नई दिल्ली,17 सितम्बर 2026 (यूटीएन)। एसोचैम के प्रेसिडेंट निर्मल के. मिंडा ने बड़े मूल्य वाले मर्चेंट ट्रांजैक्शन के लिए घोषित नए यूपीआई फ्रेमवर्क का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे देश के डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम को लंबे समय के लिए अधिक टिकाऊ आधार मिल सकता है। उनके अनुसार, नए फ्रेमवर्क से पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश, इनोवेशन, साइबर सुरक्षा और डिजिटल भुगतान की स्वीकार्यता को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। साथ ही, यूपीआई व्यवस्था में जुड़े विभिन्न हितधारकों के लिए एक टिकाऊ आर्थिक मॉडल विकसित होने से सेवा की गुणवत्ता और नेटवर्क की क्षमता को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
एसोचैम के अनुसार, यूपीआई देश में डिजिटल भुगतान का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है और इसके बढ़ते इस्तेमाल के साथ पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर, बैंकिंग सिस्टम, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स, एप्लिकेशन प्रोवाइडर्स तथा अन्य तकनीकी सेवाओं पर लगातार निवेश की जरूरत बढ़ रही है। ऐसे में बड़े मूल्य वाले चुनिंदा मर्चेंट लेनदेन के लिए एमडीआर की व्यवस्था इस पूरे इकोसिस्टम के लिए अतिरिक्त राजस्व का आधार तैयार कर सकती है।
आम उपभोक्ता के लिए पी2पी यूपीआई भुगतान रहेगा मुफ्त
नए ढांचे की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि पर्सन-टू-पर्सन यानी पी2पी यूपीआई ट्रांजैक्शन पर कोई एमडीआर नहीं लगाया जाएगा। लेनदेन की राशि कितनी भी हो, व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले यूपीआई भुगतान मुफ्त रहेंगे। वित्त मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया है कि एमडीआर मुख्य रूप से चुनिंदा पर्सन-टू-मर्चेंट यानी पी2एम लेनदेन पर लागू होगा और ग्राहकों से सीधे यह शुल्क लेने की व्यवस्था नहीं है।
इसके अलावा 2,000 रुपये तक के मर्चेंट भुगतान को भी एमडीआर से बाहर रखा गया है। इससे छोटे मूल्य के रोजमर्रा के भुगतान—जैसे सामान्य खरीदारी, स्थानीय दुकानों पर भुगतान और छोटी सेवाओं के लिए किए जाने वाले डिजिटल लेनदेन—पर नए शुल्क ढांचे का सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा।
सरकार के अनुसार, 2,000 रुपये तक के यूपीआई लेनदेन पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शुल्क नहीं लगाया जाएगा। इसका उद्देश्य डिजिटल भुगतान की व्यापक स्वीकार्यता को बनाए रखना और छोटे मूल्य के डिजिटल लेनदेन को पहले की तरह सहज रखना है।
2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट भुगतान पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर
नए फ्रेमवर्क के तहत 2,000 रुपये से अधिक के पात्र पर्सन-टू-मर्चेंट यूपीआई ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत का एमडीआर लागू होगा। हालांकि, बड़े लेनदेन में शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति ट्रांजैक्शन निर्धारित की गई है। 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन के लिए भी एमडीआर 300 रुपये से अधिक नहीं होगा।
उदाहरण के तौर पर, यदि कोई ग्राहक किसी सामान्य व्यापारी को 10,000 रुपये का भुगतान करता है तो 0.4 प्रतिशत के हिसाब से एमडीआर 40 रुपये होगा। 50,000 रुपये के लेनदेन पर यह राशि 200 रुपये होगी, जबकि 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर अधिकतम 300 रुपये की सीमा लागू होगी।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह शुल्क ग्राहक के यूपीआई खाते से अलग से वसूल किए जाने वाला उपभोक्ता शुल्क नहीं है। एमडीआर पेमेंट इकोसिस्टम के भीतर लागू होने वाला मर्चेंट-साइड चार्ज है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि ग्राहकों पर इसे डालने की अनुमति नहीं होगी।
