Thursday, January 15, 2026

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एम्स की ‘आश्रय’ पहल: अस्पताल की सीमाओं से आगे बढ़कर मानवीय स्वास्थ्य सेवा का नया मॉडल

समस्या के समाधान के तौर पर ‘आश्रय’ सुविधा को विकसित किया गया है, ताकि मरीजों को फुटपाथों या अस्पताल परिसर में कठिन परिस्थितियों में रात न बितानी पड़े।

नई दिल्ली, 5 जनवरी 2026 (यूटीएन)। नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने रोगी देखभाल को नई दिशा देते हुए एक ऐसी पहल शुरू की है, जो अस्पताल की चारदीवारी से बाहर भी संवेदनशील और गरिमापूर्ण स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करती है। केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के सहयोग से शुरू की गई ‘आश्रय’ सुविधा उन मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए राहत बनकर उभरी है, जिन्हें ओपीडी सेवाओं के लिए अक्सर रातभर अस्पताल के बाहर इंतजार करना पड़ता था। देश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों में से एक एम्स में प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीज दूर-दराज़ से पहुंचते हैं। ऐसे में ओपीडी पंजीकरण से पहले रात में लंबी कतारें और खुले में इंतजार एक बड़ी चुनौती रही है। इसी समस्या के समाधान के तौर पर ‘आश्रय’ सुविधा को विकसित किया गया है, ताकि मरीजों को फुटपाथों या अस्पताल परिसर में कठिन परिस्थितियों में रात न बितानी पड़े।
इस पहल के तहत रात के समय एम्स पहुंचने वाले मरीजों की पहचान की जाती है और उन्हें पर्यावरण के अनुकूल इलेक्ट्रिक शटल बसों के माध्यम से ‘आश्रय’ केंद्र तक ले जाया जाता है। यहां पहुंचते ही मरीजों को उनकी रिपोर्टिंग के क्रम में टोकन नंबर दिया जाता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि अगले दिन ओपीडी पंजीकरण के दौरान उसी क्रम का पालन किया जाए। आश्रय’ केंद्र में मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए निःशुल्क भोजन, स्वच्छ कंबल और साफ-सुथरी शौचालय सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। यह व्यवस्था न केवल बुनियादी सुविधाएं प्रदान करती है, बल्कि मरीजों की गरिमा और आत्मसम्मान को भी बनाए रखती है। अगली सुबह मरीजों को इलेक्ट्रिक वाहनों से उनकी संबंधित ओपीडी तक पहुंचाया जाता है, जिससे बिना किसी हड़बड़ी और तनाव के सुव्यवस्थित पंजीकरण संभव हो पाता है।
लगभग 250 लोगों की क्षमता वाली यह सुविधा वर्तमान में पूरी तरह उपयोग में है, जो इस बात का प्रमाण है कि मरीजों के बीच इस तरह की सहायक सेवाओं की कितनी आवश्यकता है। एम्स अधिकारियों के अनुसार, ‘आश्रय’ के शुरू होने के बाद मरीजों की असुविधा में उल्लेखनीय कमी आई है और ओपीडी पंजीकरण क्षेत्रों में भीड़ प्रबंधन भी पहले की तुलना में बेहतर हुआ है। एम्स प्रशासन ने संकेत दिया है कि भविष्य में स्थान की उपलब्धता और बढ़ती मांग को देखते हुए इस सुविधा का विस्तार किया जा सकता है, ताकि अधिक से अधिक मरीजों और तीमारदारों को इसका लाभ मिल सके।
