बड़ौत, 06 अक्टूबर 2026 (यूटीएन)। अजितनाथ सभागार में विराजमान आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में धर्म का वास्तविक पालन दया के माध्यम से होता है। दया ही धर्म का मूल आधार है। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में भी कहा गया है— “धर्मस्य मूलं दया”, अर्थात धर्म की जड़ दया है। जब मनुष्य के हृदय में प्रत्येक जीव के प्रति करुणा और दया का भाव उत्पन्न होता है, तभी उसके जीवन में धर्म का सही अर्थ प्रकट होता है।
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य अपने जीवन में सुख, शांति और संतोष की तलाश करता रहता है, लेकिन वास्तविक शांति बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि धर्म, संयम, दया और आत्मचिंतन से प्राप्त होती है। धर्म का मार्ग मनुष्य को स्वयं के भीतर झांकने और अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने की प्रेरणा देता है।
संत समागम से बदलती है जीवन की दिशा
मुनि श्री ने संत समागम की महत्ता बताते हुए कहा कि संतों का सानिध्य जीवन को नई दिशा देने वाला होता है। संतों के संपर्क में आने से मनुष्य को संसार की वास्तविकता का बोध होने लगता है और उसे यह समझ आने लगता है कि सांसारिक मोह-माया स्थायी नहीं है।
उन्होंने कहा कि संत समागम की सार्थकता यही है कि मनुष्य को संसार के अंत का बोध होने लगता है। सामने वाला व्यक्ति संत बने या न बने, लेकिन संतोषी अवश्य बन जाता है। संतों के उपदेश मनुष्य के भीतर सकारात्मक विचारों का निर्माण करते हैं और उसे अपने आचरण में सुधार करने की प्रेरणा देते हैं।
गुरु के बिना जीवन की साधना अधूरी
आचार्य श्री ने गुरु भक्ति का भाव व्यक्त करते हुए कहा कि गुरु का जीवन में विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार एक अनगढ़ पत्थर को कुशल शिल्पी तराशकर पूज्य बना देता है, उसी प्रकार गुरु अपने शिष्य के जीवन को संस्कार, ज्ञान और साधना से तराशकर श्रेष्ठ बनाने का कार्य करते हैं।
उन्होंने अपने गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि “इस अनगढ़ पत्थर को पूज्य गुरुदेव ने तराशा एवं पूज्य बना दिया।” उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में गुरु का होना आवश्यक है। गुरु की महिमा अपरंपार है और गुरु ही साधक को सही मार्ग दिखाकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाते हैं।
धर्म, शांति और दया से शुरू होता है श्रेष्ठ जीवन
आचार्य श्री ने कहा कि जीवन की वास्तविक शुरुआत धर्म, शांति और दया से होती है। धर्म का पालन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे मनुष्य के व्यवहार और आचरण में भी दिखाई देना चाहिए। व्यक्ति के व्यवहार में दया, करुणा, क्षमा और प्रेम होगा तो उसका जीवन स्वयं भी सुखमय बनेगा और उसके संपर्क में आने वाले लोगों को भी शांति मिलेगी।
उन्होंने कहा कि धर्म मनुष्य के इहलोक और परलोक दोनों को महान बनाने का मार्ग दिखाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में सदाचार अपनाने के साथ-साथ प्रत्येक प्राणी मात्र के प्रति दया और करुणा का भाव रखना चाहिए।
दया से शत्रु भी बन सकते हैं मित्र
धर्मसभा में आचार्य श्री ने कहा कि यदि मनुष्य के भीतर सच्ची दया और करुणा का भाव आ जाए तो उसके व्यवहार में अपने आप परिवर्तन आने लगता है। वह दूसरों के दुख को समझने लगता है और वैमनस्य की जगह प्रेम को महत्व देता है। दया का भाव ऐसा गुण है, जो मनुष्य के संबंधों को मजबूत करता है और कई बार शत्रुता को भी मित्रता में बदलने की क्षमता रखता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे धर्म को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं, गुरु के बताए मार्ग पर चलें और प्रत्येक जीव के प्रति प्रेम, दया तथा सम्मान का भाव रखें। यही आत्मिक उन्नति और जीवन को सार्थक बनाने का मार्ग है।
धर्मसभा में मुकेश जैन, प्रदीप जैन, वरदान जैन, नवीन जैन, अनुज जैन, ऋषभ जैन, अनिल जैन आदि मौजूद रहे।
वरिष्ठ उप-संपादक,( डॉ योगेश कौशिक )।