छोटे व्यापारियों को लगातार जीरो एमडीआर का लाभ
नए ढांचे में छोटे व्यापारियों और माइक्रो कारोबारियों के हितों को विशेष सुरक्षा दी गई है। पी2पीएम श्रेणी के तहत यूपीआई क्यूआर कोड के माध्यम से प्रति माह 1 लाख रुपये तक प्राप्त करने वाले पात्र छोटे व्यापारी जीरो एमडीआर व्यवस्था में बने रहेंगे।
इसका सीधा फायदा सड़क किनारे सामान बेचने वाले विक्रेताओं, छोटी दुकानों, स्थानीय कारोबारियों और पड़ोस के छोटे व्यवसायों को मिलेगा। इन व्यापारियों के लिए डिजिटल भुगतान स्वीकार करना अतिरिक्त शुल्क के कारण महंगा न हो, इसका ध्यान नए फ्रेमवर्क में रखा गया है।
इस व्यवस्था से छोटे कारोबारियों के लिए यूपीआई क्यूआर कोड स्वीकार करने की लागत कम बनी रहने की उम्मीद है। ग्रामीण, कस्बाई और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में जहां छोटे व्यापारियों के लिए मार्जिन पहले से सीमित रहता है, वहां यह प्रावधान डिजिटल भुगतान के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
रेलवे, टेलीकॉम, बीमा और ईंधन जैसे क्षेत्रों को विशेष राहत
नए ढांचे में आवश्यक और कम मार्जिन वाले क्षेत्रों के लिए अलग व्यवस्था की गई है। रेलवे, टेलीकॉम, इंश्योरेंस, फ्यूल और कृषि इनपुट जैसे निर्दिष्ट क्षेत्रों में 2,000 रुपये से अधिक के पात्र लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत के बजाय 5 रुपये का फ्लैट एमडीआर रखा गया है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य इन क्षेत्रों में बड़े मूल्य के भुगतान पर प्रतिशत आधारित शुल्क से पैदा होने वाले अपेक्षाकृत अधिक लागत प्रभाव को सीमित करना है। उदाहरण के लिए, किसी पात्र ईंधन या रेलवे भुगतान की राशि 10,000 रुपये हो या उससे अधिक, निर्धारित श्रेणी में एमडीआर फ्लैट 5 रुपये हो सकता है।
सरकार का मानना है कि इससे जरूरी सेवाओं और कम मार्जिन वाले व्यवसायों में डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल जारी रखने में मदद मिलेगी और कारोबारियों को लागत का अनुमान पहले से लगाने में आसानी होगी।
कैपिटल मार्केट में भी अलग शुल्क ढांचा
कैपिटल मार्केट से जुड़े डिजिटल भुगतान के लिए भी अलग एमडीआर व्यवस्था बनाई गई है। म्यूचुअल फंड, सिक्योरिटीज, स्टॉकब्रोकर और डीलर से संबंधित पात्र लेनदेन पर 0.02 प्रतिशत एमडीआर का प्रावधान किया गया है और इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति लेनदेन रखी गई है।
इस अपेक्षाकृत कम दर का उद्देश्य औपचारिक वित्तीय बाजारों में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना और निवेश से जुड़े लेनदेन में यूपीआई की भूमिका को मजबूत करना है। डिजिटल भुगतान की सुविधा बढ़ने से खुदरा निवेशकों और वित्तीय सेवाओं से जुड़े कारोबारियों के लिए भुगतान प्रक्रिया और अधिक सहज हो सकती है।
एमडीआर से पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश को मिल सकता है आधार
एसोचैम का कहना है कि यूपीआई के विस्तार के साथ इसके पीछे काम करने वाले डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को लगातार मजबूत करना जरूरी है। यूपीआई नेटवर्क के संचालन में बैंक, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर, एप्लिकेशन प्रोवाइडर और तकनीकी संस्थाएं शामिल हैं। इन सभी को बेहतर सर्वर क्षमता, साइबर सुरक्षा, फ्रॉड मॉनिटरिंग, ग्राहक सहायता और नेटवर्क विश्वसनीयता के लिए निवेश करना पड़ता है।
नए एमडीआर ढांचे से उत्पन्न राजस्व को पेमेंट इकोसिस्टम के विभिन्न हिस्सों में साझा किए जाने की व्यवस्था है। सरकारी जानकारी के अनुसार, एमडीआर से मिलने वाली राशि पेमेंट इकोसिस्टम के प्रतिभागियों, जिसमें बैंक, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर और यूपीआई एप्लिकेशन प्रोवाइडर शामिल हैं, के बीच साझा होगी।