करुणामय दृष्टिकोण, टिकाऊ परिवहन समाधान और सुव्यवस्थित रोगी प्रबंधन को एक साथ जोड़ते हुए ‘आश्रय’ पहल सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में एक आदर्श मॉडल के रूप में उभर रही है। यह पहल दर्शाती है कि संवेदनशील और दूरदर्शी प्रशासनिक प्रयास किस तरह मरीजों के अनुभव को बेहतर बना सकते हैं और देशभर के अस्पतालों के लिए एक नई मिसाल कायम कर सकते हैं।
एम्स दिल्ली में प्रोफेसर और मीडिया सेल की इंचार्ज डॉ. रीमा दादा ने बताया कि एक विश्राम सदन एम्स के परिसर में ट्रामा सेंटर की तरफ है. इसमें 280 बेड हैं और दो अन्य धर्मशालाओं में मिलाकार करीब 250 बेड हैं. एम्स झज्जर ( एनसीआई) में भी विश्राम सदन है जिसमें 806 बेड हैं, लेकिन मरीजों और उनके परिजनों को यह जानकारी ही नहीं होती है कि एम्स की ओर से इस तरह की सुविधाएं भी दी जा रही है. जहां विश्राम सदन में सिर्फ 20 रुपये प्रतिदिन के खर्च में ही तीमारदारों के ठहरने और खाने की बेहतर व्यवस्था है. इनमें डबल और ट्रिपल बेड के कमरे भी हैं, हालांकि इनमें खर्च थोड़ा अधिक है. डॉ रीमा दादा ने बताया कि एम्स के डायरेक्टर डॉ. एम. श्रीनिवास की पहल पर एम्स में एक मेगा विश्राम सदन भी बन रहा है जिसमें 2000 बेड होंगे.
डॉ रीमा दादा ने बताया कि यह सब कार्य एम्स के डायरेक्टर डॉ. एम. श्रीनिवास के नेतृत्व में किया जा रहा है. डॉ एम. श्रीनिवास ने विश्राम सदन के लिए डिस्पले बोर्ड की व्यवस्था भी कराई है.विश्राम सदन में कितने बेड खाली हैं और कितने भरे हैं इसकी जानकारी भी वहां डिस्पले बोर्ड पर दी जाती है.कितने कमरे उपलब्ध हैं यह जानकारी भी रीयल-टाइम डैशबोर्ड पर मिल जाती है. इससे तीमारदारों को कोई परेशानी नहीं होती है. विश्राम सदन में ठंड के मौसम में कंबल भी उपलब्ध कराए जाते हैं. साफ पानी और बुनियादी सुविधाएं मौजूद हैं.
*ऐसे होता है विश्राम सदन का रजिस्ट्रेशन*
विश्राम सदन में कमरा पाने के लिए मरीज के डॉक्टर को पर्चे पर विश्राम सदन की सिफारिश लिखनी होती है. इसके बाद रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पूरी की जाती है. कमरे की वैकेंसी के हिसाब से जगह मिल जाती है. तीमरदारों के लिएन्यूनतम सात से 14 दिन का ठहराव होता है. ये मरीज की स्थिति के हिसाब से घटाया या बढ़ाया भी जा सकता है.
*सुरक्षा और अन्य सुविधाएं*
विश्राम सदन में सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा गया है. सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं परिसर में निगरानी रहती है. साफ-सफाई और अनुशासन पर विशेष जोर दिया जाता है. डॉ रीमा का कहना है कि तीमारदारों के एम्स के विश्राम सदन में मिल रही सुविधाओं का लाभ लेना चाहिए.
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।

