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ब्रिक्स का बदलता स्वरूप और भारत की बढ़ती भूमिका

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नई दिल्ली, 10 सितम्बर  2026  (यूटीएन)। ब्रिक्स की कहानी केवल सदस्य देशों की बढ़ती संख्या की कहानी नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन में हो रहे बदलाव का भी संकेत है। शुरुआत में जिन देशों को तेज आर्थिक विकास की संभावनाओं वाली अर्थव्यवस्थाओं के रूप में देखा गया था, वे धीरे-धीरे वैश्विक निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण साझेदार बन गए। आज ब्रिक्स के एजेंडे में आर्थिक सहयोग के साथ-साथ वैश्विक शासन, विकास, ऊर्जा, जलवायु, तकनीक, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे विषय शामिल हैं।

भारत के लिए ब्रिक्स का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि यह ऐसा मंच है जहां पश्चिमी देशों के साथ संबंधों को बनाए रखते हुए रूस, चीन, ईरान और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ भी संवाद किया जा सकता है। यही भारत की बहुपक्षीय और संतुलित विदेश नीति की एक प्रमुख विशेषता है।

आर्थिक शक्ति से आगे बढ़कर रणनीतिक मंच

ब्रिक्स को लंबे समय तक मुख्य रूप से आर्थिक सहयोग का मंच माना जाता रहा, लेकिन बदलती वैश्विक परिस्थितियों ने इसके स्वरूप को व्यापक बनाया है। विश्व अर्थव्यवस्था में उभरते देशों की हिस्सेदारी बढ़ने के साथ इन देशों की यह इच्छा भी मजबूत हुई है कि वैश्विक आर्थिक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उनकी आवाज अधिक प्रभावी हो।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और अन्य वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व और निर्णय प्रक्रिया में सुधार का मुद्दा इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। ब्रिक्स सदस्य देशों का मानना है कि वैश्विक संस्थाओं की संरचना को वर्तमान आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।

न्यू डेवलपमेंट बैंक बना सहयोग का महत्वपूर्ण आधार

ब्रिक्स के संस्थागत विकास की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थापना को माना जाता है। इसका उद्देश्य सदस्य देशों और अन्य विकासशील देशों में बुनियादी ढांचे तथा सतत विकास परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराना है।

यह पहल इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि विकासशील देशों को अपनी विकास प्राथमिकताओं के लिए वित्तीय संसाधनों के वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध हों। परिवहन, स्वच्छ ऊर्जा, जल प्रबंधन, शहरी विकास और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में इस प्रकार का सहयोग भविष्य में और महत्वपूर्ण हो सकता है।

कंटिंजेंट रिजर्व अरेंजमेंट का महत्व

ब्रिक्स के वित्तीय सहयोग का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू कंटिंजेंट रिजर्व अरेंजमेंट है। इसका उद्देश्य सदस्य देशों को वित्तीय दबाव या भुगतान संतुलन से जुड़ी परिस्थितियों में सहायता देने के लिए एक सुरक्षा तंत्र उपलब्ध कराना है।

वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ने के समय विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए ऐसी व्यवस्थाएं विशेष महत्व रखती हैं। इससे ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच वित्तीय सहयोग की संस्थागत क्षमता मजबूत होती है।

स्थानीय मुद्राओं में कारोबार पर बढ़ता जोर

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर की भूमिका लंबे समय से प्रमुख रही है। हालांकि हाल के वर्षों में कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने सीमा-पार व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के उपयोग और भुगतान व्यवस्था को अधिक सुविधाजनक बनाने पर जोर दिया है।

ब्रिक्स के भीतर भी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान के विकल्पों को लेकर चर्चा बढ़ी है। इसका उद्देश्य किसी एक मुद्रा को तत्काल हटाना नहीं, बल्कि सदस्य देशों के बीच व्यापार को अधिक सुविधाजनक बनाना और भुगतान व्यवस्था में विविधता बढ़ाना है।

भारत के लिए यह विषय विशेष महत्व रखता है, क्योंकि वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के अनुरूप वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में विभिन्न विकल्पों को खुला रखना चाहता है।

