नई दिल्ली, 5 जनवरी 2026 (यूटीएन)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 जनवरी को गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर का दौरा करेंगे। इस दौरान वे सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में भाग लेंगे, जो 8 जनवरी से 11 जनवरी तक आयोजित किया जा रहा है। इस चार दिवसीय आयोजन में आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों की श्रृंखला चलेगी। अधिकारियों ने बताया कि इस अवसर पर ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के तहत साल भर चलने वाले कार्यक्रमों की शुरुआत की जाएगी।
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का उद्देश्य भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, आस्था और आत्मसम्मान के भाव को सशक्त करना है। कार्यक्रम के दौरान धार्मिक अनुष्ठान, आध्यात्मिक प्रवचन, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और सामाजिक जागरूकता से जुड़े आयोजन किए जाएंगे। स्थानीय प्रशासन और ट्रस्ट की ओर से प्रधानमंत्री के दौरे को लेकर तैयारियां तेज कर दी गई हैं। सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ श्रद्धालुओं की सुविधा का भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है।
*सोमनाथ मंदिर पर पीएम मोदी ने लिखा लेख*
प्रधानमंत्री मोदी पहले भी कह चुके हैं कि बार-बार विदेशी आक्रांताओं के हमलों के बावजूद दोबारा खड़ा हुआ सोमनाथ मंदिर भारतीय सभ्यता के अडिग और अटल आत्मबल का प्रतीक है। हाल ही में अपने लेख में उन्होंने कहा था कि सोमनाथ से बेहतर भारतीय सभ्यता की अजेय भावना का उदाहरण कोई और नहीं हो सकता, जो तमाम कठिनाइयों और संघर्षों के बाद भी गौरव के साथ खड़ा है। उन्होंने लिखा ‘वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है, क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में गजनवी के महमूद ने आस्था और सभ्यता के महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। यह हिंसक और बर्बर प्रयास था।

*सोमनाथ: हमारी अटूट आस्था और स्वाभिमान के एक हजार साल की गाथा*
प्रधानमंत्री ने लिखा कि सोमनाथ…यह शब्द सुनते ही मन और हृदय में गर्व और आस्था की भावना भर जाती है। भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात में, प्रभास पाटन नाम की जगह पर स्थित सोमनाथ, भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतीकरण है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है। सौराष्ट्रे सोमनाथं च…यानी ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। यह इस पवित्र धाम की सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है। शास्त्रों में कहा गया है …सोमलिङ्गं नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते। लभते फलं मनोवाञ्छितं मृतः स्वर्गं समाश्रयेत्॥ अर्थात्, सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मन में जो भी पुण्य कामनाएं होती हैं, वह पूरी होती हैं और मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होती है।
दुर्भाग्यवश, यही सोमनाथ, जो करोड़ों लोगों की श्रद्धा और प्रार्थनाओं का केंद्र था, विदेशी आक्रमणकारियों का निशाना बना, जिनका उद्देश्य विध्वंस था। वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है, क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में गजनवी के महमूद ने आस्था और सभ्यता के महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। यह हिंसक और बर्बर प्रयास था।
सोमनाथ हमला इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में शामिल है। मगर, हजार वर्ष बाद आज भी यह मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है। समय-समय पर इस मंदिर को उसके पूरे वैभव के साथ पुन:निर्मित करने के प्रयास जारी रहे। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1951 में आकार ले सका और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ समारोह ऐतिहासिक था, जब मंदिर के द्वार दर्शनों के लिए खोले गए थे। संयोग से वर्ष 2026 सोमनाथ के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी वर्ष है।
अतीत के आक्रमणकारी आज समय की धूल बन चुके हैं। उनका नाम अब विनाश के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है। इतिहास के पन्नों में वे केवल फुटनोट हैं, जबकि सोमनाथ मंदिर आज भी अपनी आशा बिखेरता हुआ प्रकाशमान खड़ा है। सोमनाथ हमें बताता है कि घृणा और कट्टरता में विनाश की विकृत ताकत हो सकती है, लेकिन आस्था में सृजन की शक्ति होती है। अगर हजार साल पहले खंडित हुआ सोमनाथ अपने पूरे वैभव के साथ फिर से खड़ा हो सकता है, तो हम हजार साल पहले का समृद्ध भारत भी बना सकते हैं।
गजनवी लूटकर चला गया, पर हमारी भावना नहीं छीन सका
सोमनाथ पर हमले और गुलामी के लंबे कालखंड के बावजूद पूरे विश्वास के साथ और गर्व से कहना चाहता हूं कि सोमनाथ की गाथा विध्वंस की कहानी नहीं है। यह 1000 साल से चली आ रही भारत माता की करोड़ों संतानों के स्वाभिमान और अटूट आस्था की गाथा है। सोमनाथ पर बार-बार आक्रमण हमारे लोगों और हमारी संस्कृति को गुलाम बनाने का प्रयास था। पर हर बार हमारे पास ऐसे महान पुरुष और महिलाएं भी थीं, जिन्होंने उसकी रक्षा के लिए खड़े होकर सर्वोच्च बलिदान दिया। हर बार, पीढ़ी दर पीढ़ी, हमारी महान सभ्यता के लोगों ने खुद को संभाला, मंदिर को फिर से खड़ा किया और उसे पुनः जीवंत किया।
महमूद गजनवी लूटकर चला गया, लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे छीन नहीं सका। सोमनाथ से जुड़ी आस्था, विश्वास और प्रबल हुआ। उसकी आत्मा लाखों श्रद्धालुओं के भीतर सांस लेती रही। सोमनाथ दुनिया को संदेश दे रहा है कि मिटाने वाली मानसिकता खत्म जो जाती है। सोमनाथ हमारी प्रेरणा का स्रोत है, शक्ति का पुंज है। हमारा सौभाग्य है कि हमने उस धरती पर जीवन पाया है, जिसने देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी विभूति को जन्म दिया उन्होंने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि श्रद्धालु सोमनाथ में पूजा कर सकें। सोमनाथ पर आक्रमण, लोगों के साथ क्रूरता और विध्वंस के बारे में पढ़कर हृदय कांप उठता है। इस दुःख की पीड़ा आज भी महसूस होती है।
*विवेकानंद ने कहा था- सभ्यता की गहरी समझ देता है सोमनाथ*
1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे। 1897 में चेन्नई में दिए गए व्याख्यान के दौरान स्वामीजी ने कहा, दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे। इन मंदिरों पर सैकड़ों आक्रमणों के निशान हैं, और सैकड़ों बार इनका पुनर्जागरण हुआ है। यह बार-बार नष्ट किए गए, और हर बार अपने ही खंडहरों से फिर खड़े हुए। पहले की तरह सशक्त। पहले की तरह जीवंत। यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवन धारा है। इसका अनुसरण आपको गौरव से भर देता है। इसको छोड़ देने का मतलब है, मृत्यु। इससे अलग हो जाने पर विनाश ही होगा।
यह सर्वविदित है कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया। 11 मई, 1951 को सोमनाथ में भव्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। सरदार साहब यह ऐतिहासिक दिन देखने के लिए जीवित नहीं थे, पर उनका सपना राष्ट्र के सामने साकार होकर भव्य रूप में उपस्थित था।
तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू इस घटना से अधिक उत्साहित नहीं थे। वह नहीं चाहते थे कि राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी, लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे, और फिर जो हुआ, उसने नया इतिहास रच दिया।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


