नई दिल्ली, 31 दिसंबर(यूटीएन)।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा रविवार को एंटीबायोटिक के अत्यधिक इस्तेमाल को रोकने की बात कही गई. पीएम ने लोगों से अपील की कि डॉक्टर की बिना सलाह के किसी भी परेशानी के लिए अपनी मर्जी से एंटीबायोटिक का सेवन न करें. इसको लेकर अब दिल्ली एम्स के निदेशक प्रोफेसर एम श्रीनिवास ने भी लोगों से जागरूक होने की अपील की है. डॉक्टर एम श्रीनिवास ने कहा कि अत्यधिक एंटीबायोटिक के सेवन से एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) पैदा हो जाता है जिससे बाद में जरूरत पड़ने पर भी फिर एंटीबायोटिक काम नहीं करती हैं. एम्स निदेशक ने बताया कि दुकान से अनावश्यक एंटीबायोटिक लेने का फायदा नहीं, बल्कि उसका नुकसान ज्यादा है. इसलिए एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के प्रति जानकारी जरूर होनी चाहिए.
*एंटीबायोटिक दवाओं के दुरूपयोग को रोकना जरूरी*
उन्होंने कहा कि खांसी, सांस की नली में संक्रमण कुछ दिन में खुद ठीक हो जाता है. इसके लिए एंटीबायोटिक की जरूरत नहीं होती. एंटीबायोटिक की ज्यादा जरूरत अस्पताल और आईसीयू में भर्ती मरीजों को होती है लेकिन लोग पहले ही इतने एंटीबायोटिक ले चुके हैं कि जब अस्पताल में जरूरत पड़ती है तब एंटीबायोटिक दवा काम नहीं करती. इसलिए एंटीबायोटिक दवाओं का दुरुपयोग रोकना जरूरी है. उन्होंने बताया कि दिल्ली एम्स में संक्रमण रोकथाम के लिए कारगर कार्यक्रम संचालित होता है. इसलिए जो एंटीबायोटिक जरूरी होती है वही दवा दी जाती है. उन्होंने बताया कि कल्चर जांच के बाद ही एंटीबायोटिक दी जानी चाहिए.

*सर्दी-जुकाम के लिए एम्स ना आएं*
एम्स निदेशक ने यह भी सलाह दी कि लोग छोटी मोटी बीमारी सर्दी खांसी जुकाम बुखार के लिए एम्स न आएं. इससे अनावश्यक भीड़ बढ़ती है और जिस बीमारी का इलाज एम्स के स्तर पर हो सकता है उसको करने में भी भीड़ के कारण दिक्कत होती है. उन्होंने कहा कि एम्स एक टर्शियरी केयर रेफरल सेंटर है. यहां पर अधिकतर रेफरल के मरीज देखे जाते हैं. एम्स ऐसे ही मरीजों के इलाज के लिए है जिनका कहीं दूसरी जगह इलाज संभव नहीं है या देश के किसी अस्पताल से सुविधाओं के अभाव में किसी मरीज को आम रेफर किया गया हो.
यहां पर अधिकतर रेफरल के मरीज देखे जाते हैं. एम्स ऐसे ही मरीजों के इलाज के लिए है जिनका कहीं दूसरी जगह इलाज संभव नहीं है या देश के किसी अस्पताल से सुविधाओं के अभाव में किसी मरीज को एम्स रेफर किया गया हो. एम्स ऐसे ही मरीजों के इलाज के लिए है जिनका कहीं दूसरी जगह इलाज संभव नहीं है या देश के किसी अस्पताल से सुविधाओं के अभाव में किसी मरीज को एम्स रेफर किया गया हो.
*डिफरेंस ऑफ सेक्स डेवलपमेंट का इलाज संभव है*
इसके अलावा दिल्ली एम्स द्वारा डिफरेंस ऑफ सेक्स डेवलपमेंट (डीएसडी) को लेकर एक महत्वपूर्ण जानकारी भी दी गई है. एम्स निदेशक प्रोफेसर एम श्रीनिवास ने बताया कि किसी को भी प्रेगनेंसी के दौरान बच्चों की लिंग जांच नहीं करानी चाहिए. यह पहले से ही बैन है. लेकिन उसके बावजूद भी कुछ लोग इस तरह का प्रयास करते हैं और लिंग का पता लगवाते हैं. इसके बाद लोग ऐसी भी कोशिश करते हैं कि अगर उनको पता चल जाता है कि गर्भ में पल रहा बच्चा फीमेल है तो वह डॉक्टर से यह भी कहते हैं कि इसको हार्मोन दे करके किसी भी तरीके से उसको लड़के में कन्वर्ट कर दें, लेकिन यह संभव नहीं है. हालांकि फिर भी कुछ डॉक्टर इस तरह का प्रयास करते हैं. लेकिन यह हो ही नहीं सकता है. इसलिए हम लोगों को बताना चाहते हैं कि वह इस तरह के चक्कर में ना पड़े. साथ ही निदेशक ने ये भी बताया कि कई बार जन्म के बाद बच्चों में डिफरेंस ऑफ सेक्स डेवलपमेंट (डीएसडी) की स्थिति देखने को मिलती है. उससे भी कई बार मां-बाप डर जाते हैं और वह बच्चे को ट्रांसजेंडर समझ लेते हैं. ऐसा समझकर वह बच्चे को कई बार ट्रांसजेंडर कम्युनिटी को सौंप देते हैं. इससे उन बच्चों को उचित इलाज नहीं मिल पाता जिसके वह हकदार होते हैं.