विस्तार के बाद ब्रिक्स के सामने नई चुनौती

ब्रिक्स के विस्तार ने संगठन की ताकत बढ़ाई है, लेकिन इसके साथ नई चुनौतियां भी सामने आई हैं। पहले अपेक्षाकृत कम देशों के बीच सहमति बनाना आसान था। अब समूह में अलग-अलग क्षेत्रों, राजनीतिक व्यवस्थाओं और आर्थिक हितों वाले देशों की संख्या बढ़ गई है।

किसी भी संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर सभी देशों का एक जैसा दृष्टिकोण होना संभव नहीं है। इसलिए ब्रिक्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि विविध हितों के बावजूद साझा एजेंडा कैसे तैयार किया जाए।

भारत की अध्यक्षता में इस चुनौती का महत्व और बढ़ जाता है। भारत को विभिन्न देशों की प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाते हुए ऐसा एजेंडा तैयार करना होगा जो व्यापक रूप से स्वीकार्य हो।

ग्लोबल साउथ के लिए आवाज बनने की कोशिश

भारत लगातार ग्लोबल साउथ के मुद्दों को वैश्विक मंचों पर उठाता रहा है। विकासशील देशों के सामने आज भी गरीबी, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा उपलब्धता, जलवायु वित्त, तकनीकी असमानता और विकास के लिए वित्तीय संसाधनों की कमी जैसी समस्याएं मौजूद हैं।

ब्रिक्स इन देशों की सामूहिक आवाज को मजबूत करने का मंच बन सकता है। भारत की कोशिश हो सकती है कि ब्रिक्स की गतिविधियां केवल सदस्य देशों तक सीमित न रहें, बल्कि व्यापक विकासशील विश्व के लिए भी उपयोगी साबित हों।

यही कारण है कि भारत की अध्यक्षता में विकास, क्षमता निर्माण, तकनीकी सहयोग और सतत विकास को प्राथमिकता दिए जाने का विशेष महत्व है।

तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बढ़ता महत्व

21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था में तकनीक निर्णायक भूमिका निभा रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, साइबर सुरक्षा, डेटा और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्र भविष्य की आर्थिक प्रतिस्पर्धा को निर्धारित करेंगे।

भारत ने डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में महत्वपूर्ण अनुभव विकसित किया है। ब्रिक्स देशों के बीच ऐसे अनुभवों का आदान-प्रदान डिजिटल समावेशन और तकनीकी क्षमता बढ़ाने में मदद कर सकता है।

साथ ही, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार और सुरक्षित उपयोग को लेकर भी साझा नियमों तथा सहयोग की आवश्यकता बढ़ रही है। ब्रिक्स इस क्षेत्र में नीति संवाद का महत्वपूर्ण मंच बन सकता है।

ऊर्जा सुरक्षा भी साझा प्राथमिकता

ब्रिक्स में तेल और गैस उत्पादक देशों के साथ-साथ बड़ी ऊर्जा खपत वाली अर्थव्यवस्थाएं भी शामिल हैं। इसलिए ऊर्जा सुरक्षा इस समूह के लिए स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण मुद्दा है।

तेल और गैस की स्थिर आपूर्ति, नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण, स्मार्ट ग्रिड और हरित ऊर्जा परिवर्तन जैसे विषयों पर सदस्य देशों के बीच सहयोग की व्यापक संभावनाएं हैं।

भारत की तेजी से बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए यह क्षेत्र उसकी दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति के लिए भी महत्वपूर्ण है।

जलवायु परिवर्तन पर संतुलित दृष्टिकोण

विकासशील देशों के लिए जलवायु परिवर्तन की चुनौती दोहरी है। एक ओर उन्हें उत्सर्जन कम करने के वैश्विक प्रयासों में योगदान देना है, वहीं दूसरी ओर विकास की अपनी जरूरतों को भी पूरा करना है।

ब्रिक्स के भीतर जलवायु वित्त, स्वच्छ ऊर्जा, हरित तकनीक और जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे पर सहयोग बढ़ाया जा सकता है। भारत का जोर इस बात पर रह सकता है कि विकासशील देशों को हरित परिवर्तन के लिए पर्याप्त वित्त और तकनीक उपलब्ध हो।

खाद्य सुरक्षा और कृषि सहयोग

ब्रिक्स के सदस्य देशों की बड़ी आबादी और कृषि क्षेत्र में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए खाद्य सुरक्षा भी अहम विषय है। जलवायु परिवर्तन, जल संकट और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान कृषि उत्पादन पर असर डाल सकते हैं।