इससे पेमेंट नेटवर्क की क्षमता बढ़ाने, तकनीकी उन्नयन और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए आर्थिक आधार तैयार हो सकता है।
साइबर सुरक्षा और धोखाधड़ी रोकने में मदद की उम्मीद
डिजिटल भुगतान के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर फ्रॉड भी एक महत्वपूर्ण चुनौती बन चुका है। यूपीआई के जरिए लेनदेन की संख्या और मूल्य बढ़ने के साथ फ्रॉड डिटेक्शन, रिस्क मॉनिटरिंग, ट्रांजैक्शन मॉनिटरिंग और ग्राहक सुरक्षा के लिए तकनीकी निवेश की जरूरत लगातार बढ़ रही है।
एसोचैम का मानना है कि यूपीआई के लिए अधिक टिकाऊ राजस्व मॉडल बनने से पेमेंट कंपनियों और वित्तीय संस्थाओं को सुरक्षा प्रणालियों में अधिक निवेश करने की क्षमता मिल सकती है। इससे संदिग्ध लेनदेन की पहचान, रियल टाइम मॉनिटरिंग और ग्राहक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में तकनीकी सुधार को बढ़ावा मिल सकता है।
हालांकि, एमडीआर अपने आप में धोखाधड़ी को समाप्त करने की गारंटी नहीं देता। फ्रॉड रोकने के लिए मजबूत साइबर सुरक्षा, ग्राहक जागरूकता, बैंकिंग नियंत्रण और त्वरित शिकायत निवारण भी जरूरी होंगे।
ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में यूपीआई विस्तार पर जोर
नए फ्रेमवर्क में कुल एमडीआर कलेक्शन का 5 प्रतिशत हिस्सा एक विशेष फंड के लिए निर्धारित किए जाने का प्रावधान भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका उद्देश्य छोटे व्यापारियों के बीच यूपीआई को बढ़ावा देना और देश के ऐसे क्षेत्रों में डिजिटल भुगतान की पहुंच बढ़ाना है जहां अभी भी नकद भुगतान की भूमिका महत्वपूर्ण है।
ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में किराना दुकानों, छोटे व्यापारियों, सड़क किनारे कारोबारियों, स्थानीय सेवा प्रदाताओं और अन्य माइक्रो व्यवसायों के बीच क्यूआर आधारित भुगतान को बढ़ावा देने में इस फंड का इस्तेमाल किया जा सकता है।
इससे डिजिटल भुगतान केवल बड़े शहरों और संगठित कारोबार तक सीमित न रहकर छोटे कस्बों और गांवों तक और अधिक व्यापक रूप से पहुंच सकता है।
रोजमर्रा के छोटे भुगतान पर सीमित प्रभाव
नए फ्रेमवर्क का एक प्रमुख उद्देश्य यह है कि छोटे मूल्य के अधिकांश डिजिटल भुगतान सामान्य रूप से जारी रहें। 2,000 रुपये तक के मर्चेंट भुगतान को जीरो एमडीआर व्यवस्था में रखने से रोजमर्रा की खरीदारी करने वाले उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों पर सीधे शुल्क का प्रभाव सीमित रहेगा।
इसके अलावा व्यक्ति से व्यक्ति के बीच यूपीआई ट्रांसफर पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा। यानी किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति को पैसे भेजने के लिए लेनदेन राशि के आधार पर एमडीआर नहीं देना होगा।
इससे यूपीआई के उस मूल उपयोग को बनाए रखने में मदद मिल सकती है जिसने इसे देश में तेजी से लोकप्रिय बनाया है।
डिजिटल भुगतान के अगले चरण की तैयारी
एसोचैम के अनुसार, भारत का डिजिटल भुगतान क्षेत्र अब केवल लेनदेन की संख्या बढ़ाने के चरण में नहीं है, बल्कि अगली चुनौती एक ऐसे इकोसिस्टम का निर्माण करना है जो लंबे समय तक आर्थिक और तकनीकी रूप से टिकाऊ रह सके।
यूपीआई के व्यापक विस्तार के साथ पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर की क्षमता, सर्वर और नेटवर्क अपटाइम, साइबर सुरक्षा, फ्रॉड प्रिवेंशन, ग्राहक सहायता तथा नए डिजिटल उत्पादों के विकास में लगातार निवेश आवश्यक होगा।
नए एमडीआर मॉडल को इसी व्यापक बदलाव की दिशा में एक कदम के रूप में देखा जा सकता है। इसका उद्देश्य बड़े और चुनिंदा कारोबारी लेनदेन से मिलने वाले राजस्व के माध्यम से डिजिटल भुगतान के बुनियादी ढांचे को आर्थिक समर्थन देना है, जबकि छोटे व्यापारियों और आम उपभोक्ताओं के लिए मुफ्त भुगतान की सुविधा को बड़े स्तर पर बरकरार रखना है।
