बड़ौत,10 सितम्बर 2026 (यूटीएन)। नगर में ससंघ चातुर्मास कर रहे आचार्यश्री आर्जव सागर ने श्री अजितनाथ सभागार में आयोजित प्रवचन में श्रद्धालुओं को भौतिक सुख-सुविधाओं, संग्रह और परिग्रह से दूर रहते हुए त्याग एवं आत्मशांति के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जितना अधिक भौतिक वस्तुओं का संग्रह करता जाता है, उतनी ही उसकी चिंताएं और अशांति बढ़ती जाती हैं। वास्तविक सुख बाहरी संपत्ति में नहीं, बल्कि आत्मा की शांति में निहित है।
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य जीवनभर धन, मकान, वाहन और अन्य भौतिक संसाधन जुटाने में लगा रहता है। उसे लगता है कि अधिक से अधिक संपत्ति हासिल करने के बाद उसे सुख और शांति मिलेगी, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। जितना अधिक संग्रह बढ़ता है, उतनी ही उसकी सुरक्षा, रखरखाव और उसे खोने की चिंता भी बढ़ जाती है। इस प्रकार भौतिक संपदा सुख देने के बजाय तनाव और चिंता का कारण बन जाती है।
अपार वैभव के बाद भी भगवान ने अपनाया त्याग
उन्होंने कहा कि यदि अधिकाधिक भौतिक संपदा जुटाने या उसकी सुरक्षा करने में ही सच्ची शांति होती तो भगवान आदिनाथ और भगवान शांतिनाथ जैसे वैभवशाली जीव मोक्ष का पुरुषार्थ करने के लिए जंगल की ओर क्यों जाते? उनके पास अपार संपदा और वैभव था, लेकिन जब उन्हें यह बोध हुआ कि सांसारिक वैभव मुक्ति के मार्ग में बाधक बन सकता है, तब उन्होंने राग और परिग्रह का त्याग कर दिया।
उन्होंने श्रद्धालुओं को समझाते हुए कहा कि जिन महापुरुषों ने रत्नों से सजे महलों तक का त्याग कर दिया, उनके जीवन से हमें प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके पास मौजूद संपत्ति से नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद आत्मिक गुणों से होती है।
संग्रह बढ़ेगा तो चिंता भी बढ़ेगी
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य जितना अधिक संग्रह करता है, उतना ही उसके भीतर उसे बनाए रखने और बचाने का मोह बढ़ता जाता है। यही मोह धीरे-धीरे चिंता का रूप ले लेता है। धन-संपत्ति बढ़ने के साथ उसे खोने का भय भी बढ़ सकता है। ऐसे में व्यक्ति बाहर से सुविधासंपन्न दिखाई देता है, लेकिन भीतर से मानसिक तनाव में घिरा रह सकता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को यह विचार करना चाहिए कि जिन सांसारिक वस्तुओं को वह अपना समझकर जीवनभर जुटाता है, उन्हें एक दिन यहीं छोड़कर जाना है। जब अंतिम समय में इनमें से कोई वस्तु साथ नहीं जाएगी तो फिर पूरे जीवन को इनके पीछे लगाने का औचित्य क्या है?
आत्मशांति ही सच्चे सुख का आधार
आचार्यश्री आर्जव सागर ने कहा कि जब आत्मा में शांति होती है, तभी वास्तविक सुख की अनुभूति होती है। बाहरी सुख क्षणिक होते हैं और परिस्थितियों के बदलने के साथ समाप्त भी हो सकते हैं, लेकिन आत्मिक शांति मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाती है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य सुविधाओं के पीछे तेजी से भाग रहा है। बेहतर कार, बड़ा मकान, अधिक संपत्ति और अधिक से अधिक साधन जुटाने की होड़ लगी हुई है। इन सबको हासिल करने के लिए वह अपने जीवन का बहुमूल्य समय खर्च कर देता है। ऐसे में उसे स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि क्या इन सुविधाओं ने वास्तव में उसके जीवन में स्थायी शांति पैदा की है?
त्याग एक दिन में नहीं, धीरे-धीरे भी संभव
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को व्यावहारिक संदेश देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति एक साथ सभी सांसारिक वस्तुओं का त्याग नहीं कर सकता तो उसे निराश होने की आवश्यकता नहीं है। वह धीरे-धीरे अपनी आवश्यकताओं और संग्रह को कम करने का प्रयास कर सकता है।
उन्होंने कहा कि शनैः-शनैः सांसारिक वस्तुओं का मोह कम करने से इच्छा की भूख भी कम होने लगेगी। जब मनुष्य अपनी जरूरत और इच्छा के बीच अंतर समझने लगेगा तो उसके भीतर त्याग की भावना मजबूत होगी। इसी क्रम में आगे चलकर पूर्ण त्याग की भावना भी जागृत हो सकती है।
जरूरत और इच्छा में अंतर समझें
आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में सुखी रहने के लिए यह समझना जरूरी है कि वास्तव में हमें कितनी वस्तुओं की आवश्यकता है और कितनी वस्तुएं केवल इच्छा के कारण हमारे जीवन का हिस्सा बन रही हैं। आवश्यकता सीमित होती है, जबकि इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है।
उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य इच्छाओं के पीछे लगातार भागता रहेगा तो उसे कभी स्थायी संतोष नहीं मिल सकता। इसके विपरीत, अपनी आवश्यकताओं को सीमित करके और दूसरों के हित के बारे में सोचकर जीवन को अधिक शांत और सार्थक बनाया जा सकता है।
त्याग से मोह का होता है क्षय
उन्होंने कहा कि त्याग का अर्थ केवल भौतिक वस्तुओं को छोड़ देना नहीं है। वास्तविक त्याग मन के भीतर के मोह, राग और आसक्ति को कम करने से शुरू होता है। जब मनुष्य वस्तुओं के प्रति अपनी आसक्ति कम करता है तो उसके भीतर स्वतंत्रता और शांति की अनुभूति बढ़ती है।
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में संयम और संतुलन को स्थान देना चाहिए। भौतिक संसाधनों का उपयोग आवश्यकता के अनुसार किया जाए, लेकिन उन्हें जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने भीतर त्याग, संयम और संतोष के भाव को विकसित करें। संसार में रहते हुए भी मनुष्य अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रख सकता है और धीरे-धीरे आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ सकता है।
जीवन को केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित न करें
आचार्यश्री ने कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल मकान, कार, धन और अन्य सुविधाएं जुटाना नहीं है। मनुष्य को अपने जीवन में धर्म, सेवा, संयम और आत्मचिंतन के लिए भी समय निकालना चाहिए। भौतिक उपलब्धियां जीवन को सुविधाजनक बना सकती हैं, लेकिन उन्हें जीवन की अंतिम उपलब्धि मान लेना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि जिस वस्तु को एक दिन यहीं छूट जाना है, उसके पीछे अपना पूरा जीवन लगा देना बुद्धिमानी नहीं है। मनुष्य को अपनी जरूरतों को सीमित करते हुए आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।
प्रवचन के दौरान सभागार में श्रद्धालु एकाग्र होकर मुनिश्री के विचार सुनते रहे। उनके संदेश ने उपस्थित लोगों को आत्मचिंतन और जीवन में अनावश्यक संग्रह कम करने की प्रेरणा दी।
इस अवसर पर मुकेश जैन, प्रदीप जैन, वरदान जैन, नवीन जैन, राकेश जैन, विकास जैन, अनुज जैन, ऋषभ जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं समाज के लोग उपस्थित रहे।
वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।

