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अतुल्य भारत के मंच पर छाया पुरा महादेव का ‘जीरो वेस्ट महोत्सव’

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बागपत,10 अगस्त 2026 (यूटीएन)। आस्था, परंपरा और प्रकृति संरक्षण का अनूठा संगम अब बागपत की पहचान को नई ऊंचाई देने लगा है। ऐतिहासिक पुरा महादेव धाम में शुरू की गई ‘जीरो वेस्ट महोत्सव’ की पहल अब स्थानीय स्तर से निकलकर देश के पर्यटन मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बना रही है। भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय की आधिकारिक ‘अतुल्य भारत’ वेबसाइट पर श्री परशुरामेश्वर पुरा महादेव के श्रावणी मेले को ‘भक्ति भी, प्रकृति भी–जीरो वेस्ट महोत्सव’ के रूप में प्रमुखता मिलना बागपत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

पुरा महादेव में वर्षों से चली आ रही धार्मिक आस्था और विशाल मेलों की परंपरा के बीच पर्यावरण संरक्षण को जोड़ने का यह प्रयास अब देश-विदेश के पर्यटकों और श्रद्धालुओं तक पहुंच रहा है। इससे पुरा महादेव केवल धार्मिक स्थल के रूप में ही नहीं, बल्कि जिम्मेदार और पर्यावरण अनुकूल तीर्थस्थल के रूप में भी अपनी पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

स्थानीय पहल को मिला राष्ट्रीय मंच

‘अतुल्य भारत’ देश की विरासत, संस्कृति, आध्यात्मिकता, प्राकृतिक सौंदर्य और विविध पर्यटन अनुभवों को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने वाला भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय का प्रमुख मंच है। इस मंच पर पुरा महादेव के जीरो वेस्ट महोत्सव को स्थान मिलना इस बात का संकेत है कि यहां अपनाए जा रहे पर्यावरणीय प्रयोगों को अब व्यापक स्तर पर देखा और समझा जा रहा है।

विशेष बात यह है कि पुरा महादेव की पहचान पहले से ही प्राचीन धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत के कारण देशभर में है। श्रावण मास में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। कांवड़ यात्रा और शिवभक्तों की आवाजाही के दौरान बड़ी मात्रा में पूजा सामग्री, प्लास्टिक और अन्य कचरा उत्पन्न होने की संभावना रहती है। ऐसे में मेले की धार्मिक भव्यता के साथ-साथ स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को जोड़ना अपने आप में एक बड़ी प्रशासनिक और सामाजिक चुनौती है।

इसी चुनौती को अवसर में बदलने की कोशिश बागपत प्रशासन ने की है। उद्देश्य यह है कि श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन और पूजा-अर्चना के साथ पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी समझें।

‘जीरो वेस्ट’ केवल सफाई नहीं, सोच में बदलाव

पुरा महादेव का जीरो वेस्ट मॉडल केवल मेले के बाद कचरा उठाने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे कचरे को कम करने, अलग-अलग श्रेणियों में बांटने, उपयोगी सामग्री को दोबारा इस्तेमाल करने और जैविक कचरे को संसाधन में बदलने की व्यापक सोच काम कर रही है।

इस मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष लोगों की आदतों में बदलाव लाने का प्रयास है। श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया जा रहा है कि धार्मिक आयोजन में स्वच्छता केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक श्रद्धालु की भी जिम्मेदारी है।

यानी मंदिर में पूजा करने के बाद यदि श्रद्धालु अपने पीछे प्लास्टिक, फूल-माला या अन्य कचरा छोड़ देता है तो पूजा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। इसी सोच को ‘भक्ति भी, प्रकृति भी... आस्था भी, जिम्मेदारी भी’ जैसे संदेशों के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

महाशिवरात्रि से शुरू हुआ प्रयोग अब श्रावणी मेले तक पहुंचा

पुरा महादेव के जीरो वेस्ट अभियान की सोच अचानक सामने नहीं आई। फाल्गुनी महाशिवरात्रि के दौरान आयोजित धार्मिक आयोजनों में कचरे के पुनः उपयोग के कई प्रयोग किए गए। कचरे से मैट तैयार करने, कपड़े और अन्य अनुपयोगी सामग्री से उपयोगी वस्तुएं बनाने, बच्चों के लिए ‘नन्ही कली’ गुड़िया तैयार करने और मंदिर में चढ़ाए जाने वाले फूलों से अगरबत्ती बनाने जैसे प्रयोगों ने इस अभियान को अलग पहचान दी।

पूजा के बाद फेंक दिए जाने वाले फूलों को भी उपयोगी संसाधन के रूप में देखा गया। फूलों से अगरबत्ती तैयार करने का प्रयोग इस सोच का उदाहरण बना कि धार्मिक आस्था से निकलने वाली सामग्री को भी कचरे के बजाय संसाधन बनाया जा सकता है।

इसी तरह अनुपयोगी सामग्री के पुनः उपयोग से तैयार उत्पादों ने यह संदेश दिया कि जीरो वेस्ट का मतलब केवल कूड़ेदान बढ़ाना नहीं, बल्कि ‘कचरे को संसाधन’ मानकर उसका बेहतर उपयोग करना भी है।