प्राकृतिक और जैविक खेती, कृषि अनुसंधान, बीज और कृषि तकनीक, डिजिटल कृषि तथा किसानों की क्षमता बढ़ाने जैसे क्षेत्रों में सहयोग से सदस्य देशों को लाभ हो सकता है।

भारत कृषि अनुसंधान और डिजिटल कृषि के अपने अनुभव को साझा करते हुए इस क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है।

स्वास्थ्य सहयोग का नया आयाम

कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक स्वास्थ्य संकट किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं रहते। वैक्सीन, दवाओं, स्वास्थ्य तकनीक, अनुसंधान और महामारी की निगरानी में अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है।

ब्रिक्स देशों के बीच स्वास्थ्य अनुसंधान, चिकित्सा शिक्षा, डिजिटल स्वास्थ्य और महामारी से निपटने की क्षमता बढ़ाने के लिए सहयोग भविष्य में और मजबूत हो सकता है।

भारत के लिए यह क्षेत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह दवाओं और स्वास्थ्य सेवाओं की वैश्विक आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

एमएसएमई और स्टार्टअप सहयोग से रोजगार को बढ़ावा

ब्रिक्स देशों की अर्थव्यवस्थाओं में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों की बड़ी भूमिका है। एमएसएमई रोजगार पैदा करने, स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और निर्यात बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

यदि ब्रिक्स देशों के एमएसएमई को एक-दूसरे के बाजारों तक बेहतर पहुंच मिले, तो इससे व्यापार और निवेश के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। स्टार्टअप, नवाचार और नई तकनीक के क्षेत्र में सहयोग भी युवाओं के लिए रोजगार और उद्यमिता के अवसर बढ़ा सकता है।

भारत की बड़ी स्टार्टअप अर्थव्यवस्था इस क्षेत्र में अपने अनुभव साझा कर सकती है।

युवा और खेल कूटनीति

ब्रिक्स का भविष्य केवल सरकारों और संस्थानों के बीच सहयोग से तय नहीं होगा। युवाओं की भागीदारी भी इसकी दीर्घकालिक सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।

युवा आदान-प्रदान, शिक्षा, कौशल विकास, खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से सदस्य देशों की नई पीढ़ी एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझ सकती है। इससे लोगों के बीच संपर्क बढ़ेगा और दीर्घकालिक सहयोग की नींव मजबूत होगी।

खेल तकनीक, प्रशिक्षण और खेल विज्ञान के क्षेत्र में सहयोग भी ब्रिक्स के नए क्षेत्रों में से एक बन सकता है।

ब्रिक्स के सामने सबसे बड़ी परीक्षा—सहमति

ब्रिक्स जितना बड़ा और विविध समूह बनता जा रहा है, उतनी ही बड़ी चुनौती सर्वसम्मति कायम करने की होगी। आर्थिक और विकास संबंधी विषयों पर सहयोग अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन भू-राजनीतिक मुद्दों पर सदस्य देशों के मत अलग हो सकते हैं।

रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया की स्थिति, वैश्विक व्यापार, प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर अलग-अलग देशों के राष्ट्रीय हित अलग हैं।

इसलिए ब्रिक्स की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होगा कि वह कितने मुद्दों पर साझा बयान जारी करता है, बल्कि यह भी होगा कि वह मतभेदों के बावजूद संवाद की प्रक्रिया को कितना मजबूत रख पाता है।

भारत के लिए कूटनीतिक अवसर

भारत की 2026 की अध्यक्षता ऐसे समय में हो रही है जब दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। अमेरिका, चीन, रूस, यूरोप और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के बीच संबंध लगातार बदल रहे हैं।

इस परिस्थिति में भारत की भूमिका एक ऐसे देश की हो सकती है जो अलग-अलग शक्ति केंद्रों के बीच संवाद का पुल बनाए। ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत को यही अवसर देती है।

भारत को एक ओर समूह के भीतर सहमति बनानी होगी, दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना होगा कि ब्रिक्स का मंच किसी एक देश या किसी एक भू-राजनीतिक धड़े के खिलाफ मंच के रूप में न देखा जाए।

ब्रिक्स का भविष्य सदस्यता से अधिक परिणामों पर निर्भर

आने वाले वर्षों में ब्रिक्स की वास्तविक ताकत केवल उसके सदस्य देशों की संख्या से तय नहीं होगी। उसकी विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने निर्णयों को कितनी प्रभावी तरीके से लागू कर पाता है।