व्यापार जगत में संतुलित व्यवस्था की उम्मीद
एसोचैम का कहना है कि नए ढांचे में सरकार ने उपभोक्ताओं, छोटे व्यापारियों और डिजिटल भुगतान उद्योग के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है। एक तरफ बड़े मूल्य के चुनिंदा मर्चेंट लेनदेन से पेमेंट इकोसिस्टम को राजस्व मिलेगा, वहीं दूसरी तरफ छोटे कारोबारियों और आम लोगों को व्यापक छूट दी गई है।
एसोचैम के प्रेसिडेंट निर्मल के. मिंडा के मुताबिक, इस प्रकार का संतुलित मॉडल यूपीआई की अगली विकास यात्रा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। इससे भुगतान प्रणाली में निवेश के नए अवसर पैदा होने, तकनीकी नवाचार बढ़ने और डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने वाले कारोबारियों का नेटवर्क विस्तारित होने की संभावना है।
यूपीआई के लिए टिकाऊ मॉडल बनाने की दिशा में कदम
भारत में यूपीआई ने डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में बड़ा बदलाव किया है। छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों तक क्यूआर कोड और मोबाइल आधारित भुगतान सामान्य व्यवहार का हिस्सा बन चुके हैं। अब चुनौती इस व्यवस्था को बड़े पैमाने पर सुरक्षित, तेज और आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाए रखने की है।
नए एमडीआर फ्रेमवर्क में इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग श्रेणियों के लिए अलग शुल्क निर्धारित किए गए हैं। आम व्यक्ति से व्यक्ति भुगतान को पूरी तरह मुफ्त रखा गया है, 2,000 रुपये तक के मर्चेंट भुगतान को एमडीआर से बाहर रखा गया है, छोटे व्यापारियों के लिए जीरो एमडीआर सुरक्षा दी गई है और आवश्यक सेवाओं के लिए फ्लैट शुल्क का प्रावधान किया गया है।
एसोचैम के अनुसार, इससे यूपीआई के लिए कमाई का एक ऐसा आधार तैयार हो सकता है जो पेमेंट नेटवर्क के विस्तार, तकनीकी उन्नयन और सुरक्षा में निवेश को बढ़ावा दे। साथ ही, डिजिटल भुगतान की पहुंच को देश के दूरदराज और छोटे बाजारों तक ले जाने में भी मदद मिल सकती है।
15 अक्टूबर से लागू होगा नया ढांचा
नए एमडीआर फ्रेमवर्क को 15 अक्टूबर 2026 से लागू किए जाने की जानकारी दी गई है। इसके तहत ग्राहकों के लिए यूपीआई के सामान्य इस्तेमाल को मुफ्त बनाए रखने पर जोर है, जबकि चुनिंदा बड़े मूल्य वाले मर्चेंट भुगतान को शुल्क व्यवस्था में शामिल किया गया है।
इस तरह यूपीआई व्यवस्था में बदलाव का मूल फोकस रोजमर्रा के छोटे डिजिटल भुगतानों पर शुल्क लगाने के बजाय बड़े और पात्र कारोबारी लेनदेन से पेमेंट इकोसिस्टम के लिए टिकाऊ आर्थिक मॉडल तैयार करना है।
एसोचैम का मानना है कि यदि इस व्यवस्था से प्राप्त संसाधनों का प्रभावी इस्तेमाल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर, साइबर सुरक्षा, फ्रॉड रोकथाम, तकनीकी नवाचार और ग्रामीण डिजिटल विस्तार में किया जाता है, तो इससे भारत के डिजिटल भुगतान तंत्र को अगले चरण में ले जाने में मदद मिल सकती है।
कुल मिलाकर, नया एमडीआर फ्रेमवर्क यूपीआई के लिए एक ऐसे मॉडल की दिशा में बदलाव को दर्शाता है जिसमें डिजिटल भुगतान की व्यापक पहुंच को बनाए रखते हुए पेमेंट इकोसिस्टम की आर्थिक स्थिरता पर भी ध्यान दिया जा रहा है। छोटे व्यापारियों और आम उपभोक्ताओं को राहत देते हुए बड़े मूल्य के चुनिंदा मर्चेंट लेनदेन से संसाधन जुटाने की यह व्यवस्था आने वाले समय में यूपीआई के इंफ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षा और स्वीकार्यता को किस हद तक मजबूत करती है, इसका आकलन इसके लागू होने के बाद इसके वास्तविक प्रभाव के आधार पर किया जा सकेगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।