*डीएसडी की स्थिति का मतलब यह नहीं कि बच्चा ट्रांसजेंडर है*
एम्स की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार डीएसडी की स्थिति का मतलब यह नहीं है कि वह बच्चा ट्रांसजेंडर है. यह एक तरह की मेडिकल कंडीशन होती है, जिसका इलाज संभव है और एम्स के द्वारा इस तरह के हजारों मरीजों को ठीक किया गया है. साथ ही उनके हार्मोन और लक्षणों के अनुसार मेल और फीमेल के रूप में उनका सेक्स डेवलपमेंट करके सामान्य जीवन जीने के अनुरूप बनाया गया है. ऐसे लोग इलाज के बाद पूरी तरह से मेल या फीमेल बनकर बच्चे पैदा करने में भी सक्षम हुए हैं.
इसलिए हम यह बताना चाहते हैं डिफरेंस ऑफ सेक्स डेवलपमेंट की कंडीशन में माता-पिता को विशेषज्ञ डॉक्टर के पास जाना चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि उनके बच्चे में यह डिसाइड नहीं हो पा रहा है कि वह मेल है या फीमेल. उसके जो अंग हैं वह उस तरह विकसित नहीं है जिससे यह पता चल सके कि वह मेल है या फीमेल. इस मेडिकल कंडीशन को विशेषज्ञ डॉक्टर देख कर और उसका इलाज शुरू करते हैं और वह समस्या दूर हो जाती है. एम्स पीडियाट्रिक विभाग की एंडॉक्रिनलॉजिस्ट एवं एडिशनल प्रोफेसर डॉ. रजनी शर्मा ने बताया कि हम लोगों में इस भ्रांति को दूर करना चाहते हैं कि डीएसडी की कंडीशन में मां-बाप बच्चे को सामाजिक दबाव के चलते उसे बिना जांच पड़ताल के किन्नर ना समझे.
एडिशनल प्रोफेसर रजनी शर्मा ने बताया कि जब ऐसी स्थिति में कोई बच्चा अस्पताल आता है तो उसकी पूरी तरह से जांच की जाती है. फिर यह देखा जाता है कि बच्चे में मेल क्रोमोसोम हैं या फीमेल के. जिसके क्रोमोसोम ज्यादा होते हैं, उसको फिर उसी अनुसार ट्रीटमेंट दे कर उसे सेक्स में ढाला जाता है. इस तरह की प्रक्रिया सफल होती है.
*डॉक्टर रजनी शर्मा ने शेयर की एक बच्चे का केस*
उन्होंने बताया कि एम्स में इस तरह का एक केस आया, जिसमें बच्चे के जन्म के 10 दिन बाद माता-पिता को यह नहीं पता चल पाया कि उनका बच्चा मेल है या फीमेल. वह बच्चे को लेकर एम्स आए और बच्चे का ट्रीटमेंट शुरु किया गया. बच्चा एक सप्ताह तक हमरे पास भर्ती रहा. लेकिन मां-बाप के मन में इस तरह की भावना आ गई की अगर हम बच्चे को घर लेकर जाएंगे तो समाज में पता चल जाएगा. इससे हमारी बदनामी होगी. वो लोग भी बच्चे को ट्रांसजेंडर ही समझेंगे. उन्होंने हमसे कहा कि अब हम इस बच्चे को लेकर घर नहीं जाएंगे.
उन्होंने उस बच्चे को ट्रांसजेंडर को सौंप दिया. लेकिन उन्होंने ट्रांसजेंडर को यह नहीं बताया कि बच्चे को इस समस्या के लिए इलाज की जरूरत है तो उसके इलाज में लापरवाही हुई. जब उसको ज्यादा दिक्कत हुई तो वह ट्रांसजेंडर बच्चे को लेकर के फिर एम्स आए और यहां जिस सीनियर रेजिडेंट ने बच्चे को पहले देखा था उसने बच्चे को पहचान लिया कि यह वही बच्चा है जिसको उसके मां-बाप पहले लेकर आए थे. एम्स में उस बच्चे का पूरा इलाज हुआ और बाद में वह बच्चा एक विदेशी फैमिली ने अडॉप्ट किया और वह बच्चा देश से बाहर चला गया. डॉक्टर रजनी शर्मा ने कहा कि इस तरह की स्थिति तभी आती है जब लोगों में जागरूकता की कमी होती है. इसलिए तो हम चाहते हैं कि जब भी किसी माता-पिता को इस तरह की कंडीशन अपने बच्चों में दिखे तो वह उसे खुद से दूर ना करें बल्कि उसको विशेषज्ञ के पास लेकर जाएं और इस मेडिकल कंडीशन का इलाज संभव है. यहां ऐसे बच्चों का पूरी गोपनीयता के साथ इलाज किया जाता है.
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


