विनय और श्रद्धा

इस अवसर पर आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए विभिन्न भावनाओं के आध्यात्मिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि साधु-संतों के प्रति श्रद्धा रखना, उनकी साधना में अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहयोग करना तथा स्वयं तप और संयम के मार्ग पर आगे बढ़ना जीवन को धर्ममय बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है।

उन्होंने कहा कि साधु समाधि भावना हमें संतों के त्याग, संयम और साधना के प्रति विनय एवं श्रद्धा का भाव सिखाती है। साधु-संत अपने जीवन को आत्मकल्याण और धर्म साधना के लिए समर्पित करते हैं। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में संयम, त्याग और सदाचार को स्थान दे सकता है।

सेवा और समर्पण का भाव है वैयावृत्यकरण

आचार्यश्री ने वैयावृत्यकरण की भावना का महत्व बताते हुए कहा कि साधु-संतों की साधना में सहयोग करना केवल बाहरी सेवा नहीं है, बल्कि इसके पीछे विनय, श्रद्धा और आत्मकल्याण की भावना निहित होती है।

उन्होंने कहा कि सेवा तभी सार्थक होती है, जब उसमें अहंकार का भाव न होकर समर्पण और विनय हो। साधु-संतों की आवश्यकताओं में अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहयोग करना और उनकी साधना में सहायक बनना भी धर्म आराधना का महत्वपूर्ण अंग है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जीवन में सेवा की भावना को विकसित करना चाहिए। जरूरतमंदों की सहायता, संतों की सेवा और धर्म के कार्यों में सहयोग व्यक्ति के भीतर विनय एवं करुणा के भाव को मजबूत करता है।

शक्ति के अनुसार तप करने की प्रेरणा

शक्तिस्तप की भावना पर प्रकाश डालते हुए आचार्य श्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार तप और संयम के मार्ग पर आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। तप का उद्देश्य केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त करना है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य की इच्छाएं लगातार बढ़ती रहती हैं। यदि इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रखा जाए तो व्यक्ति सांसारिक मोह-माया में उलझा रहता है। तप और संयम के माध्यम से व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को सीमित करते हुए आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

आचार्यश्री ने कहा कि तप आत्मा की शुद्धि का माध्यम है। अपनी शक्ति के अनुसार किया गया तप भी साधक को आत्मसंयम की ओर ले जाता है। इसलिए तप करते समय किसी प्रकार की प्रतिस्पर्धा या दिखावे की भावना नहीं होनी चाहिए, बल्कि आत्मकल्याण ही उसका उद्देश्य होना चाहिए।

धर्मसभा में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

आचार्यश्री के मंगल प्रवचन सुनने के लिए धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। श्रद्धालुओं ने शांत भाव से प्रवचन का श्रवण किया और धार्मिक शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लिया।

विधान स्थल पर पूजन, मंत्रोच्चार, धार्मिक अनुष्ठान और अर्घ्य समर्पण के चलते वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक बना रहा। श्रद्धालुओं ने भक्ति एवं श्रद्धा के साथ धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लिया।

विधान में शामिल श्रद्धालुओं का कहना था कि इस प्रकार के धार्मिक आयोजन उन्हें आत्मचिंतन, संयम और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। प्रतिदिन होने वाली पूजा-अर्चना और आचार्यश्री के प्रवचनों से श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह दिखाई दे रहा है।

आठ दिवसीय विधान में लगातार बढ़ रही सहभागिता

श्री अजितनाथ दिगंबर जैन प्राचीन मंदिर कमेटी के संयोजन में चल रहे आठ दिवसीय लोक कल्याण महामंडल विधान के प्रत्येक दिन विभिन्न धार्मिक भावनाओं से संबंधित अर्घ्य समर्पित किए जा रहे हैं। जैसे-जैसे विधान आगे बढ़ रहा है, श्रद्धालुओं की सहभागिता भी बढ़ती जा रही है।

मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो जाती है। महिलाएं, पुरुष और युवा श्रद्धालु धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लेकर भगवान की आराधना कर रहे हैं।

शेष दिनों में भी होंगे धार्मिक अनुष्ठान

मीडिया प्रभारी वरदान जैन ने बताया कि लोक कल्याण महामंडल विधान के शेष दिनों में भी विभिन्न भावनाओं के अर्घ्य विधि-विधान के साथ समर्पित किए जाएंगे। उन्होंने श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में विधान में शामिल होकर धर्मलाभ लेने का आह्वान किया।

उन्होंने बताया कि विधान के दौरान श्रद्धालुओं को धार्मिक भावनाओं और उनके आध्यात्मिक महत्व से भी अवगत कराया जा रहा है, ताकि धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ उनके जीवन में भी संयम, सेवा, त्याग और आत्मचिंतन की भावना विकसित हो। इस अवसर पर मुकेश जैन, वरदान जैन, नवीन जैन, प्रदीप जैन, राकेश जैन, अनिल जैन, अंकुर जैन, विकास जैन, ऋषभ जैन, अनुज जैन, संजय जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं समाज के लोग मौजूद रहे।

वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )







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