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एम्स की ‘आश्रय’ पहल: अस्पताल की सीमाओं से आगे बढ़कर मानवीय स्वास्थ्य सेवा का नया मॉडल

समस्या के समाधान के तौर पर ‘आश्रय’ सुविधा को विकसित किया गया है, ताकि मरीजों को फुटपाथों या अस्पताल परिसर में कठिन परिस्थितियों में रात न बितानी पड़े।

नई दिल्ली, 5 जनवरी 2026 (यूटीएन)। नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने रोगी देखभाल को नई दिशा देते हुए एक ऐसी पहल शुरू की है, जो अस्पताल की चारदीवारी से बाहर भी संवेदनशील और गरिमापूर्ण स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करती है। केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के सहयोग से शुरू की गई ‘आश्रय’ सुविधा उन मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए राहत बनकर उभरी है, जिन्हें ओपीडी सेवाओं के लिए अक्सर रातभर अस्पताल के बाहर इंतजार करना पड़ता था। देश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों में से एक एम्स में प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीज दूर-दराज़ से पहुंचते हैं। ऐसे में ओपीडी पंजीकरण से पहले रात में लंबी कतारें और खुले में इंतजार एक बड़ी चुनौती रही है। इसी समस्या के समाधान के तौर पर ‘आश्रय’ सुविधा को विकसित किया गया है, ताकि मरीजों को फुटपाथों या अस्पताल परिसर में कठिन परिस्थितियों में रात न बितानी पड़े।
इस पहल के तहत रात के समय एम्स पहुंचने वाले मरीजों की पहचान की जाती है और उन्हें पर्यावरण के अनुकूल इलेक्ट्रिक शटल बसों के माध्यम से ‘आश्रय’ केंद्र तक ले जाया जाता है। यहां पहुंचते ही मरीजों को उनकी रिपोर्टिंग के क्रम में टोकन नंबर दिया जाता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि अगले दिन ओपीडी पंजीकरण के दौरान उसी क्रम का पालन किया जाए। आश्रय’ केंद्र में मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए निःशुल्क भोजन, स्वच्छ कंबल और साफ-सुथरी शौचालय सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। यह व्यवस्था न केवल बुनियादी सुविधाएं प्रदान करती है, बल्कि मरीजों की गरिमा और आत्मसम्मान को भी बनाए रखती है। अगली सुबह मरीजों को इलेक्ट्रिक वाहनों से उनकी संबंधित ओपीडी तक पहुंचाया जाता है, जिससे बिना किसी हड़बड़ी और तनाव के सुव्यवस्थित पंजीकरण संभव हो पाता है।
लगभग 250 लोगों की क्षमता वाली यह सुविधा वर्तमान में पूरी तरह उपयोग में है, जो इस बात का प्रमाण है कि मरीजों के बीच इस तरह की सहायक सेवाओं की कितनी आवश्यकता है। एम्स अधिकारियों के अनुसार, ‘आश्रय’ के शुरू होने के बाद मरीजों की असुविधा में उल्लेखनीय कमी आई है और ओपीडी पंजीकरण क्षेत्रों में भीड़ प्रबंधन भी पहले की तुलना में बेहतर हुआ है। एम्स प्रशासन ने संकेत दिया है कि भविष्य में स्थान की उपलब्धता और बढ़ती मांग को देखते हुए इस सुविधा का विस्तार किया जा सकता है, ताकि अधिक से अधिक मरीजों और तीमारदारों को इसका लाभ मिल सके।
करुणामय दृष्टिकोण, टिकाऊ परिवहन समाधान और सुव्यवस्थित रोगी प्रबंधन को एक साथ जोड़ते हुए ‘आश्रय’ पहल सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में एक आदर्श मॉडल के रूप में उभर रही है। यह पहल दर्शाती है कि संवेदनशील और दूरदर्शी प्रशासनिक प्रयास किस तरह मरीजों के अनुभव को बेहतर बना सकते हैं और देशभर के अस्पतालों के लिए एक नई मिसाल कायम कर सकते हैं।
एम्स दिल्ली में प्रोफेसर और मीडिया सेल की इंचार्ज डॉ. रीमा दादा ने बताया कि एक विश्राम सदन एम्स के परिसर में ट्रामा सेंटर की तरफ है. इसमें 280 बेड हैं और दो अन्य धर्मशालाओं में मिलाकार करीब 250 बेड हैं. एम्स झज्जर ( एनसीआई) में भी विश्राम सदन है जिसमें 806 बेड हैं, लेकिन मरीजों और उनके परिजनों को यह जानकारी ही नहीं होती है कि एम्स की ओर से इस तरह की सुविधाएं भी दी जा रही है. जहां विश्राम सदन में सिर्फ 20 रुपये प्रतिदिन के खर्च में ही तीमारदारों के ठहरने और खाने की बेहतर व्यवस्था है. इनमें डबल और ट्रिपल बेड के कमरे भी हैं, हालांकि इनमें खर्च थोड़ा अधिक है. डॉ रीमा दादा ने बताया कि एम्स के डायरेक्टर डॉ. एम. श्रीनिवास की पहल पर एम्स में एक मेगा विश्राम सदन भी बन रहा है जिसमें 2000 बेड होंगे.
डॉ रीमा दादा ने बताया कि यह सब कार्य एम्स के डायरेक्टर डॉ. एम. श्रीनिवास के नेतृत्व में किया जा रहा है. डॉ एम. श्रीनिवास ने विश्राम सदन के लिए डिस्पले बोर्ड की व्यवस्था भी कराई है.विश्राम सदन में कितने बेड खाली हैं और कितने भरे हैं इसकी जानकारी भी वहां डिस्पले बोर्ड पर दी जाती है.कितने कमरे उपलब्ध हैं यह जानकारी भी रीयल-टाइम डैशबोर्ड पर मिल जाती है. इससे तीमारदारों को कोई परेशानी नहीं होती है. विश्राम सदन में ठंड के मौसम में कंबल भी उपलब्ध कराए जाते हैं. साफ पानी और बुनियादी सुविधाएं मौजूद हैं.
*ऐसे होता है विश्राम सदन का रजिस्ट्रेशन*
विश्राम सदन में कमरा पाने के लिए मरीज के डॉक्टर को पर्चे पर विश्राम सदन की सिफारिश लिखनी होती है. इसके बाद रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पूरी की जाती है. कमरे की वैकेंसी के हिसाब से जगह मिल जाती है. तीमरदारों के लिएन्यूनतम सात से 14 दिन का ठहराव होता है. ये मरीज की स्थिति के हिसाब से घटाया या बढ़ाया भी जा सकता है.
*सुरक्षा और अन्य सुविधाएं*
विश्राम सदन में सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा गया है. सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं परिसर में निगरानी रहती है. साफ-सफाई और अनुशासन पर विशेष जोर दिया जाता है. डॉ रीमा का कहना है कि तीमारदारों के एम्स के विश्राम सदन में मिल रही सुविधाओं का लाभ लेना चाहिए.
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।

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