श्रावणी मेले में प्लास्टिक के विकल्प पर जोर

श्रावणी मेले के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने को देखते हुए प्लास्टिक कचरे को कम करना प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया गया है। इसके लिए प्लास्टिक के स्थान पर पर्यावरण अनुकूल विकल्पों के उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में प्रयास किए गए हैं।

मेले में आने वाले श्रद्धालुओं को भी प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल करने के लिए जागरूक किया जा रहा है। दुकानदारों, स्वयंसेवकों, सामाजिक संगठनों और प्रशासनिक टीमों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश पहुंचाया जा रहा है।

कचरा पृथक्करण की व्यवस्था के जरिए गीले और सूखे कचरे को अलग रखने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि एकत्रित कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण किया जा सके।

पूजा सामग्री को भी मिला नया जीवन

पुरा महादेव के जीरो वेस्ट मॉडल की खासियत यह है कि यहां पूजा सामग्री को भी बेकार वस्तु के रूप में नहीं देखा जा रहा। मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर रोजाना बड़ी मात्रा में फूल, माला और अन्य जैविक सामग्री आती है। सामान्य स्थिति में यही सामग्री आसपास के क्षेत्रों में कचरे का कारण बन सकती है।

लेकिन यदि इसी पूजा सामग्री का उपयोग अगरबत्ती, जैविक खाद या अन्य उपयोगी उत्पादों के निर्माण में किया जाए तो इससे दो फायदे होते हैं। पहला, मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में स्वच्छता बनी रहती है और दूसरा, धार्मिक कचरे को उपयोगी संसाधन में बदला जा सकता है।

पुरा महादेव में इसी विचार को व्यवहार में उतारने की दिशा में किए गए प्रयास अब व्यापक चर्चा का विषय बन रहे हैं।

पुरा गांव की उपलब्धियों में जुड़ा एक और अध्याय

पुरा महादेव से जुड़ी यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पुरा गांव पहले ही पर्यटन मंत्रालय की ओर से सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांव के राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा जा चुका है। गांव की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत ने उसे राष्ट्रीय पहचान दिलाई थी।

अब उसी पुरा गांव से पर्यावरण संरक्षण और जिम्मेदार आस्था का संदेश भी देश के प्रमुख पर्यटन मंच तक पहुंचा है। इस तरह पुरा की पहचान केवल ऐतिहासिक विरासत तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यहां विकसित हो रही नई सोच भी इसकी पहचान का हिस्सा बन रही है।

एक ओर पुरा गांव अपनी प्राचीन विरासत को संजोए हुए है तो दूसरी ओर उसी विरासत के साथ आधुनिक पर्यावरणीय सोच को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। यह संयोजन आने वाले समय में बागपत के पर्यटन विकास के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

डीएम अस्मिता लाल के नेतृत्व में विकसित हुआ मॉडल

जिलाधिकारी अस्मिता लाल के नेतृत्व में बागपत में जीरो वेस्ट मॉडल को आगे बढ़ाने के प्रयास किए गए हैं। प्रशासन की सोच में धार्मिक आयोजनों को केवल भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा और सफाई तक सीमित रखने के बजाय उन्हें पर्यावरणीय जिम्मेदारी से जोड़ने पर जोर दिया गया है।

प्रशासन की कोशिश है कि मेले की समाप्ति के बाद केवल साफ परिसर ही न मिले, बल्कि ऐसा मॉडल भी विकसित हो जिसे दूसरे धार्मिक आयोजन और तीर्थस्थल भी अपनाने की दिशा में विचार कर सकें।

इस मॉडल में प्रशासन के साथ स्थानीय लोगों, मंदिर व्यवस्था, स्वयंसेवकों, सामाजिक संगठनों और श्रद्धालुओं की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

धार्मिक पर्यटन को नई दिशा देने की क्षमता

भारत में धार्मिक पर्यटन का दायरा लगातार बड़ा है। देश के प्रमुख मंदिरों, तीर्थस्थलों और धार्मिक मेलों में सालभर लाखों-करोड़ों श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐसे में इन आयोजनों के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करना आने वाले समय में बड़ी आवश्यकता बन सकता है।

पुरा महादेव का प्रयोग इसी दिशा में एक स्थानीय मॉडल के रूप में देखा जा सकता है। यदि श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या के बावजूद कचरे को कम करने, अलग करने और पुनः उपयोग करने की व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है तो यह दूसरे धार्मिक स्थलों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है।

‘जिम्मेदार आस्था’ बन रही पहचान

पुरा महादेव के जीरो वेस्ट अभियान की सबसे बड़ी विशेषता इसका संदेश है। यहां पर्यावरण संरक्षण को धार्मिक आस्था के विरोध में नहीं, बल्कि उसी आस्था का हिस्सा बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है।

