नई दिल्ली, 22 जुलाई 2025 (यूटीएन)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि पारदर्शिता, भ्रष्टाचार-मुक्त वातावरण और समयबद्ध कार्यपद्धति ही वह मार्ग है जो अणुव्रत के उद्देश्यों से मेल खाता है। अणुव्रत आत्मानुशासन को बढ़ावा देने वाला आन्दोलन है, जो छोटे-छोटे व्रतों के माध्यम से व्यक्ति में नैतिक चेतना का विस्तार करता है। आज वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए ऐसे ही विचारों की आवश्यकता है। आज यहां डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) एवं अखिल डाभारतीय अणुव्रत न्यास के संयुक्त तत्वावधान में “विश्व की समस्याएँ और भारतीयता” विषय पर आयोजित अणुव्रत व्याख्यानमाला को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आचार्य तुलसी द्वारा प्रवर्तित अणुव्रत आंदोलन का महत्व आज और भी अधिक बढ़ गया है क्योंकि यह सम्प्रदाय से ऊपर उठकर मानवता और नैतिकता की प्रतिष्ठा का संदेश देता है।

भागवत ने कहा कि समस्याओं पर तो चर्चा होती है, लेकिन उपायों पर कम चर्चा होती है।विश्व समस्याओं से घिरा है। हम आधुनिक युग में बैठे हैं। हमें जितना इतिहास पढ़ाया गया है, वह पश्चिम की ओर से पढ़ाया जाता है।
*विश्व में भारत को लेकर विचार नहीं मिलते*
संघ प्रमुख ने कहा कि भारत के बारे में सामान्यतः विचार नहीं मिलते हैं, भले ही नक्शे पर भारत हो, पर विचारधारा में नहीं। जिन समस्याओं पर हजारों वर्षों से विचार होता रहा, उन पर प्रयास भी हुए, लेकिन समस्या जस की तस बनी रहीं। उन्होंने कहा कि समस्याओं की वैश्विक सूची 2000 वर्ष पुरानी है। घर, परिवार, राष्ट्र, व्यक्ति आदि इनमें कोई भी समस्या हो, पहली समस्या ‘दुख’ है। कहा कि दुख दूर करने के प्रयास होते रहे, कुछ दुख दूर भी हुए।
*सुख-सुविधा बढ़ी, लेकिन दुख वहीं हैं*
भागवत ने कहा कि सौ साल पहले भाषण देते तो लाउडस्पीकर नहीं था। अब भाषण देना आसान है, इसलिए भाषण भी लंबा हो गया है। पहले जोर-जोर से बोलना होता था तो 10 मिनट में ही बात खत्म करनी पड़ती थी। उन्होंने कहा कि पहले इधर-उधर जाने में पदयात्रा करनी पड़ती थी, अब अमेरिका जाना भी आसान है। विज्ञान से सुख-सुविधा बढ़ी, लेकिन दुख वहीं हैं। कौन दुखी नहीं है? रास्ते से भीख मांगने वाला हो या करोड़पति, सब अपने-अपने दुख गिनाएंगे। जितना सुख बढ़ाया, दुख वही का वही है।
*हर साल कहीं न कहीं युद्ध चलता रहता है*
मोहन भागवत ने कहा कि आज भी कलह है। 1950 में मेरा जन्म हुआ, तब से देखता आ रहा हूं कि हर साल कहीं न कहीं युद्ध चलता रहता है। कलह से हानि, रक्तपात और जीव की हानि होती है, लेकिन फिर भी बार-बार वही अनुभव दोहराया जाता है। पहले महायुद्ध के बाद शांति की किताबें लिखीं, लीग ऑफ नेशन बना, लेकिन दूसरा महायुद्ध भी हुआ और फिर यूएनओ बना। अब सोच रहे हैं कि क्या तीसरा महायुद्ध होगा? शांति आई क्या?
*ज्ञान तो बढ़ा है, लेकिन अज्ञानी भी बढ़े हैं*
उन्होंने कहा कि अज्ञानता भी एक समस्या है। क्या वह दूर हुआ? अज्ञान ने तो अपना रूप बदल लिया है। आज चंद्रमा, मंगल, क्रोमोसोम की बातें होती हैं, मनुष्य क्या नहीं कर सकता बस एक जीव का निर्माण बाकी है, ज्ञान बढ़ा है, साथ ही अज्ञानी लोगों की संख्या भी बढ़ी है। सुशिक्षित कितने हैं, पता नहीं। मुनिश्री डॉ. अभिजीत कुमार जी ने इस अवसर पर कहा कि “आचार्य तुलसी केवल एक व्यक्तित्व नहीं, अपितु एक संस्कृति के प्रतीक थे। उन्होंने शैक्षणिक, सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रों में अद्वितीय योगदान दिया।
अणुव्रत किसी धर्म या जाति तक सीमित न होकर मानवता का सार्वभौमिक संदेश है। अणुव्रत न्यास के प्रबंध न्यासी के.सी. जैन ने कहा कि मैत्री, प्रमोद और करुणा जैसे गुणों के विकास से ही अध्यात्म की वास्तविक प्रगति संभव है। उन्होंने अणुव्रत के असाम्प्रदायिक स्वरूप और नैतिक उत्थान के लिए निरंतर प्रयास की जानकारी दी। इग्नू की कुलपति प्रो. उमा कांजीलाल ने कहा कि अणुव्रत आंदोलन आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि यदि हर नागरिक अणुव्रत के दर्शन को अपनाए, तो यह राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक ठोस कदम होगा।
इस कार्यक्रम में दीप प्रज्ज्वलन, अणुव्रत गीत, इग्नू कुलगीत, तथा महिला मंडल एवं कार्यकर्ताओं की सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ भी हुईं। कार्यक्रम के मीडिया संयोजक डॉ. कमल जैन सेठिया ने बताया कि “अणुव्रत एक जनचेतना है, जो हर व्यक्ति के नैतिक उत्थान की प्रेरणा देता है। यह व्याख्यानमाला उसी दिशा में एक मजबूत पहल है, जो भारतीयता की मूल भावना और वैश्विक समाधान का संगम प्रस्तुत करती है। कार्यक्रम का संचालन सुनीता जैन ने किया।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।