नई दिल्ली, 08 जून 2026 (यूटीएन)। प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील उत्तराखंड ने एक बार फिर पूरी दुनिया के सामने अपनी आपदा प्रबंधन क्षमता का दम दिखाया है। ओडिशा के पुरी में आयोजित ब्रिक्स आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्य समूह की बैठक में उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन मॉडल की जमकर सराहना हुई। खास बात यह रही कि उत्तरकाशी के सिलक्यारा टनल रेस्क्यू ऑपरेशन और धराली आपदा राहत अभियान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उदाहरण के तौर पर पेश किया गया। कठिन पहाड़ी इलाकों में एसडीआरएफ और दूसरी एजेंसियों के काम को दुनिया भर के प्रतिनिधियों ने सराहा।
*ब्रिक्स सम्मेलन में उत्तराखंड मॉडल का खास जिक्र?*
भारत की अध्यक्षता में 3 से 5 जून तक पुरी में आयोजित ब्रिक्स डीआरआर कार्य समूह की दूसरी तकनीकी बैठक में 11 देशों के विशेषज्ञ शामिल हुए। इसमें ब्राजील, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी शामिल थे। सम्मेलन में उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व एसडीआरएफ सेनानायक अर्पण यदुवंशी और यूएलएमएमसी निदेशक शान्तनु सरकार ने किया। अधिकारियों ने उत्तराखंड में चलाए गए राहत और बचाव अभियानों की विस्तार से जानकारी दी। वैश्विक प्रतिनिधियों ने कहा कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में उत्तराखंड ने जिस तरह तेज और समन्वित कार्रवाई की, वह दूसरे देशों के लिए भी सीख है।
*धराली आपदा में कैसे बचाई गई सैकड़ों लोगों की जान?*
उत्तरकाशी जिले के गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित धराली कस्बे में 5 अगस्त 2025 को बादल फटने के बाद भारी तबाही आई थी। खीर गंगा नदी में अचानक भारी मलबा आने से पूरा इलाका प्रभावित हो गया था। कई घर, सड़कें और स्थानीय ढांचे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। इसके बाद एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, सेना, आईटीबीपी और वायुसेना ने मिलकर बड़े स्तर पर राहत अभियान चलाया। कठिन मौसम और टूटे रास्तों के बावजूद सैकड़ों लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया। सम्मेलन में इस अभियान को तेज प्रतिक्रिया और मानव संवेदनशीलता का बड़ा उदाहरण बताया गया।
*सिलक्यारा टनल रेस्क्यू बना दुनिया में चर्चा का विषय?*
उत्तरकाशी जिले की सिलक्यारा-बड़कोट सुरंग में 12 नवंबर 2023 को भूस्खलन के बाद बड़ा हादसा हुआ था। सुरंग के अंदर 41 मजदूर फंस गए थे। यह सुरंग चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना का हिस्सा है और इसकी लंबाई करीब 4.5 किलोमीटर है। मजदूरों को निकालने के लिए 17 दिन तक लगातार राहत और बचाव अभियान चलाया गया। कई एजेंसियों ने मिलकर मशीनों और आधुनिक तकनीक की मदद से सुरंग में रास्ता बनाया। आखिरकार सभी मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। इस अभियान को दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण रेस्क्यू ऑपरेशनों में से एक माना गया।
*तकनीक और समन्वय की हुई तारीफ?*
सम्मेलन में मौजूद विशेषज्ञों ने कहा कि उत्तराखंड ने दिखा दिया कि कठिन पहाड़ी राज्यों में भी बेहतर तकनीक और एजेंसियों के तालमेल से बड़े संकटों से निपटा जा सकता है। एसडीआरएफ सेनानायक अर्पण यदुवंशी ने कहा कि राज्य में जोखिम कम करने, वैज्ञानिक योजना बनाने और अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वय मजबूत करने पर लगातार काम हो रहा है। वहीं आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन के निर्देशन में चल रही गतिविधियों का जिक्र करते हुए निदेशक शान्तनु सरकार ने बताया कि उत्तराखंड में पूर्व चेतावनी प्रणाली को और मजबूत बनाया जा रहा है ताकि भविष्य में नुकसान कम किया जा सके।
*दुनिया के लिए मॉडल बन रहा है उत्तराखंड?*
ब्रिक्स देशों के प्रतिनिधियों ने माना कि उत्तराखंड ने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद जिस तरह राहत अभियान चलाए, वह पूरी दुनिया के लिए एक प्रभावी मॉडल बन सकता है। सम्मेलन में यह भी कहा गया कि आपदा के समय केवल तकनीक ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक समन्वय और मानवीय दृष्टिकोण भी बेहद जरूरी होता है। उत्तराखंड के अनुभवों को दूसरे देशों के सामने एक केस स्टडी की तरह प्रस्तुत किया गया। इससे भारत की आपदा प्रबंधन क्षमता को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।