भारतीय परंपरा में नदियों, पेड़-पौधों, पर्वतों, पशु-पक्षियों और प्रकृति के विभिन्न रूपों को सम्मान देने की परंपरा रही है। ऐसे में प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना धार्मिक आयोजन करना उसी परंपरा को आधुनिक परिस्थितियों में आगे बढ़ाने जैसा है।

इसी विचार के साथ श्रद्धालुओं से अपील की जा रही है कि वे शिवधाम आएं, पूजा करें, आशीर्वाद लें, लेकिन अपने पीछे गंदगी और प्रदूषण न छोड़ें। बल्कि ऐसी विरासत छोड़कर जाएं जिसे आने वाली पीढ़ियां भी उसी श्रद्धा और सम्मान के साथ देख सकें।

बागपत के पर्यटन को मिल सकती है नई पहचान

अतुल्य भारत के मंच पर पुरा महादेव के जीरो वेस्ट महोत्सव को जगह मिलने से बागपत के पर्यटन की संभावनाओं को भी नई दिशा मिल सकती है। बागपत पहले से ही ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के कारण महत्वपूर्ण है। पुरा महादेव, पुरा गांव की विरासत और क्षेत्र से जुड़े अन्य ऐतिहासिक स्थलों को एक साथ पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित करने की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।

यदि धार्मिक पर्यटन के साथ पर्यावरण पर्यटन और विरासत पर्यटन को भी जोड़ा जाए तो स्थानीय युवाओं, छोटे व्यापारियों, हस्तशिल्प से जुड़े लोगों और अन्य स्थानीय कारोबारियों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।

देश-दुनिया के पर्यटकों तक पहुंचेगा संदेश

‘अतुल्य भारत’ जैसे राष्ट्रीय पर्यटन मंच पर पुरा महादेव की पहल को स्थान मिलने से इसका संदेश अब स्थानीय श्रद्धालुओं तक सीमित नहीं रहेगा। देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले पर्यटक और विदेशी यात्री भी बागपत की इस पहल से परिचित हो सकेंगे।

यह उपलब्धि बागपत के लिए इसलिए भी खास है क्योंकि यहां की पहचान अब केवल ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत से नहीं, बल्कि विरासत को बचाने की जिम्मेदारी से भी जुड़ती दिखाई दे रही है।

आने वाले आयोजनों के लिए बन सकता है उदाहरण

पुरा महादेव में विकसित हो रही जीरो वेस्ट व्यवस्था को भविष्य में अन्य मेलों और धार्मिक आयोजनों में भी लागू किया जा सकता है। बड़े आयोजनों में यदि शुरुआत से ही कचरा कम करने की योजना बनाई जाए, प्लास्टिक पर नियंत्रण हो, पूजा सामग्री का पृथक संग्रह किया जाए और जैविक कचरे का उपयोग किया जाए तो सफाई व्यवस्था पर दबाव भी कम किया जा सकता है।

इसके साथ ही श्रद्धालुओं को केवल निर्देश देने के बजाय उन्हें अभियान का हिस्सा बनाना भी जरूरी है। जब श्रद्धालु स्वयं यह महसूस करेगा कि मंदिर और प्रकृति दोनों की स्वच्छता उसकी जिम्मेदारी है, तभी जीरो वेस्ट अभियान वास्तविक अर्थों में सफल हो सकेगा।

आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश

पुरा महादेव का यह प्रयोग एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण संदेश देता है—धर्म और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।

शिव की आराधना प्रकृति के सम्मान के बिना अधूरी मानी जा सकती है। भगवान शिव से जुड़े प्रतीकों में भी प्रकृति और जीव-जगत का गहरा संबंध दिखाई देता है। ऐसे में शिवधाम में जीरो वेस्ट अभियान को केवल प्रशासनिक पहल के बजाय आस्था के आधुनिक विस्तार के रूप में भी देखा जा रहा है।

पुरा महादेव से निकल रहा संदेश अब साफ है—श्रद्धा के साथ आएं, स्वच्छता के साथ लौटें और प्रकृति के लिए कुछ बेहतर छोड़कर जाएं।

‘भक्ति भी, प्रकृति भी’ बना बागपत का संदेश

अतुल्य भारत के मंच पर पुरा महादेव के जीरो वेस्ट महोत्सव को पहचान मिलना बागपत के लिए सिर्फ एक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक नई सोच की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। पुरा गांव ने पहले अपनी विरासत के कारण राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई और अब उसी विरासत से निकला पर्यावरण संरक्षण का संदेश देश के पर्यटन मंच तक पहुंचा है।

इस पहल ने यह साबित करने की कोशिश की है कि बड़े धार्मिक आयोजन केवल भीड़, भव्यता और धार्मिक उत्साह के लिए ही नहीं होते, बल्कि वे समाज को सकारात्मक बदलाव का संदेश देने का माध्यम भी बन सकते हैं।

अगर श्रद्धालुओं की आस्था को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी से जोड़ दिया जाए तो हर मेला, हर पर्व और हर धार्मिक आयोजन पर्यावरण संरक्षण का अभियान बन सकता है।

वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )







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