यदि सदस्य देश व्यापार, वित्त, ऊर्जा, तकनीक, स्वास्थ्य, शिक्षा और जलवायु के क्षेत्रों में ठोस परियोजनाएं आगे बढ़ाते हैं, तो ब्रिक्स का प्रभाव और मजबूत होगा।

इसके विपरीत यदि समूह केवल घोषणाओं और बैठकों तक सीमित रहता है तो उसकी संस्थागत प्रभावशीलता पर सवाल उठ सकते हैं।

भारत की प्राथमिकता—बातचीत से परिणाम तक

भारत की अध्यक्षता का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही हो सकता है कि बहुपक्षीय सहयोग केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए सदस्य देशों को व्यावहारिक परियोजनाओं और साझा पहलों पर आगे बढ़ना होगा।

भारत जिस प्रकार डिजिटल तकनीक, सतत विकास, स्वास्थ्य, कृषि, कौशल, शहरी विकास और ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है, वह ब्रिक्स को परिणामोन्मुख बनाने की दिशा में कदम है।

नई वैश्विक व्यवस्था में ब्रिक्स की भूमिका

दुनिया में शक्ति का आर्थिक और राजनीतिक केंद्र तेजी से बदल रहा है। एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका की अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक विकास में बड़ी भूमिका निभा रही हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों के देशों की सामूहिक आवाज को महत्व मिलना स्वाभाविक है।

ब्रिक्स इस बदलाव का संस्थागत प्रतिबिंब बन सकता है। यह पश्चिमी संस्थाओं का विकल्प बनने के बजाय वैश्विक शासन व्यवस्था में अधिक विविधता और प्रतिनिधित्व की मांग को मजबूत करने वाला मंच भी बन सकता है।

भारत की चौथी अध्यक्षता क्यों महत्वपूर्ण

भारत पहले भी तीन बार ब्रिक्स की अध्यक्षता कर चुका है। लेकिन 2026 की अध्यक्षता पहले की तुलना में अलग परिस्थितियों में हो रही है। समूह का विस्तार हो चुका है, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव बढ़ा है और सदस्य देशों की संख्या तथा विविधता दोनों बढ़ी हैं।

ऐसे समय में भारत की जिम्मेदारी केवल सम्मेलन आयोजित करने की नहीं, बल्कि समूह के भीतर संवाद, सहमति और व्यावहारिक सहयोग को दिशा देने की है।

भारत यदि विभिन्न मतभेदों के बावजूद साझा एजेंडे पर सदस्य देशों को साथ लाने में सफल होता है तो यह उसकी कूटनीतिक क्षमता का महत्वपूर्ण प्रदर्शन होगा।

निष्कर्ष: संवाद, सहयोग और साझा विकास की दिशा

ब्रिक्स का सफर एक आर्थिक अवधारणा से शुरू होकर एक व्यापक बहुपक्षीय मंच तक पहुंच चुका है। आज इसके सामने अवसर भी बड़े हैं और चुनौतियां भी। बढ़ती सदस्यता इसे अधिक प्रभावशाली बनाती है, लेकिन विविध हितों के कारण सहमति बनाना कठिन भी करती है।

भारत की 2026 की अध्यक्षता ऐसे दौर में हो रही है जब दुनिया को टकराव के बजाय संवाद, प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग और विकास के साथ सततता की जरूरत है।

भारत का लक्ष्य ब्रिक्स को एक ऐसे मंच के रूप में आगे बढ़ाना है जहां उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपनी सामूहिक आवाज रख सकें, साझा चुनौतियों के समाधान तलाश सकें और वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने में योगदान दे सकें।

नई दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इसी व्यापक यात्रा का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव होगा। इसकी सफलता इस बात से तय होगी कि भारत कितनी मजबूती से अलग-अलग हितों वाले देशों को एक साझा दृष्टिकोण के करीब ला पाता है और कितने ठोस परिणाम सामने आते हैं।

ब्रिक्स का भविष्य केवल इसके विस्तार में नहीं, बल्कि सहयोग को परिणाम में बदलने की क्षमता में छिपा है। भारत की नेतृत्वकारी भूमिका इस परिवर्तन को दिशा देने में निर्णायक साबित हो सकती है।

विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।






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